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देवता: इन्द्र: ऋषि: नोधा गौतमः छन्द: जगती स्वर: निषादः

घृषुं॑ पाव॒कं व॒निनं॒ विच॑र्षणिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा॑ गृणीमसि। र॒ज॒स्तुरं॑ त॒वसं॒ मारु॑तं ग॒णमृ॑जी॒षिणं॒ वृष॑णं सश्चत श्रि॒ये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ghṛṣum pāvakaṁ vaninaṁ vicarṣaṇiṁ rudrasya sūnuṁ havasā gṛṇīmasi | rajasturaṁ tavasam mārutaṁ gaṇam ṛjīṣiṇaṁ vṛṣaṇaṁ saścata śriye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

घृषु॑म्। पा॒व॒कम्। व॒निन॑म्। विऽच॑र्षणिम्। रु॒द्रस्य॑। सू॒नुम्। ह॒वसा॑। गृ॒णी॒म॒सि॒। र॒जः॒ऽतुर॑म्। त॒वस॑म्। मारु॑तम्। ग॒णम्। ऋ॒जी॒षिण॑म्। वृष॑णम्। स॒श्च॒त॒। श्रि॒ये ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:64» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वायुओं के समुदाय कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (हवसा) दान और ग्रहण से (श्रिये) विद्या, शिक्षा और चक्रवर्त्तिराज्य की प्राप्ति के लिये जिस (रुद्रस्य) मुख्य वायु के (सूनुम्) पुत्र के समान वर्त्तमान (विचर्षणिम्) भेद करने तथा (वनिनम्) संग्राम करनेवाले (घृषुम्) घिसने के स्वभाव से युक्त (पावकम्) पवित्र करनेवाले (तवसम्) महाबलवान् (रजस्तुरम्) लोकों को शीघ्र चलाने (ऋजीषिणम्) उत्तम शुद्धि होने के कारण और (वृषणम्) वृष्टि करनेवाले (मारुतम्) पवनों के (गणम्) समूह का (गृणीमसि) उपदेश करते हैं, उसको तुम भी (सश्चत) जानो ॥ १२ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि वायुसमुदाय के विना हमारे कोई काम सिद्ध नहीं हो सकते, ऐसी वायुविद्या का निश्चयतया स्वीकार करके अपने कार्यों की सिद्धि अवश्य करें ॥ १२ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मारुत - गण

पदार्थान्वयभाषाः - १. शरीर में मरुत् ४९ भागों में विभक्त होकर कार्य कर रहे हैं । ये ४९ मरुत् मिलकर यहाँ मारुत - गण के रूप में स्मरण किये गये हैं । (श्रिये) = शोभा के लिए (मारुतं गणम्) = इन मरुतों के गण को (सश्चत) = प्राप्त करो । इनके साथ अपना सम्बन्ध बनाओ [cling to] अथवा इनका उपासन करो [worship] । उन मारुतगणों को उपासित करो जोकि (घृषुम्) = शत्रुओं का धर्षण कर देनेवाला है, (पावकम्) = पवित्र करनेवाला है, (वनिनम्) = विजय को प्राप्त करानेवाला है [वन् - to win] । २. (विचर्षणिम्) = विशेषरूप से हमारा ध्यान करनेवाला है अथवा हमें (कर्षणि) = श्रमशील बनानेवाला है । (रुद्रस्य) = उस परमात्मा के (सूनुम्) = प्रेरक मारुतगण को (हवसा) = आह्वान साधनभूत स्तोत्रों से (गृणीमसि) = स्तुत करते हैं । प्राणसाधना से चित्तवृत्तिनिरोध होकर हमारा झुकाव प्रभु की ओर होता है, अतः यह मारुतगण ‘रुद्रसूनु’ कहलाया है । ३. (रजस्तुरम्) = यह मारुतगण रजोगुण का, राक्षसी वृत्तियों का संहार करनेवाला है अथवा कर्मों को त्वरा से करनेवाला है । (तवसम्) = हमें अत्यन्त बलवान् व प्रबुद्ध करनेवाला है, (ऋजीषिणम्) = ऋजुमार्ग से धनार्जन करनेवाला है और (वृषणम्) = सबपर सुखों का वर्षण करनेवाला है । इस मारुतगण के सेवन से हमारी शोभा क्यों न बढ़ेगी ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्राणसंघ का स्तवन करें । ये प्राण शरीर के रोगों को नष्ट करेंगे और हमारी वृत्तियों को उत्तम बनाएँगे ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तत्समुदायः कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे मनुष्याः ! यथा वयं हवसा श्रिये रुद्रस्य सूनुं विचर्षणिं वनिनं घृषुं पावकं तवसं रजस्तुरमृजीषिणं वृषणं मारुतं गणं गृणीमसि स्तुवीमस्तं यूयमपि सश्चत विजानीत ॥ १२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (घृषुम्) घर्षणशीलम् (पावकम्) पवित्रकारकम् (वनिनम्) संभक्तारम् (विचर्षणिम्) विलेखकम् (रुद्रस्य) परमेश्वरस्य जीवस्य वायुकरणस्य वा (सूनुम्) पुत्रवद्वर्त्तमानं प्राणिगर्भविमोचकं वा (हवसा) ग्रहणत्यागभक्षणादिकर्मणा सह वर्त्तमानम् (गृणीमसि) स्तुवीमः (रजस्तुरम्) यो रजांसि लोकान् तुरति तूर्णगमनागमनहेतुम् (तवसम्) महाबलयुक्तम् (मारुतम्) मरुतां वायूनामिमम् (गणम्) समूहम् (ऋजीषिणम्) प्रशस्तमुपार्जनं विद्यते यस्मिंस्तम् (वृषणम्) वृष्टिकारकम् (सश्चत) विजानीत प्राप्नुत वा (श्रिये) विद्याशिक्षाराज्यधनप्राप्तये ॥ १२ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्नहि वायुसमुदायेन विना काचिद्व्यवहारक्रिया भवितुं शक्येति निश्चित्यावश्यं वायुविद्यां स्वीकृत्य स्वकीयानि कार्य्याणि साधनीयानि ॥ १२ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We invoke, praise and celebrate in song the band of Maruts, nature’s powers of grinding and crushing, purifying as fire with refinement, generous, ever active, children of Rudra, i.e., products of cosmic metabolism in the process of joining, disjoining, consuming and creating. You too love, study and serve the Maruts, most active energy of the universe, fiery and powerful, creative and collective forces which bestow the gifts of life on us. Do so for beauty, prosperity and grace.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

As we praise for the education and prosperity the band of the mighty winds which cause rain, which are the sons of God, which are impetuous, overcoming all, purifiers, Powerful, quickly moving in the worlds, endowed with causes of taking, leading eating and other activities like the great heroes who are experts in battles, attentive in their works, sons of the commander of the army, drinkers of Soma and other nourishing drinks and purifiers of all.

पदार्थान्वयभाषाः - (हवसा) ग्रहणत्यागभक्षणादि कर्मणा सह वर्तमानम् | =Existing with or causing taking, leaving, eating and other activities. (रुद्रस्य) परमेश्वरस्य, वायुकारणस्यवा | = Of God, of soul or of Vayu [wind] in collective form.
भावार्थभाषाः - Men should know that no movement is possible without air, therefore they should master the science of air and accomplish all their works utilising the wind properly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - वायू समुदायाशिवाय आपले कोणतेही कार्य सिद्ध होऊ शकत नाही असा माणसांनी निश्चय करून वायुविद्येचा स्वीकार करावा व आपल्या कार्याची सिद्धी अवश्य करावी. ॥ १२ ॥