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हि॒र॒ण्यये॑भिः प॒विभिः॑ पयो॒वृध॒ उज्जि॑घ्नन्त आप॒थ्यो॒३॒॑ न पर्व॑तान्। म॒खा अ॒यासः॑ स्व॒सृतो॑ ध्रुव॒च्युतो॑ दुध्र॒कृतो॑ म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hiraṇyayebhiḥ pavibhiḥ payovṛdha ujjighnanta āpathyo na parvatān | makhā ayāsaḥ svasṛto dhruvacyuto dudhrakṛto maruto bhrājadṛṣṭayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हि॒र॒ण्यये॑भिः। प॒विऽभिः॑। प॒यः॒ऽवृधः॑। उत्। जि॒घ्न॒न्ते॒। आ॒ऽप॒थ्यः॑। न। पर्व॑तान्। म॒खाः। अ॒यासः॑। स्व॒ऽसृतः॑। ध्रु॒व॒ऽच्युतः॑। दु॒ध्र॒ऽकृतः॑। म॒रुतः॑। भ्राज॑त्ऽऋष्टयः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:64» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी वे पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् मनुष्यो ! तुम लोग (आपथ्यो न) अच्छे प्रकार (हिरण्ययेभिः) सुवर्ण आदि के योग से प्रकाशरूप (पविभिः) पवित्र चक्रों के रथ से मार्ग में चलने के समान (भ्राजदृष्टयः) जिनसे व्यवहार प्राप्त करानेवाली कान्ति प्रसिद्ध हों (दुध्रकृतः) धारण करनेवाले बलादि के उत्पन्न करने (ध्रुवच्युतः) निश्चल आकाश से चलायमान (स्वसृतः) अपने गुणों को प्राप्त होके चलनेहारे (पयोवृधः) जल वा रात्रि के बढ़ानेवाले (मखाः) यज्ञ के योग्य (अयासः) प्राप्त होने के स्वभाव से युक्त (मरुतः) पवन (पर्वतान्) मेघ वा पर्वतों को (उज्जिघ्नन्ते) नष्ट करते हैं, उन पवनों के गुणों को जान कर अपने कार्यों में संयुक्त करो ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिन वायुओं से वृष्टि आदि की उत्पत्ति होती है, उनका युक्ति के साथ सेवन किया करें ॥ ११ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पयोवृधः

पदार्थान्वयभाषाः - १. (मरुतः) = प्राण व प्राणसाधना करनेवाले मितराविणः - मितरावी पुरुष (पयोवृधः) = दूध आदि सात्त्विक आहारों से अपना वर्धन करनेवाले होते हैं और (हिरण्ययेभिः) = हित - रमणीय व स्वर्णिम (पविभिः) = वाणियों से (उज्जिघ्नन्तः) = मार्ग में आनेवाले विघ्नों को उसी प्रकार नष्ट करनेवाले होते हैं, (न) = जैसे कि (आपथ्यः) = मार्ग पर जानेवाला कोई व्यक्ति (पर्वतान्) = पर्वतों को दूर फेंक देता हैं । मरुत् भी पर्वततुल्य महान् विरोधियों को भी हितरमणीय वाणियों से अनुकूल बना लेते हैं । २. (मखाः) = इनका जीवन यज्ञमय होता है, (अयासः) = ये निरन्तर गतिशील होते हैं, (स्व - सृतः) = आत्मतत्त्व की ओर [स्व] बढ़नेवाले होते हैं । ३. (ध्रुवच्युतः) = अत्यन्त स्थिर अर्थात् दृढमूल शत्रुओं को भी च्युत करनेवाले होते हैं । स्वभाव में परिणत हो गये काम - क्रोध को भी ये अपने से पृथक् करनेवाले होते हैं । (दुध्रकृतः) = शत्रुओं के लिए अपने को दुर्घषणीय बनाते हैं । शत्रु इनका पराभव नहीं कर पाते । ऐसे ये (मरुतः) = प्राणसाधक (भ्राजदृष्टयः) = [भ्राजा दृष्टिर्येषाम्] देदीप्यमान दृष्टिवाले होते हैं अथवा (भ्राजत् + ऋष्टयः) = देदीप्यमान गतियोंवाले होते हैं [ऋष् गतौ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना हमें यज्ञशील व देदीप्यमान दृष्टिवाला बनाती है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरेते वायवः कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे विद्वांसो मनुष्या ! यूयमापथ्यो न हिरण्ययेभिः पविभिः सह समन्ताद्रथेन पथि गच्छन्निव ये भ्राजदृष्टयो दुध्रकृतो ध्रुवच्युतः स्वसृतः पयोवृधो मरुतो पर्वतान् मेघान् शैलान् वोज्जिघ्नन्ते तेषां गुणान् विज्ञायैतान् कार्य्येषु नित्यं संप्रयोजयत ॥ ११ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (हिरण्ययेभिः) तेजोमयैः (पविभिः) वज्रतुल्यैः पवित्रैर्गमनागमनादिसाधनचक्रैः (पयोवृधः) ये पय उदकं रात्रिं वा वर्धयन्ति ते (उत्) उत्कृष्टे (जिघ्नन्ते) हिंसन्ति। अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीत्यदादेशविकल्पः। (आपथ्यः) पथि भवः पथ्यः सर्वतः पथ्य आपथ्यः (न) इव (पर्वतान्) शैलान् मेघान् वा (मखाः) यष्टुमर्हा यज्ञाः (अयासः) प्राप्तिशीलाः (स्वसृतः) ये स्वान् गुणान् सरन्ति प्राप्नुवन्ति ते (ध्रुवच्युतः) ये ध्रुवानपि पदार्थान् च्यावयन्ति निपातयन्ति ते (दुध्रकृतः) ये दुध्राणि धारकाणि बलादीनि कुर्वन्ति ते (मरुतः) वायवः (भ्राजदृष्टयः) भ्राजत्यः प्रदीप्ता ऋष्टयो व्यवहारप्रापिकाः कान्त्यो येभ्यस्ते ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्येभ्यो वृष्ट्यादिकं जायते ते वायवो युक्त्या सेवनीयाः ॥ ११ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, creators and promoters of water, juice and milk, powers of cosmic yajna, advancing, self- driven, shakers of the fixed, makers of the firm, brandishing their burnishing steel, shatter the mountains and scatter the clouds like leaves on the pathways by the golden wheels of their chariots.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are the Maruts is taught further in the 11th Mantra.

अन्वय:

O learned persons, you should utilise winds which are mighty, which with their movements increase waters (bring floods etc.) and which are like the heroes become strong by taking milk, who perform Yajnas, who go forward, who are free in their movements, who shake even the most firm foes, who can not be overcome by others, who possessing bright weapons shake or throw away even the mountains if they come in their way with their golden thunderbolts as a traveller throws away any insignificant thing.

पदार्थान्वयभाषाः - (दुधकृत:) दुधाणि धारकाणि बलादीनि कुर्वन्ति ते । = Causing great upholding power. (भ्राजदृष्टयः) भ्राजतः प्रदीप्ता ॠष्टयः व्यवहार प्रापिका: कान्तयो येभ्यस्ते । = Possessing or causing bright splendour.
भावार्थभाषाः - Men should know well the attributes of the winds which produce rain etc. and should utilise them properly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. ज्या वायूंमुळे वृष्टी इत्यादीची उत्पत्ती होते. त्यांचा माणसांनी युक्तीने स्वीकार करावा. ॥ ११ ॥