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स इन्म॒हानि॑ समि॒थानि॑ म॒ज्मना॑ कृ॒णोति॑ यु॒ध्म ओज॑सा॒ जने॑भ्यः। अधा॑ च॒न श्रद्द॑धति॒ त्विषी॑मत॒ इन्द्रा॑य॒ वज्रं॑ नि॒घनि॑घ्नते व॒धम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa in mahāni samithāni majmanā kṛṇoti yudhma ojasā janebhyaḥ | adhā cana śrad dadhati tviṣīmata indrāya vajraṁ nighanighnate vadham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। इत्। म॒हानि॑। स॒म्ऽइ॒थानि॑। म॒ज्मना॑। कृ॒णोति॑। यु॒ध्मः। ओज॑सा। जने॑भ्यः। अध॑। च॒न। श्रत्। द॒ध॒ति॒। त्विषि॑ऽमते। इन्द्रा॑य। वज्र॑म्। नि॒ऽघनि॑घ्नते। व॒धम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:55» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (सः) वह (युध्मः) युद्ध करनेवाला उपदेशक (मज्मना) बल वा (ओजसा) पराक्रम से युक्त हो के (जनेभ्यः) मनुष्यादिकों के सुख के लिये उपदेश से (महानि) बड़े पूजनीय (समिथानि) संग्रामों को जीतनेवाले के तुल्य अविद्या विजय को (कृणोति) करता है (वज्रम्) वज्रप्रहार के समान शत्रुओं के (वधम्) मारने को (निघनिघ्नते) मारनेवाले के समान आचरण करता है, तो (अध) इसके अनन्तर (इत्) ही (अस्मै) इस (त्विषीमते) प्रशंसनीय प्रकाशयुक्त (इन्द्राय) परमैश्वर्य्य की प्राप्ति करानेवाले के लिये सब मनुष्य लोग (चन) भी (श्रद्दधति) प्रीति से सत्य का धारण करते हैं ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को उत्पन्न, काट और वर्षा करके अपने प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दयुक्त करता है, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक लोग विद्या को प्राप्त करा और अविद्या को जीत के अन्धपरम्परा को निवारण कर विद्यान्यायादि का प्रकाश करके सब प्रजा को सुखी करें ॥ ५ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पवित्रता व ओजस्विता

पदार्थान्वयभाषाः - १. (सः) = वे प्रभु ही (इत्) = निश्चय से (महानि समिथानि) = बड़े - बड़े संग्रामों को, वासनाओं से चलनेवाले युद्धों को (मज्मना) = शोधन के दृष्टिकोण से (कृणोति) = करते हैं । इन वासनाओं से संग्राम में हम तो विजय नहीं पा सकते । प्रभु ही युद्ध करते हैं और इन वासनाओं को पराभूत करके हमारे हृदयों का शोधन करनेवाले होते हैं । २. वे प्रभु ही (जनेभ्यः) = अपनी शक्तियों का विकास करनेवाले लोगों के लिए (ओजसा) = ओज के हेतु से (युध्मः) = योद्धा बनते हैं । योद्धा बनकर प्रभु कामादि को भस्म कर देते हैं और मनुष्य का जीवन चमक उठता है । ३. (अध चन) = अब इस विजय के बाद ही लोग (त्विषीमते) = दीप्तिवाले (इन्द्राय) = शत्रुनाशक प्रभु के लिए (श्रपति) = श्रद्धा करते हैं और समझते हैं कि प्रभु ही इन कामादि के (वधम्) = हनन के साधनभूत (वज्रम्) = क्रियाशीलतारूप वज्र को (निघनिघ्नते) = खूब ही प्रहत करते हैं । प्रभु ही इन कामादि का नाश करते हैं, यह भावना भक्त को प्रभु के प्रति श्रद्धान्वित करती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - काम - क्रोध - लोभादि के साथ चलनेवाले संग्राम को हमारे लिए प्रभु ही जीतते हैं । वे ही हमारे योद्धा हैं । इन वासनाओं को जीतकर प्रभु हमें शुद्ध, पवित्र व ओजस्वी बनाते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

यदि स युध्मो मज्मनौजसा जनेभ्य उपदेशेन महानि समिथानि कृणोति करोति वज्रमिव वधं निघनिघ्नतेऽधाथ तर्ह्यस्मा इत् त्विषीमत इन्द्राय चन जनाः श्रद्दधति ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (इत्) एव (महानि) महान्ति पूज्यानि (समिथानि) सम्यक् यन्ति यानि विज्ञानानि तानि (मज्मना) बलेन। मज्मेति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) (कृणोति) करोति (युध्मः) अविद्याकुटुम्बस्य प्रहर्त्ता (ओजसा) पराक्रमेण (जनेभ्यः) मनुष्येभ्यः (अध) अथ। निपातस्य च इति दीर्घः। (चन) अपि (श्रत्) सत्यम्। श्रदिति सत्यनामसु पठितम्। (निघं०३.१०) (दधति) धरन्ति (त्विषीमते) प्रशस्तप्रकाशान्तःकरणवते (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययोजकाय (वज्रम्) शस्त्रमिवाज्ञानच्छेदकमुपदेशम् (निघनिघ्नते) यो हन्ति स निघ्नः स इवाचरति। अत्र निघ्नशब्दाद् आचारे क्विप् ततो लट् शपः श्लुः व्यत्ययेन आत्मनेपदं च। (वधम्) हननम् ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यो मेघमुत्पाद्य छित्वा वर्षित्वा स्वप्रकाशेन सर्वानानन्दयति तथाऽध्यापकोपदेशकावन्धपरम्परां निवार्य विद्यान्यायादीन् प्रकाश्य सर्वाः प्रजाः सुखिनीः कुर्याताम् ॥ ५ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Great warrior as he is, fighting with the brilliance of his knowledge, wealth and power against ignorance, injustice and poverty, he wins great battles for the people. He strikes the thunderbolt against evil, wickedness and hoarding for the glory of the order, and then the people vest full faith in him, lord of splendour and majesty as he is.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is he (Indra) is taught further in the fifth Mantra.

अन्वय:

People have faith in and reverence for the divinely resplendent Indra (True teacher or preacher full of the great wealth of wisdom and knowledge) when he as a waiver of Truth engages himself in many great conflicts with ignorance and injustice being over-thrower of the family of ignorance or nescience by his over whelming soul force and the power of knowledge. He uses his sermon as a powerful weapon to cut into pieces ignorance of various kinds.

पदार्थान्वयभाषाः - ( समिथानि) सम्यग् यन्ति यानि विज्ञानानि तानि = Sciences or various kinds of knowledge. ( युध्म:) अविद्याकुटुम्बस्य प्रहर्ता = Assaulter of the family of ignorance or a warrior of Truth ( वज्रम् ) शस्त्रम् इव अज्ञानच्छेदकम् उपदेशम् = Sermon that cuts into pieces all ignorance like the thunderbolt or powerful weapon.
भावार्थभाषाः - As the sun gives delight to all with his rays, demolishing the cloud and making it rain down, in the same way, it is the duty of the teacher and the preacher to remove or set aside all superstition and to make all people happy by giving the light of knowledge and justice.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्य मेघ उत्पन्न करतो त्याला खंडित करून वृष्टी करवितो व आपल्या प्रकाशाने सर्व माणसांना आनंदी करतो तसेच अध्यापक व उपदेशक यांनी विद्या प्राप्त करून अविद्येवर मात करून अंध परंपरेचे निवारण करून विद्या, न्याय इत्यादींनी प्रजेला सुखी करावे. ॥ ५ ॥