वांछित मन्त्र चुनें
देवता: इन्द्र: ऋषि: नोधा गौतमः छन्द: जगती स्वर: निषादः

सिं॒हाइ॑व नानदति॒ प्रचे॑तसः पि॒शाइ॑व सु॒पिशो॑ वि॒श्ववे॑दसः। क्षपो॒ जिन्व॑न्तः॒ पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभिः॒ समित्स॒बाधः॒ शव॒साहि॑मन्यवः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

siṁhā iva nānadati pracetasaḥ piśā iva supiśo viśvavedasaḥ | kṣapo jinvantaḥ pṛṣatībhir ṛṣṭibhiḥ sam it sabādhaḥ śavasāhimanyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सिं॒हाःऽइ॑व। ना॒न॒द॒ति॒। प्रऽचे॑तसः। पि॒शाःऽइ॑व। सु॒ऽपिशः॑। वि॒श्वऽवे॑दसः। क्षपः॑। जिन्व॑न्तः। पृष॑तीभिः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। सम्। इत्। स॒ऽबाधः॒। शव॑सा। अहि॑ऽमन्यवः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:64» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:8


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (प्रचेतसः) उत्तम विज्ञान होने के हेतु (सुपिशः) सुन्दर अवयवों के करनेवाले (सबाधः) पदार्थों को अपने नियम में रखनेवाले (अहिमन्यवः) मेघ की वर्षा का ज्ञान करानेवाले वायु (इत्) ही (ऋष्टिभिः) व्यवहारों के प्राप्त कराने और (पृषतीभिः) अपने गमनागमन वेगादिगुणों से (क्षपः) रात्रि को (संजिन्वन्तः) तृप्त करते हुए (विश्ववेदसः) सब कर्मों के प्राप्त करानेवाले पवन (शवसा) अपने बलों से (सिंहाइव) सिहों के समान तथा (पिशाइव) बड़े बलवाले हाथियों के समान (नानदति) अत्यन्त शब्द करते हैं, उनको कार्यों की सिद्धि के लिये यथावत् संयुक्त करो ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! तुम ऐसा जानो कि जितना बल, पराक्रम, जीवन, सुनना, विचारना आदि क्रिया है, वे सब वायु के सकाश से ही होती हैं ॥ ८ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्ति व ज्ञान के समन्वयवाले

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्राणसाधक पुरुष (सिंहाः इव नानदति) = सिंहों के समान गर्जना करनेवाले होते हैं । इनकी वाणी से शक्ति प्रकट होती है । भीष्म पितामह युद्ध के प्रारम्भ में “सिंहनादं विनद्योच्चैः” उच्चस्वर से सिंहगर्जना करके ही शंखध्वनि करते हैं । २. (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले, प्राणसाधक शक्तिशाली होते हैं, शक्ति के साथ वे ज्ञान का भी सम्पादन करते हैं । ३. (पिशाः इव) = शरीरगत श्वेत बिन्दुओं से अलंकृत रुरु मृगों की भाँति ये (सपिशः) = शोभन शरीर - अवयवोंवाले तथा ज्ञानादि सुन्दर अलंकारोंवाले होते हैं । ज्ञानादि से सुभूषित होकर ये ‘सुपिश्’ होते हैं । (विश्ववेदसः) = शरीर व मस्तिष्क की सम्पत्तियों के साथ ये सम्पूर्ण धनोंवाले होते हैं । आवश्यक धनों की इन्हें कमी नहीं रहती । ५.(क्षपः) = सब शत्रुओं का ये संहार करनेवाले होते हैं, (जिन्वन्तः) = धार्मिकों को प्रीणित करनेवाले होते हैं । ६. (पृषतीभिः) = लोकों पर सुखों का सेचन करनेवाले (ऋष्टिभिः) =अस्त्रों से (समित् सबाघः) = [सम्+इ] मिलकर शत्रुओं को पीड़ित करनेवाले ये व्यक्ति (शवसा) = बल के साथ (अहिमन्यवः) = अहीन ज्ञानवाले होते हैं । इनमें शक्ति व ज्ञान का समन्वय होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधक पुरुष शक्ति व ज्ञान से समन्वित जीवनवाले होकर, मिलकर शत्रुओं को पीड़ित करनेवाले तथा लोकों पर सुखों की वर्षा करनेवाले होते हैं ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यूयं य एते प्रचेतसः सुपिशः सबाधोऽहिमन्यव इदेव ऋष्टिभिः पृषतीभिः क्षपः संजिन्वन्तो विश्ववेदसो वायवः शवसा सिंहा इव पिशा इव बलाऽवयववन्तो गजा इव नानदति तान् कार्य्येषु संप्रयोजयत ॥ ८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सिंहाइव) व्याघ्रतुल्यबलाः (नानदति) पुनः पुनः शब्दयन्ति (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतः संज्ञानं येभ्यस्ते (पिशाइव) यथा बलयुक्तावयववन्तो गजाः (सुपिशः) सुष्ठु पिशन्त्यवयुवन्ति ये ते (विश्ववेदसः) ये विश्वानि सर्वाणि कर्माणि वेदयन्ति प्रापयन्ति ते (क्षपः) रात्रीः। क्षपेति रात्रिनामसु पठितम्। (निघ०१.७) (जिन्वतः) तर्पयन्तः (पृषतीभिः) स्वगमनागमनवेगादिगुणैः (ऋष्टिभिः) व्यवहारप्रापकैः (सम्) सम्यगर्थे (इत्) एव (सबाधः) ये पदार्थान् सहैव बाधन्ते ते (शवसा) बलेन (अहिमन्यवः) येऽहिं मेघं मानयन्ति ते ज्ञापयन्ति ते ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारौ। हे मनुष्याः ! यूयं यावद्बलपराक्रमजीवनश्रवणमननादिकर्मास्ति तावत्सर्वं वायूनां सकाशादेव जायत इति विजानीत ॥ ८ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like lions, the Maruts roar and proclaim the nature of nature (since, as waves of energy, they are in touch with everything in existence and hence know what it is). Powerful as they are possessed of minute particles of energy they possess the world and put you in touch with everything if you know them. Keeping everything in its own shape and order, coexistent with the clouds in their action of sun and shower, they vitalise the nights with the showers of their waves like mists.$(If you know the Maruts, you know what they touch and proclaim.)
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are they (Maruts) is taught further in the 8th Mantra.

अन्वय:

The winds are like the brave soldiers who being most wise roar like lions, are full of might like the elephants, are destroyers of their foes, are knowers of everything important and helpers in the accomplishment of all good deeds, making people sleep at nights without much anxiety by arranging for their watch, going to help the afflicted persons. They [winds] by their speed and other attributes which help in the accomplishment of works with their might, restrain the substances and indicate or make the clouds. You must use them properly in your works.

पदार्थान्वयभाषाः - (पिशा इव) यथा बलयुक्तावयवन्तो गजाः ॥ = Like the mighty elephants. (सुपिशा: ) सुष्ठु पिशन्ति अवयुवन्ति ये ते = Those who shatter. (क्षपः) रात्री: क्षपेति रात्रिनाम (निध० १.७) = Nights. (अहिमन्ययवः) ये अहिं मेघं मानयन्ति ज्ञापयन्तिते । = Which indicate clouds.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankara used in the Mantre. O men, you should know that all strength, force, life, hearing and other faculties are mostly dependent upon the winds.
टिप्पणी: पिश-अवयवे । अहिरीति मेघनाम (निघ० १.१० )
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो, तुम्ही हे जाणा की जितके बल, पराक्रम, जीवन, श्रवण, मनन विचार करणे इत्यादी क्रिया आहेत त्या वायूच्या साह्यानेच होतात. ॥ ८ ॥