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उ॒शिक्पा॑व॒को वसु॒र्मानु॑षेषु॒ वरे॑ण्यो॒ होता॑धायि वि॒क्षु। दमू॑ना गृ॒हप॑ति॒र्दम॒ आँ अ॒ग्निर्भु॑वद्रयि॒पती॑ रयी॒णाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uśik pāvako vasur mānuṣeṣu vareṇyo hotādhāyi vikṣu | damūnā gṛhapatir dama ām̐ agnir bhuvad rayipatī rayīṇām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒शिक्। पा॒व॒कः। वसुः॑। मानु॑षेषु। वरे॑ण्यः। होता॑। अ॒धा॒यि॒। वि॒क्षु। दमू॑ना। गृ॒हऽप॑तिः। दमे॑। आ। अ॒ग्निः। भु॒व॒त्। र॒यि॒ऽपतिः॑। र॒यी॒णाम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:60» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि जो (उशिक्) सत्य की कामनायुक्त (पावकः) अग्नि के तुल्य पवित्र करने (वसुः) वास कराने (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (दमूनाः) दम अर्थात् शान्तियुक्त (गृहपतिः) गृह का पालन करने तथा (रयिपतिः) धनों को पालने (अग्निः) अग्नि के समान (मानुषेषु) युक्तिपूर्वक आहार-विहार करनेवाले मनुष्य (विक्षु) प्रजा और (दमे) गृह में (रयीणाम्) राज्य आदि धन और होता सुखों का देनेवाला (भुवत्) होवे, वही प्रजा में राजा (अधायि) धारण करने योग्य है ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि अधर्मी मूर्खजन को राज्य की रक्षा का अधिकार कदापि न देवें ॥ ४ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उशिक् पावक

पदार्थान्वयभाषाः - १. वे प्रभु (उशिक्) = [कामयमानः] अपने सखा जीव का हित चाहनेवाले हैं । उसका हित करने के लिए ही (पावकः) = उसके जीवन को पवित्र बनानेवाले हैं । जीव को पवित्र बनाकर (वसः) = उनके निवास को उत्तम बनानेवाले हैं । २. (मानुषेषु) = विचारशील पुरुषों में (वरेण्यः) = वरण के योग्य हैं । जब हम विचार नहीं करते तो गलती से प्रकृति का वरण कर बैठते हैं, विचारशील पुरुष प्रभु का ही वरण करते हैं । ३. (होता) = वे प्रभु इस मित्र जीव को उन्नति के साधन प्राप्त कराने के लिए इस सृष्टियज्ञ के होता बनते हैं । सम्पूर्ण सृष्टि जीव की उन्नति के साधनार्थ ही बनाई गई है । ये प्रभु (विक्षु अधायि) = सब प्रजाओं के हृदयदेश में स्थित हैं । हृदयस्थ होकर सब पदार्थों के 'यथायोग' के लिए प्रेरणा दे रहे हैं । इन पदार्थों का 'अयोग' तो हमें लाभ ही क्या दे सकता है, 'अतियोग' हानिकर हो जाता है, 'यथायोग' के लिए प्रभु प्रेरणा दे रहे हैं । ४. (दमूनाः) = [दम इति गृहनाम तन्मनः - निरु०] वे प्रभु इस शरीररूप घर में ही मनवाले हैं, इसे सुन्दर बनाने का ही सतत ध्यान कर रहे हैं । (गृहपतिः) = इस गृह के रक्षक हैं । वे (अग्निः) = अग्रणी प्रभु दमे (आभुवत्) = इस घर में सदा रहते हैं और (रयीणां रयिपतिः) = सर्वोत्कृष्ट धनों के स्वामी हैं । इन उत्कृष्ट धनों से इस शरीररूप गृह को धन्य व अलंकृत करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वे महान् मित्र प्रभु हमारा हित चाहते हैं, सदा इस शरीरगृह में सावधान होकर इसका रक्षण व अलंकरण करते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

मनुष्यैर्य उशिक् पावको वसुर्वरेण्यो दमूना गृहपती रयिपतिरग्निरिव मानुषेषु विक्षु दमे च रयीणां होता दाता भुवद्भवेत्, स प्रजापालनक्षम अधायि ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उशिक्) सत्यं कामयमानः (पावकः) पवित्रः (वसुः) वासयिता (मानुषेषु) युक्त्याहारविहारकर्त्तृषु (वरेण्यः) वरितुं स्वीकर्त्तुमर्हः (होता) सुखानां दाता (अधायि) धीयते (विक्षु) प्रजासु (दमूनाः) दाम्यति येन सः। अत्र दमेरुनसि० (उणा०४.२४०) इत्युनस् प्रत्ययो अन्येषामपि इति दीर्घः। (गृहपतिः) गृहस्य पालयिता (दमे) गृहे (आ) समन्तात् (अग्निः) भौतिकोऽग्निरिव (भुवत्) भवेत्। अयं लेट् प्रयोगः। (रयिपतिः) धनानां पालयिता (रयीणाम्) राज्यादिधनानाम् ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्नैव कदाचिदविद्वानधार्मिको राज्यरक्षायामधिकर्त्तव्यः ॥ ४ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The man of love and initiative worthy of love, pure and purifying as fire, generous among people, worthy of choice, commanding loyalty, dedicated to yajna and social good, such a person should be given a prominent position among people. Man of peace and self-control, keeper and protector of the home, creator and protector of wealth, such a person shines as fire on top and commands the nation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

Men should appoint among the subjects only such a person in charge of the administration of the State who is 'splendid like the fire, who desires truth, who is pure and purifying, the most desirable among discreet men, giver of happiness, self-controlled protector of the house and the State, the guardian of all kinds of wealth, the giver of dwellings or habitation.

पदार्थान्वयभाषाः - ( उशिक्) सत्यं कामयमानः = Desiring truth वश-कान्तौ (दमे) गृहे = In the house. दमे इति गृहनाम ( निघ० ३.४) Tr.
भावार्थभाषाः - Men should never appoint an unrighteous and un-educated person in charge of the administration.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी अधार्मिक मूर्ख लोकांना राज्याच्या रक्षणाचा अधिकार कधीही देऊ नये. ॥ ४ ॥