ईश्वरप्रणिधान व सूर्य से स्पर्धा
पदार्थान्वयभाषाः - १. (यत्) = चूंकि (एकः) = वह प्रभु अकेले ही (वव्ने) = [वन् - to win] इन सब सम्पत्तियों को जीतते हैं । और वे ही (भूरेः) = हमारा पालन - पोषण करनेवाली सम्पत्ति के भी [भृ - धारणपोषण] (ईशानः) = ईशान हैं - "अहं धनानि संजयामि शश्वतः" , इसलिए (एषाम्) = इन [गतमन्त्रों में वर्णित] नोधा नामक भक्तों का (त्यत्) = वह - वह कर्म (अस्मै इत् उ) = इस प्रभु के लिए (अनुदायि) = दिया जाता है, अर्थात् प्रभु के अर्पण किया जाता है । वेदों का सार यही है कि 'कुरु कर्म' कर्म कर और (त्यजेति च) = उसे प्रभु के लिए त्यागता चल । प्रभु की शक्ति से होते हुए इन कर्मों का गर्व करना ठीक भी तो नहीं । यह ईश्वरार्पण ही 'ईश्वरप्रणिधान' है । २. जब हम इस प्रकार ईश्वरार्पण करते हैं तब (इन्द्रः) = वे प्रभु (प्र आवृत्) = प्रकर्षेण हमारी रक्षा करते हैं । जो हम [क] (एतशम्) = [एति शयति] गतिशील बनते हैं और गतिशीलता के द्वारा मलों को क्षीण करते हैं, [ख] जो हम (सौवश्व्ये) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला होने में (सूर्ये पस्पृधानम्) = सूर्य से स्पर्धा करते हैं । सूर्य सप्ताश्व है, हम भी "कर्णाविमौ नासिके चक्ष्णी मुखम्" - दो कान, दो नासिकाछिद्र, दो आँखों व मुखरूप सात अश्वोंवाले हैं । ये सात ही सप्तर्षि कहलाते हैं । इन सप्तर्षियों को क्रियाशील व निर्मल बनाना ही सूर्य के सात अश्वों से स्पर्धा करना है । सूर्य के सप्ताश्व जैसे चमकते हैं, उसी प्रकार ये सात इन्द्रियाँ भी चमकें । 'सूर्य की सात प्रकार की किरणों से इन सात इन्द्रियों की चमक अधिक हो' - यही सूर्य से स्पर्धा करना है ; [ग] इस स्पर्धा में विजयी होने के लिए हम (सुष्विम्) = अपने अन्दर सोम का सम्पादन करते हैं [षु - अभिषव] । इस सोम का रक्षण ही हमारी इन्द्रियों को सबल बनाता है और हम चमक से सूर्य की स्पर्धा करने के योग्य होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाला अपने को दीप्त बनाता है, दीप्ति में सूर्य के साथ स्पर्धा करनेवाला होता है ।