इन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्युषा। म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा॥
indreṇa saṁ hi dṛkṣase saṁjagmāno abibhyuṣā | mandū samānavarcasā ||
इन्द्रे॑ण। सम्। हि। दृक्ष॑से। स॒म्ऽज॒ग्मा॒नः। अबि॑भ्युषा। म॒न्दू इति॑। स॒मा॒नऽव॑र्चसा॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त पदार्थ किस के सहाय से कार्य्य के सिद्ध करनेवाले होते हैं, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
आनन्द व दीप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
केन सहैते कार्य्यसाधका भवन्तीत्युपदिश्यते।
अयं वायुरबिभ्युषेन्द्रेणैव संजग्मानः सन् तथा वायुना सह सूर्य्यश्च सङ्गत्य संदृक्षसे दृश्यते दृष्टिपथमागच्छति हि यतस्तौ समानवर्चसौ वर्तेते तस्मात्सर्वेषां मन्दू भवतः॥७॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The air or the wind is seen with the presence of the Omnipotent All-pervading God and the rays of the sun. Both of them (the air and the sun) are givers of joy and are of equal splendor.
