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युवा॑नो रु॒द्रा अ॒जरा॑ अभो॒ग्घनो॑ वव॒क्षुरध्रि॑गावः॒ पर्व॑ताइव। दृ॒ळ्हा चि॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि॒ पार्थि॑वा॒ प्र च्या॑वयन्ति दि॒व्यानि॑ म॒ज्मना॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvāno rudrā ajarā abhogghano vavakṣur adhrigāvaḥ parvatā iva | dṛḻhā cid viśvā bhuvanāni pārthivā pra cyāvayanti divyāni majmanā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

युवा॑नः। रु॒द्राः। अ॒जराः॑। अ॒भो॒क्ऽहनः॑। व॒व॒क्षुः। अध्रि॑ऽगावः। पर्व॑ताःऽइव। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। विश्वा॑। भुव॑नानि। पार्थि॑वा। प्र। च्या॒व॒य॒न्ति॒। दि॒व्यानि॑। म॒ज्मना॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:64» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (पर्वताइव) पर्वत वा मेघ के समान धारण करनेवाले (युवानः) पदार्थों के मिलाने तथा पृथक् करने में बड़े बलवान् (अभोग्घनः) भोजन करने तथा मरने से पृथक् (अध्रिगावः) किरणों को नहीं धारण करनेवाले अर्थात् प्रकाशरहित (अजराः) जन्म लेके वृद्ध होना, फिर मरना इत्यादि कामों से रहित तथा कारणरूप से नित्य (रुद्राः) ज्वर आदि की पीडा से रुलानेवाले वायु जीवों को (ववक्षुः) रुष्ट करते हैं (मज्मना) बल से (पार्थिवा) भूगोल आदि (दिव्यानि) प्रकाश में रहनेवाले सूर्य आदि लोक (चित्) और (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक (दृढा) दृढ़ स्थिरों को भी (प्रच्यावयन्ति) चलायमान करते हैं, उनको विद्या से यथावत् जानकर कार्य्यों के बीच लगाओ ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे मेघ जलों के आधार और पर्वत ओषधि आदि के आधार हैं, वैसे ही ये संयोग-वियोग करनेवाले, सबके आधार, सुख-दुःख होने के हेतु, नित्यरूप, गुण से अलग, स्पर्श गुणवाले पवन हैं, ऐसा समझना योग्य है। और इन्हींके विना जल, अग्नि और भूगोल तथा इनके परमाणु भी जान-आने तथा ठहरने को समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

युवानः पर्वता इव

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के प्रकरण को ही आगे ले - चलते हुए कहते हैं कि ये प्रभुभक्त [क] (युवानः) = अपने से दोषों का अमिश्रण व गुणों का मिश्रण करनेवाले होते हैं [यु मिश्रणामिश्रणयोः] । [ख] इसके लिए (रुद्राः) = [रोरूयमाणो द्रवति] प्रभु के नामों का उच्चारण करते हुए सदा कर्मों में लगे रहते हैं, [ग] इसलिए (अजराः) = कभी जीर्ण नहीं होते । [घ] (अभोग्घनः) = [न भोजयन्ति] ये औरों को न खिलाकर स्वयं खा जाने की वृत्ति को नष्ट करनेवाले होते हैं ; ‘अभोग्घन्’ होने के कारण ही (ववक्षुः) = ये सर्वाङ्गीण उन्नति करनेवाले होते हैं [wax-वक्ष्- to grow] । [ङ] (अधिग्रवः) = ये अधृतगमन होते हैं, इनके कार्यों में कोई विघ्न नहीं डाल सकता । बड़े - से - बड़े विघ्नों को भी दूर करके ये आगे बढ़ते चलते हैं । [च] (पर्वता इव) = ये पर्वतों के समान होते हैं । जैसे समुद्र - तरंगों के थपेड़े पर्वतों के विदीर्ण नहीं कर पाते वैसे ही संसार के प्रलोभन इन्हें विचलित नहीं कर पाते । [छ] (दुळ्हा चित्) = अत्यन्त दृढ़ भी (विश्वा) = सब (पार्थिवा भुवनानि) = पार्थिव भुवनों को (प्रच्यावयन्ति) = ये विचलित करनेवाले होते हैं, अर्थात् बड़े जबरदस्त पार्थिव प्रलोभनों के भी ये वशीभूत नहीं होते । बड़े - से - बड़े धन व यश का प्रलोभन इन्हें विचलित नहीं कर पाता । [ज] (मज्मना) = अपने शोधक बल से ये (दिव्यानि) = दिव्य प्रलोभनों को भी कम्पित करके दूर करनेवाले होते हैं । योगमार्ग पर चलते हुए जो सिद्धियाँ प्राप्त होती है, ये सिद्धियाँ भी इन्हें मार्ग से विचलित नहीं कर पाती, एवं पार्थिव व दिव्य प्रलोभनों से ये ऊपर उठ जाते हैं । शुद्धान्तः करणवाले बनकर ये सिद्धियों की तुच्छता को समझते हैं और इन्हें भी प्रभुप्राप्ति के मार्ग में विघ्नरूप में ही जानते हैं, अतः न तो ये पार्थिव सम्पत्तियों में फँसते हैं और न दिव्य सिद्धियों में ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुभक्त सदा दोषों को दूर करते हुए गुणों को अपने साथ सम्बद्ध करते हैं । शोधक बल को प्राप्त करके पार्थिव व दिव्य प्रलोभनों में नहीं फँसते ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे मनुष्याः ! यूयं य इमे पर्वताइव युवानोऽभोग्घनोऽध्रिगावोऽजरा रुद्रा जीवान् ववक्षु रोषयन्ति। मज्मना पार्थिवा दिव्यानि चिदपि विश्वा भुवनानि दृढा प्रच्यावयन्ति तान् विद्यया यथावद्विदित्वा कार्य्येषु संप्रयोजयत ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (युवानः) मिश्रणामिश्रणकर्त्तृत्वेन बलिष्ठाः (रुद्राः) मरणज्वरादिपीडाहेतुत्वाद्रोदयितारः (अजराः) जन्मजरामृत्युधर्मादि-रहित्वात्कारणरूपेण नित्याः (अभोग्घनः) ये भोज्यन्ते ते भोजो हन्यन्ते ते हनः। भोजश्च ते हनो भोग्घनः न भोग्घनोऽभोग्घनस्ते (ववक्षुः) ये वक्षयन्ति रोषयन्ति ते (अध्रिगावः) अधृता गावो रश्मयो यैस्ते (पर्वताइव) यथा पर्वता मेघाः शैला वा धर्त्तारः सन्ति तथैव मूर्त्तद्रव्यधर्त्तारः (दृढा) दृढानि (चित्) अपि (विश्वा) सर्वाणि (भुवनानि) सर्वेषां पदार्थानामधिकरणानि (पार्थिवा) पृथिवीत्याख्यस्य कारणस्य विकारभूतानि भूगोलाख्यानि कार्य्याणि (प्र) प्रकृष्टार्थे (च्यावयन्ति) प्रचालयन्ति (दिव्यानि) दिवि प्रकाशे भवानि सूर्य्यविद्युदादीनि (मज्मना) शुद्धिधारणक्षेपणाख्येन बलेन। अत्र मस्जधातोरौणादिको मनिन् प्रत्ययो बाहुलकात्सकारलोपश्च। मज्मेति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा मेघा जलाधिकरणाः शैलाश्चौषध्याद्यधिकरणाः सन्ति तथैवैते संयोगवियोगकर्त्तारः सर्वाधाराः सुखदुःखहेतवो नित्या रूपरहिताः स्पर्शवन्तो वायवः सन्तीति वेदितव्यम्। नह्येतैर्विना भूगोलजलाग्निपुञ्जाश्चैतेषां कणाश्च गन्तुमागन्तुं स्थातुं च शक्नुवन्ति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Fresh, powerful and ever young, dynamic catalytic energies, unaging, free from suffering and death, they grow and augment. Unseen and irresistible in motion, strong and steady as mountains, with their power and force they move everything on earth and in heaven and all the worlds in existence.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे मेघ जलाचा आधार व पर्वत औषधी इत्यादीचा आधार आहेत. तसेच संयोग वियोगकर्ते सर्वांचे आधार, सुखदुःखाचे हेतू, नित्यरूप गुणांपासून वेगळे, स्पर्शगुण असणारे वायू असतात असे समजावे व त्यांच्याशिवाय जल, अग्नी व भूगोल आणि त्यांचे परमाणू जाण्या-येण्यास व स्थित राहण्यास समर्थ होऊ शकत नाहीत. हे माणसांनी जाणावे. ॥ ३ ॥