स नो॑ वृषन्न॒मुं च॒रुं सत्रा॑दाव॒न्नपा॑वृधि। अ॒स्मभ्य॒मप्र॑तिष्कुतः॥
sa no vṛṣann amuṁ caruṁ satrādāvann apā vṛdhi | asmabhyam apratiṣkutaḥ ||
सः। नः॒। वृ॒ष॒न् अ॒मुम्। च॒रुम्। सत्रा॑ऽदावन्। अप॑। वृ॒धि॒। अ॒स्मभ्य॑म्। अप्र॑तिऽस्कुतः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यों को परमेश्वर की प्रार्थना किस प्रयोजन के लिये करनी चाहिये, वा सूर्य्य किसका निमित्त है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चरु का अपावरण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यैः स ईश्वरः किमर्थः प्रार्थनीयः सूर्य्यश्च किंनिमित्त इत्युपदिश्यते।
हे वृषन् सत्रादावन् परमेश्वर ! स त्वमस्मभ्यमप्रतिष्कुतः सन्नोऽस्माकममुं चरुं मोक्षद्वारमपावृधि उद्घाटय इत्याद्यः। तथा भवद्रचितोऽयं सत्रादावा वृषाऽप्रतिष्कुतः सूर्य्योऽस्मभ्यममुं चरुं मेघमपावृणोत्युद्- घाटयतीत्यपरः ॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What for should God be prayed to and what for the sun is to be thought of is taught in the next Mantra.
(1) O Giver of all gifts, Rainer of happiness and peace ! Open the door of emancipation to us who are obedient to Thee and engaged in doing noble deeds. Thou art Irresistible O Lord. (2) O God, this sun created by Thee in irresistible, cause of rain and it removes the clouds.
