यु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥
yuñjanti bradhnam aruṣaṁ carantam pari tasthuṣaḥ | rocante rocanā divi ||
यु॒ञ्जन्ति॑। ब्र॒ध्नम्। अ॒रु॒षम्। चर॑न्तम्। परि॑। त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते। रो॒च॒ना। दि॒वि॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
छठे सूक्त के प्रथम मन्त्र में यथायोग्य कार्य्यों में किस प्रकार से किन-किन पदार्थों को संयुक्त करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सूर्यादि के ज्ञान में मन का लगाना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्रोक्तविद्यार्थं केऽर्था उपयोक्तव्या इत्युपदिश्यते।
ये मनुष्या अरुषं ब्रध्नं परितस्थुषश्चरन्तं परमात्मानं स्वात्मनि बाह्यदेशे सूर्य्यं वायुं वा युञ्जन्ति ते रोचना सन्तो दिवि प्रकाशे रोचन्ते प्रकाशन्ते॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
(1) Those persons who are in communion with Omnipresent God Who is Great are kind and non-violent in their hearts knowing all animate and inanimate objects, shine in Resplendent God. (2) The Mantra is equally applicable to the sun, the Prana or vital breaths or fire (Agni). Those who know the real nature of the sun and the prana, shine. They become glorious.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)सूर्य व वायूद्वारे जशी पुरुषार्थाची सिद्धी केली पाहिजे, ते गोल जगात कशाप्रकारे आहेत व त्यांचा लाभ कसा करून घेतला पाहिजे, इत्यादी प्रयोजनांनी पाचव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर सहाव्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे.
