वांछित मन्त्र चुनें
देवता: इन्द्र: ऋषि: सव्य आङ्गिरसः छन्द: जगती स्वर: निषादः

स इद्वने॑ नम॒स्युभि॑र्वचस्यते॒ चारु॒ जने॑षु प्रब्रुवा॒ण इ॑न्द्रि॒यम्। वृषा॒ छन्दु॑र्भवति हर्य॒तो वृषा॒ क्षेमे॑ण॒ धेनां॑ म॒घवा॒ यदिन्व॑ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa id vane namasyubhir vacasyate cāru janeṣu prabruvāṇa indriyam | vṛṣā chandur bhavati haryato vṛṣā kṣemeṇa dhenām maghavā yad invati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। इत्। वने॑। न॒म॒स्युऽभिः॑। व॒च॒स्य॒ते॒। चारु॑। जने॑षु। प्र॒ऽब्रु॒वा॒णः। इ॒न्द्रि॒यम्। वृषा॑। छन्दुः॑। भ॒व॒ति॒। ह॒र्य॒तः। वृषा॑। क्षेमे॑ण। धेना॑म्। म॒घवा॑। यत्। इन्व॑ति ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:55» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा कर्म करे, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो अध्यापक वा उपदेशकर्त्ता (वने) एकान्त में एकाग्र चित्त से (जनेषु) प्रसिद्ध मनुष्यों में (चारु) सुन्दर (इन्द्रियम्) मन को (ब्रुवाणः) अच्छे प्रकार कहता (हर्य्यतः) और सबको उत्तम बोध की कामना करता हुआ (प्रभवति) समर्थ होता है (वृषा) दृढ़ (मघवा) प्रशंसित विद्या और धनवाला (छन्दुः) स्वच्छन्द (वृषा) सुख वर्षानेवाला (क्षेमेण) रक्षण के सहित (धेनाम्) विद्या शिक्षायुक्त वाणी को (इन्वति) व्याप्त करता है (स इत्) वही (नमस्युभिः) नम्र विद्वानों से (वचस्यते) प्रशंसा को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - उत्तम विद्वान् सभाध्यक्ष सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को प्राप्त करके सबको विद्यायुक्त, बहुश्रुत, रक्षा वा स्वच्छन्दतायुक्त करें कि जिससे सब निस्सन्देह होकर सदा सुखी रहें ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञों द्वारा उपासन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (स इत्) = वह प्रभु ही (वने) = एकान्त देश में (नमस्युभिः) नमन की इच्छावालों से, स्तोताओं से (वचस्यते) = [स्तूयते] स्तुति किया जाता है । २. यह प्रभु (जनेषु) = शक्तियों का विकास करनेवाले मनुष्यों में चारु (इन्द्रियम्) = सुन्दर शक्ति को (प्रब्रुवाणः) = [प्रकटयन्] प्रकट करनेवाले होते हैं । ३. (वृषा) = शक्ति के प्रकाश के द्वारा ये इस भक्त पर सुखों का वर्षण करते हैं तथा (हर्यतः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों की कामनावाले पुरुष का यह (छन्दुः) = [उपच्छन्दयिता] यज्ञों में रुचि पैदा करनेवाला (भवति) = होता है । ४. इस रुचि को वह तब पैदा करता है (यत्) = जबकि (वृषा) = वह सुखपूर्वक शक्तिशाली प्रभु (क्षेमेण) = प्रजाओं के क्षेम के हेतु से (मघवा) = ऐश्वर्यों व यज्ञोंवाला होता हुआ (धेनाम्) = इस वेदवाणी को (इन्वति) = प्राप्त करता है । इस वेदवाणी के द्वारा ही प्रभु यज्ञात्मक कर्मों का उपदेश करते हैं । अनुष्ठित हुए - हुए ये यज्ञ हमारे क्षेम का साधन बनते हैं, वस्तुतः प्रभु इसी प्रकार हमपर सुखों का वर्षण करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभुस्तवन करें, प्रभु हमारी शक्तियों का वर्धन करेंगे । प्रभुकृपा से हम यज्ञ - रुचि बनते हैं । वेदवाणी में इन कल्याणकर यज्ञों का वर्णन हुआ है ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स किं कुर्यादित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

यद्योऽध्यापक उपदेशको वा वने जनेषु चार्विन्द्रियं ब्रुवाणो हर्यतः प्रभवति वृषा मघवा छन्दुर्वृषा क्षेमेण सहितां धेनामिन्वति स इन्नमस्युभिर्वचस्यते ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) अध्यापक उपदेशको वा (इत्) एव (वने) एकान्ते (नमस्युभिः) नम्रैर्विद्यार्थिभिः श्रोतृभिः (वचस्यते) परिभाष्यते सर्वतः स्तूयते (चारु) सुन्दरम् (जनेषु) प्रसिद्धेषु मनुष्येषु (प्रब्रुवाणः) यः प्रकर्षेण वाचयत्युपदेशयति वा सः (इन्द्रियम्) विज्ञानयुक्तं मनः (वृषा) समर्थः (छन्दुः) स्वच्छन्दः (भवति) वर्त्तते (हर्यतः) सर्वेषां सुबोधं कामयमानः (वृषा) सत्योपदेशवर्षकः (क्षेमेण) रक्षणेन (धेनाम्) विद्याशिक्षायुक्तां वाचम्। धेनेति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं०१.११) (मघवा) प्रशस्तविद्याधनवान् (यत्) यः (इन्वति) व्याप्नोति ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - परमविद्वान् सर्वान् मनुष्यान् सर्वा विद्याः प्रापय्य विद्यावतो बहुश्रुतान् स्वच्छन्दान् सुरक्षितान् कुर्याद्यतो निःसंशयाः सन्तः सदा सुखिनः स्युः ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Celebrated is Indra, far and wide in town and forest and in distant lands, by his admirers in worship and reverence, lord and bold as he is, expressing his knowledge and power among people gracefully. Generous he is, joyous and free, full of blessings for those who are keen to learn and earn the wealth of life. And generous of knowledge, power and protection, glorious all round, he commands the voice of praise and appreciation everywhere.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should he (Indra) do is taught further in the fourth Mantra.

अन्वय:

That teacher or preacher only is glorified or praised by his humble pupils or hearers who in forest (solitary place) desiring that all should get good knowledge proclaims his beautiful vigor amongst men giving them good mind full of knowledge and wisdom. He endowed with the admirable wealth of wisdom, showerer of true precept, powerful and free, utters words that are full of wisdom and education. He is the granter of their noble desires.

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यतः) सर्वेषां सुबोधं कामयमानः = Desiring that all may acquire good knowledge. (हर्य-गतिप्रेप्सयोः ) = Tr. (इन्द्रियम्) विज्ञानयुक्त मनः = Mind full of knowledge. ( धेनाम् ) विद्या शिक्षायुक्तां वाचम् धेनेति वाङ्नाम ( निघ० १.११ ) = Speech endowed with wisdom and education.
भावार्थभाषाः - A highly learned scholar should make all people full of knowledge free and safe by giving them instructions in various sciences, so that they may ever enjoy happiness being free from all doubts.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - उत्तम विद्वान सभाध्यक्षाने सर्व माणसांना सर्व विद्या प्राप्त करून द्यावी. सर्वांना विद्यायुक्त व बहुश्रुत करावे व त्यांचे रक्षण करावे म्हणजे ते निश्चितपणे सुखी होतील. ॥ ४ ॥