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देवता: अग्निः ऋषि: नोधा गौतमः छन्द: जगती स्वर: निषादः

तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ आ वात॑चोदितो यू॒थे न सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः। अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रजः॑ स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिणः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tapurjambho vana ā vātacodito yūthe na sāhvām̐ ava vāti vaṁsagaḥ | abhivrajann akṣitam pājasā rajaḥ sthātuś caratham bhayate patatriṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तपुः॑ऽजम्भः। वने॑। आ। वात॑ऽचोदितः। यू॒थे। न। सा॒ह्वान्। अव॑। वा॒ति॒। वंस॑गः। अ॒भि॒ऽव्रज॑न्। अक्षि॑तम्। पाज॑सा। रजः॑। स्था॒तुः। च॒रथ॑म्। भ॒य॒ते॒। प॒त॒त्रिणः॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:58» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्य लोगो ! जो (वंसगः) भिन्न-भिन्न पदार्थों को प्राप्त होता (वातचोदितः) प्राणों से प्रेरित (तपुर्जम्भः) जिस का मुख के समान प्रताप, वह जीव अग्नि के सदृश जैसे (यूथम्) सेना में (साह्वान्) सहनशील जीव (अववाति) सब शरीर की चेष्टा कराता है, जो विस्तृत होके दुःखों का हनन करता जो (अभिव्रजन्) जाता-आता हुआ (चरथम्) चरनेहारे (अक्षितम्) क्षयरहित (रजः) कारण के सहित लोकसमूह को (पाजसा) बल से धरता जो (स्थातुः) स्थिर वृक्ष में बैठे हुए (पतत्रिणः) पक्षी के समान (भयते) भय करता है, सो तुम्हारा आत्मस्वरूप है, इस प्रकार तुम लोग जानो ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि जो अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार, प्राण अर्थात् प्राणादि दशवायु इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्रादि दश इन्द्रियों का प्रेरक, इन का धारक और नियन्ता, स्वामी, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आदि गुणवाला है, वह इस देह में जीव है, ऐसा निश्चित जानो ॥ ५ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अक्षयलोक की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - १. (तपुर्जम्भः) = तपस्यायुक्त है मुख जिसका, अर्थात् जिसे खान - पान का कोई चस्का नहीं है, (वने) = उस प्रभु की उपासना में (आवातचोदितः) सब प्रकार से वायु से प्रेरणा को प्राप्त किया हुआ, अर्थात् जो प्रभु का ध्यान करता है और वायु की भाँति क्रियाशील बना रहता है, यह व्यक्ति (यूथे) = गौवों के झुण्ड में (वंसगाः) = वननीय गतिवाले (साह्वान्) = प्रतिस्पर्धियों का पराभव करनेवाले वृषभ की भाँति (अववाति) = विषयों से दूर हो जाता है । विषय गोयूथ के समान हैं, यह तपुर्जम्भ उनमें विचरनेवाले वृषभ की भाँति है । इन विषयों में विचरता हुआ यह काम - क्रोध - लोभादि प्रतिस्पर्धियों से पराभूत नहीं होता । कामादि को पराभूत करके ही यह विषयों का यथायोग्य सेवन करता है । २. इस प्रकार विषयों का यथायोग्य सेवन करता हुआ यह (पाजसा )- शक्ति के द्वारा (अक्षितं रजः) = अक्षयलोक की (अभिवज्रन्) = ओर जानेवाला होता हैं ३. (पतत्रिणः) = कामादि शत्रुओं पर प्रबल आक्रमण करनेवाले इस 'गौतम' से (स्थातुः चरथम्) = सारा स्थावर व जंगम संसार (भयते) = भयभीत होता है, अर्थात् उसके वशवर्ती होकर उसकी अनुकूलता में चलता है । जिसने काम आदि को जीत लिया वह सारे संसार को ही जीत लेता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम स्वादेन्द्रिय को जीतें, वायु की भाँति क्रियावाले हों । विषयवासना से ऊपर उठकर विचरें । शक्तिसम्पन्न होकर अक्षय लोक की ओर चलें । काम आदि पर आक्रमण करनेवाले हमसे सारा लोक भयभीत हो ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यो वंसगो वातचोदितस्तपुर्जम्भोऽग्निरिव जीवो यूथे साह्वानाववाति विस्तृतो भूत्वा हिनस्ति योऽभिव्रजन् चरथमक्षितं रजः पाजसा धरति स्थातुस्तिष्ठतो वृक्षादेर्मध्ये पतत्रिण इव भयते तद्युष्माकमात्मस्वरूपमस्तीति विजानीत ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तपुर्जम्भः) तपूंषि तापा जम्भो वक्रमिव यस्य सः (वने) रश्मौ (आ) समन्तात् (वातचोदितः) वायुना प्रेरितः (यूथे) सैन्ये (न) इव (साह्वान्) सहनशीलो वीरः (अव) विनिग्रहे (वाति) गच्छति (वंसगः) यो वंसान् सम्भक्तान् पदार्थान् गच्छति प्राप्नोति सः (अभिव्रजन्) अभितः सर्वतो गच्छन् (अक्षितम्) क्षयरहितम् (पाजसा) बलेन। पाज इति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) (रजः) सकारणं लोकसमूहम् (स्थातुः) कृतस्थितेः (चरथम्) चर्यते गम्यते भक्ष्यते यस्तम् (भयते) भयं जनयति। अत्र व्यत्ययेन बहुलं छन्दसि इति शपो लुक् आत्मनेपदञ्च (पतत्रिणः) पक्षिणः ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्योऽन्तःकरणप्राणेन्द्रियशरीरप्रेरकः सर्वेषामेतेषां धर्त्ता नियन्ताऽधिष्ठातेच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानादिगुणोऽस्ति सोऽत्र देहे जीवोऽस्तीति वेद्यम् ॥ ५ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Voracious power of the jaws of flame, enveloped in the rays of its own light, inspired by the energy of Vayu, it moves around bold and fearless like a bull in the herd of cows in the forest far and near. It moves across the moving and undecaying world of earth and sky up and down with its force, and the world feels afraid of it whether it stays or flies like a bird.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the soul is taught further in the fifth mantra.

अन्वय:

The soul is like the fire with devouring flames, moved or excited by the breeze, assailing the un-exhaled moisture of the trees, with all its strength. It is like the bull that rushes triumphant against all things in the forest and all, whether stationary or movable are afraid of it, like the birds sitting on a tree. The soul is like wise mighty person moved or excited by the Prana. Going everywhere fearlessly like a recluse or Sanyasi, it upholds the worlds with its power of knowledge and all wicked or unrighteous persons are afraid of him. You should know this to be the nature of your soul.

भावार्थभाषाः - Men should know that the soul in the body is the impeller of the body, its organs and inner senses, their upholder, controller, master, possessing desires, malice, volition, happiness. misery and consciousness. (पाजसा) बलेन पाज इति बलनाम ( निघ० २.९) = With its strength.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी जो अंतःकरण (अर्थात) मन, बुद्धी, चित्त, अहंकार, प्राण अर्थात प्राण इत्यादी दहा वायू अर्थात श्रोत्र इत्यादी दहा इंद्रियांचा प्रेरक, त्यांचे धारण व नियंता स्वामी, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख व ज्ञान इत्यादी गुणयुक्त असतो तो या देहात जीव आहे, हे निश्चित जाणा. ॥ ५ ॥