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देवता: इन्द्र: ऋषि: सव्य आङ्गिरसः छन्द: जगती स्वर: निषादः

तं गू॒र्तयो॑ नेम॒न्निषः॒ परी॑णसः समु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यवः॑। पतिं॒ दक्ष॑स्य वि॒दथ॑स्य॒ नू सहो॑ गि॒रिं न वे॒ना अधि॑ रोह॒ तेज॑सा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ gūrtayo nemanniṣaḥ parīṇasaḥ samudraṁ na saṁcaraṇe saniṣyavaḥ | patiṁ dakṣasya vidathasya nū saho giriṁ na venā adhi roha tejasā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम्। गू॒र्तयः॑। ने॒म॒न्ऽइषः॑। परी॑णसः। स॒मु॒द्रम्। न। स॒म्ऽचर॑णे। स॒नि॒ष्यवः॑। पति॑म्। दक्ष॑स्य। वि॒दथ॑स्य। नु। सहः। गि॒रिम्। न। वे॒नाः। अधि॑। रो॒ह॒। तेज॑सा ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:56» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:21» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे कन्ये ! तू (संचरणे) अच्छे प्रकार समागम में (न) जैसे (सनिष्यवः) सम्यक् विविध सेवन करनेहारी नदियाँ (समुद्रम्) सागर को प्राप्त होती और (न) जैसे बादल (गिरिम्) मेघ को प्राप्त होते हैं, वैसे जो (परीणसः) बहुत (नेमन्निषः) प्राप्त होने योग्य इष्ट सुखदायक (गूर्त्तयः) उद्यमयुक्त बुद्धिमती ब्रह्मचारिणी और (वेनाः) बुद्धिमान् ब्रह्मचारी लोग समावर्त्तन के पश्चात् परस्पर प्रीति के साथ विवाह करें (दक्षस्य) हे कन्ये ! तू सब विद्याओं में अतिचतुर (विदथस्य) पूर्णविद्यायुक्त विद्वान् से विद्या को प्राप्त हुए (पतिम्) स्वामी को (अधिरोह) प्राप्त हो (तेजसा) अतीव तेज से (तम्) उसको प्राप्त हो के (सहः) बल को (नु) शीघ्र प्राप्त हो ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब लड़के और लड़कियों को योग्य है कि यथोक्त ब्रह्मचर्य्य के सेवन से सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ के पूर्ण युवावस्था में अपने तुल्य, गुण कर्म और स्वभाववाले परस्पर परीक्षा करके अतीव प्रेम के साथ विवाह कर पुनः जो पूर्ण विद्यावाले हों तो लड़के लड़कियों को पढ़ाया करें, जो क्षत्रिय हों तो राजपालन और न्याय किया करें, जो वैश्य हों तो अपने वर्ण के कर्म और जो शूद्र हों तो अपने कर्म किया करें ॥ २ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तेजस्विता व प्रभु - प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. (तम्) = उस परमात्मा को [अधिरोहन्ति] प्राप्त होते हैं वे व्यक्ति जो - [क] (गूर्तयः) = [गृणन्ति] स्तुति करनेवाले हैं अथवा [गुरी उद्यमने] उद्योगशील हैं, [ख] (नेमन् इषः) = [नमन्तः इष्यन्ति] नम्रता से उसके चरणों में आनेवाले अथवा [नीताः इषः यैः] हवि को प्राप्त करनेवाले [ग] (परिणसः) = [परितो नसन्ति] चारों ओर कर्मों में व्याप्त गतिवाले हैं । ये प्रभु को उसी प्रकार प्राप्त होते हैं (न) = जैसे कि (सनिष्यवः) व्यापार आदि से धनों को प्राप्त करने की कामनावाले (संचरणे) = व्यापार [Transactions] के निमित्त (समुद्रम्) = समुद्र को प्राप्त होते हैं । यहाँ प्रसङ्गवश धन - वृद्धि के लिए देश - देशान्तर से व्यापार का सुन्दर संकेत है । २. हे जीव ! तू (दक्षस्य) = सम्पूर्ण वृद्धियों के, शक्तियों के तथा (विदथस्य) = ज्ञानों के (पतिम्) = स्वामी (सहः) = बल के पुञ्ज उस प्रभु को (तेजसा) = तेजस्विता के द्वारा, तेजस्विता को सिद्ध करके (अधिरोह) = आरूढ़ [प्राप्त] होनेवाला बन । (न) = जिस प्रकार (वेनाः) = पुष्पादि की कामनावाली स्त्रियाँ (गिरिम्) = पर्वत पर आरूढ़ होती हैं । फूलों के चयन के लिए जिस प्रकार वे पर्वत को प्राप्त होती हैं उसी प्रकार तु बल [दक्ष] तथा ज्ञान [विदथ] की प्राप्ति के लिए उस प्रभु को प्राप्त कर । प्रभु - प्राप्ति के लिए तू तेजस्वी बन । प्रभु - प्राप्ति भी पर्वतारोहण की भाँति कठिन है, उसके लिए शक्ति का सम्पादन आवश्यक है । निर्बल व्यक्ति प्रभु को प्राप्त नहीं किया करता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - स्तोता, हविष्मान् व व्यापक कर्मोंवाले बनकर तेजस्विता को सिद्ध करते हुए हम प्रभु को प्राप्त करें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे कन्ये ! त्वं संचरणे सनिष्यवः समुद्रं नद्यो न गिरिं न परीणसो नेमन्निषो गूर्त्तयो धीमत्यो ब्रह्मचारिण्यो वेना मेधाविनो ब्रह्मचारिणः समावर्त्तनात् पश्चात् परस्परं प्रीत्या विवाहं कुर्वन्तु, दक्षस्य विदथस्य विदुषः सकाशात् प्राप्तविद्यां पतिमधिरोह तं तेजसा प्राप्य सहो नु प्राप्नुहि ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) पूर्वोक्तम् (गूर्त्तयः) उद्यमयुक्ताः कन्याः (नेमन्निषः) नीयन्त इष्यन्ते च यास्ताः (परीणसः) बह्व्यः। परीणस इति बहुनामसु पठितम्। (निघं०३.१) (समुद्रम्) सागरम् (न) इव (संचरणे) सङ्गमने (सनिष्यवः) संविभागमिच्छवः (पतिम्) स्वामिनम् (दक्षस्य) चतुरस्य (विदथस्य) विज्ञानयुक्तस्य (नु) शीघ्रम् (सहः) बलम् (गिरिम्) मेघम् (न) इव (वेनाः) मेधाविनः। वेन इति मेधाविनामसु पठितम्। (निघं०३.१५) (अधि) उपरिभावे (रोह) (तेजसा) प्रतापेन ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारौ। सर्वैर्बालकैः कन्याभिश्च यथाविधिसेवितेन ब्रह्मचर्य्येणाऽखिला विद्या अधीत्य पूर्णयुवावस्थायां तुल्यगुणकर्मस्वभावान् परीक्ष्यान्योन्यमतिप्रेमोद्भवानन्तरं विवाहं कृत्वा पुनर्यदि पूर्णविद्यास्तर्हि बालिका अध्यापयेयुः। क्षत्रियवैश्यशूद्रवर्णयोग्याश्चेत्तर्हि स्व-स्ववर्णोचितानि कर्माणि कुर्य्युः ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as the streams flow to join the sea in common and waters glide round the mountain, so hosts of admirers, loving and loved and eager to join Indra, lord and protector of the mighty and versatile order of humanity, rise and, with their strength and splendour, augment his power and majesty deep as the ocean and high as a mountain peak.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are they (teachers and preachers) is taught in the second Mantra.

अन्वय:

O girl, as rivers go to the sea and as intelligent industrious Brahamcharies giving happiness and highly intelligent Brahamacharis after Samavanrtana (completion of education in the Gurukula) marry one another, you should marry a husband who has received education from a highly learned and expert experienced person and acquire also strength with splendor.

पदार्थान्वयभाषाः - ( परीणसः) बह् यः । परीणस इति बहुनाम ( निघ० ३.१ ) = Many. (विदधस्य) विज्ञानयुक्तस्य = Of a highly learned person. (वेनाः) मेधाविनः वेन इति मेधाविनम् = Highly intelligent persons.
भावार्थभाषाः - All boys and girls should study all sciences with the observance of Brahmacharya (continence) and after the attainment of full youth, they should enter into wedlock, having known and tested one another's merits, actions and temperaments and after the development of mutual love. If they are highly learned, they should teach boys and girls, otherwise, they should discharge the duties of the Kshatriyas, Vaishayas or Shudras to which ever Varna (class-not caste by birth) they belong according to their merits, actions and temperament.
टिप्पणी: It is worth while to quote the following foot-note given by Griffith after translating the 2nd Mantra. as "To him the guidance-following songs of praise flow full, as those who seek gain go in company to the flood. To him the Lord of power, the holy synod's might, as to a hill, with speed ascend the loving ones." Griffith's Foot-Note "I find the stanza un-intelligible; and the version (based chiefly on Grassman's) which I offer is merely a temporary makeshift." (The hymns of the Rigveda Translated by Griffith Vol. I. P. 78 Chowkhamba Edition). While we admire the frankness of Mr. Griffith in admitting his inability to understand the real import of the Mantra and giving only a misleading conjectural meaning (as is very often the case of many European Scholars) there is nothing unintelligible in Rishi Dayananda's interpretation as translated above.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. सर्व मुला-मुलींनी ब्रह्मचर्याचे पालन करून सर्व विद्या ग्रहण करावी व पूर्ण युवावस्थेत परस्पर परीक्षा करून आपल्यासारख्या गुण कर्म स्वभाव असलेल्याशी अत्यंत प्रेमाने विवाह करावा. ज्यांनी पूर्ण विद्या प्राप्त केलेली असेल त्यांनी मुला-मुलींना शिकवावे. जे क्षत्रिय असतील त्यांनी राज्याचे पालन करावे व न्यायदान करावे. जे वैश्य असतील त्यांनी आपल्या वर्णाचे कर्म व जे शूद्र असतील तर त्यांनी आपले कर्म करावे. ॥ २ ॥