वांछित मन्त्र चुनें

अ॒स्येदु॑ त्वे॒षसा॑ रन्त॒ सिन्ध॑वः॒ परि॒ यद्वज्रे॑ण सी॒मय॑च्छत्। ई॒शा॒न॒कृद्दा॒शुषे॑ दश॒स्यन्तु॒र्वीत॑ये गा॒धं तु॒र्वणिः॑ कः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asyed u tveṣasā ranta sindhavaḥ pari yad vajreṇa sīm ayacchat | īśānakṛd dāśuṣe daśasyan turvītaye gādhaṁ turvaṇiḥ kaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। त्वे॒षसा॑। र॒न्त॒। सिन्ध॑वः। परि॑। यत्। वज्रे॑ण। सी॒म्। अय॑च्छत्। ई॒शा॒न॒ऽकृत्। दा॒शुषे॑। द॒श॒स्यन्। तु॒र्वीत॑ये। गा॒धम्। तु॒र्वणिः॑। क॒रिति॑ कः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:61» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:29» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:11


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस सभाध्यक्ष के (त्वेषसा) विद्या, न्याय, बल के प्रकाश के साथ जो वर्त्तमान शूरवीर बिजुली के समान (रन्त) रमण करते हैं (सिन्धवः) समुद्र के समान (वज्रेण) शस्त्र से (सीम्) सब प्रकार शत्रु की सेनाओं को (पर्यच्छत्) निग्रह करता है, वह (दाशुषे) दानशील मनुष्य के (ईशानकृत्) ऐश्वर्ययुक्त करनेवाला (तुर्वीतये) शीघ्र करनेवालों के लिये (दशस्यन्) दशन के समान आचरण करता हुआ (तुर्वणिः) शीघ्र करनेवालों को सेवन करनेवाला मनुष्य (गाधम्) शत्रुओं का विलोडन (कः) करता है ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सभाध्यक्ष वा सूर्य के सहाय से शत्रु वा मेघादिकों को जीत कर पृथिवी राज्य का सेवन कर सुखी और प्रतापी होता है, वह सब शत्रुओं के बिलोड़ने को योग्य है ॥ ११ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सरस्वती का पुनः प्रवाह

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यत) = जब (वज्रेण) = क्रियाशीलतारूप वज्र के द्वारा (सीम्) = निश्चय से (परि अयच्छत्) = वृत्ररूप वासना को पूर्णरूप से काबू कर लेता है तब (अस्य इत् उ) = इस प्रभु की ही (त्वेषसा) = ज्ञानदीप्ति से (सिन्धवः) = ज्ञानप्रवाह (रन्त) = फिर से रमण करने लगते हैं । प्रभु 'ब्रह्मा' हैं, ज्ञान उनकी पत्नी 'सरस्वती' के रूप में है । पुत्र को पिता से जैसे सम्पत्ति प्राप्त होती है, उसी प्रकार उस ब्रह्म से जीव को ज्ञान प्राप्त होता है । जीव में भी सरस्वती की एक धारा बहने लगती है । यह धारा वासना के सन्ताप की प्रबलता में सूख जाती है । वासना नष्ट हुई और यह प्रवाह फिर से बहने लगा । २. इस ज्ञानप्रवाह के बहने से मनुष्य इन्द्रियों को वशीभूत करने के लिए प्रवृत्त होता है । वह विषयों का दास नहीं बना रहता । इस प्रकार प्रभु इस भक्त को (ईशानकृत्) = ईशान बना देते हैं और (दाशुषे) = इस दाश्वान् - भोगासक्त न होकर देने की वृत्तिवाले के लिए (दशस्यन्) = प्रभु सब - कुछ देते हैं । प्रभुकृपा से दाश्वान् को किसी बात की कमी नहीं होती । ३. वे (तुर्वणिः) = शीघ्रता से कार्यों को करनेवाले व शत्रुओं के संहारक प्रभु (तुर्वीतये) = कामादि शत्रुओं पर विजय पानेवाले व्यक्ति के लिए (गाधं कः) = प्रतिष्ठा [गाधृ प्रतिष्ठायाम्] को करते हैं । इस तुर्वीति का जीवन अप्रतिष्ठ - निराधार नहीं रहता, अथवा प्रभु तुर्वीति के लिए (गाधं कः) = नदी - जल को अगाध नहीं रहने देते । इसके लिए प्रभु वासना - सरित् को उथला कर देते हैं ताकि यह उसे सुगमता से पार कर सके ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुकृपा से हममें ज्ञानप्रवाह जोकि शुष्ण - वासना के कारण शुष्क हो गये थे, फिर से चलने लगते हैं । हम ईशान् व दाश्वान् बनते हैं । प्रभु हमारे लिए वासना - सरित् की गहराई को दूर कर देते हैं ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

अस्य सभाद्यध्यक्षस्य त्वेषसा सह वर्त्तमानाः शूराः स्तनयित्नव इव रन्तो रमन्ते यद्यः सिन्धव इव सीं वज्रेण शत्रुसेनाः पर्यच्छत्सर्वतो निगृह्णाति य ईशानकृत् तुर्वीतये दाशुषे दशस्यन् तुर्वणिः शत्रुबलं गाधं कः करोति स सेनाध्यक्षत्वमर्हति ॥ ११ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य सूर्य्यस्य वा (इत्) अपि (उ) वितर्के (त्वेषसा) विद्यान्यायबलप्रकाशेन कान्त्या वा (रन्त) रमन्ते। अत्र लङि बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्। (सिन्धवः) समुद्रनदीवत् कठिनावगाहाः शत्रवः (परि) सर्वतः (यत्) येन (वज्रेण) शस्त्रसमूहेन छेदनाकर्षणादिगुणैः (सीम्) सेनाम् (अयच्छत्) यच्छेत् (ईशानकृत्) ईशानानैश्वर्यवतः करोतीति (दाशुषे) दानकरणशीलाय (दशस्यन्) दशति येन तद्दशस्तदिवाचरतीति। अत्र दंश धातोरसुन् प्रत्ययः स च चित्। तत उपमानादाचारे (अष्टा०३.१.१०) इति क्यच्। (तुर्वीतये) तुराणां शीघ्रकारिणां व्याप्तिस्तस्यै (गाधम्) विलोडनम् (तुर्वणिः) यस्तुरः शीघ्रकरान् वनति सम्भजति सः (कः) करोति। अयमडभावे लुङ्प्रयोगः ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यो मनुष्यो यस्य सभाद्यध्यक्षस्य सहायेन शत्रून् विजित्य पृथिवीराज्यं संसेव्य सुखी प्रतापी भवति, स सर्वेषां शत्रूणां विलोडनं कर्त्तुमर्हति ॥ ११ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By the might and splendour of this Indra, the rivers flow and seas roll at will since he gives the blow (to Vritra and releases the waters below). Ruler, controller, and giver of power and honour, instantly victorious, giving liberally to the generous, he creates firm standing ground for the speedy success of generosity all round.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. जसे सूर्याच्या साह्याने मेघाला जिंकता येते तसे जो सभाध्यक्ष शत्रूंना जिंकतो तो पृथ्वीवरील राज्याचे सेवन करून सुखी होतो तोच सर्व शत्रूंचे दमन करू शकतो. ॥ ११ ॥