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त्वं कर॑ञ्जमु॒त प॒र्णयं॑ वधी॒स्तेजि॑ष्ठयातिथि॒ग्वस्य॑ वर्त॒नी। त्वं श॒ता वङ्गृ॑दस्याभिन॒त्पुरो॑ऽनानु॒दः परि॑षूता ऋ॒जिश्व॑ना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ karañjam uta parṇayaṁ vadhīs tejiṣṭhayātithigvasya vartanī | tvaṁ śatā vaṅgṛdasyābhinat puro nānudaḥ pariṣūtā ṛjiśvanā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। कर॑ञ्जम्। उ॒त। प॒र्णय॑म्। व॒धीः॒। तेजि॑ष्ठया। अ॒ति॒थि॒ऽग्वस्य॑। व॒र्त॒नी। त्वम्। श॒ता। वङ्गृ॑दस्य। अ॒भि॒न॒त्। पुरः॑। अ॒न॒नु॒ऽदः। परि॑ऽसूताः। ऋ॒जिश्व॑ना ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:53» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभाध्यक्ष ! जिस कारण (त्वम्) आप इस युद्धव्यवहार में (तेजिष्ठया) अत्यन्त तीक्ष्ण सेना वा नीतियुक्त बल से (करञ्जम्) धार्मिकों को दुःख देने (पर्णयम्) दूसरे के वस्तु को लेनेवाले चोर को (उत) भी (वधीः) मारते और जो (अतिथिग्वस्य) अतिथियों के जाने आने के वास्ते (वर्तनी) सत्कार करनेवाली क्रिया है, उसकी रक्षा कर (अननुदः) अनुकूल न वर्त्तने (वङ्गृदस्य) जहर आदि पदार्थों को देने वा दुष्ट व्यवहारों का उपदेश करनेवाले दुष्ट मनुष्य के (शता) असंख्यात (पुरः) नगरों को (अभिनत्) भेदन करते और जो (परिसूताः) सब प्रकार से उत्पन्न किये हुए पदार्थ हैं, उनकी (ऋजिश्वना) कोमल गुणयुक्त कुत्तों की शिक्षा करनेवाले के समान व्यवहार के साथ रक्षा करते हो, इससे आप ही सभा आदि के अध्यक्ष होने योग्य हो, ऐसा हम लोग निश्चय करते हैं ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - राजमनुष्यों को दुष्ट शत्रुओं के छेदन से पूर्ण विद्यायुक्त परोपकारी धार्मिक अतिथियों के सत्कार के लिये सब प्राणी वा सब पदार्थों की रक्षा करके धर्मयुक्त राज्य का सेवन करना चाहिये, जैसे कि कुत्ते अपनी स्वामी की रक्षा करते हैं, वैसी अन्य जन्तु रक्षा नहीं कर सकते, इससे इन कुत्तों को सिखा कर और इनकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ८ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'करञ्ज - पर्णय व वंगृद' विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में नमुचि के निबर्हण का उल्लेख था, प्रस्तुत मन्त्र में 'करञ्ज, पर्णय व वंगद' के वध का प्रतिपादन है । करञ्ज शब्द की व्युत्पति आचार्य दयानन्द के शब्दों में "किरति विक्षिपति धार्मिकान्" है, जो धार्मिक लोगों को पीड़ित करता है, वह 'करञ्ज' है । "पर्णानि परप्राप्तानि वस्तुनि याति" इस व्युत्पत्ति से पर्णय शब्द को आचार्य ने चोर का वाचक माना है । "वंगृन् वक्रान् विषादीन् पदार्थान् ददाति" इस व्युत्पत्ति से वंगृद का अर्थ विषादि का देनेवाला कुटिल व्यक्ति है । २. 'अतिथिग्व' वह व्यक्ति है जोकि 'अतिथीन् गच्छति' सदा अतिथियों को प्राप्त करता है । मन्त्र में कहते हैं कि (त्वम्) = गतमन्त्र के अनुसार प्रभु का मित्र बननेवाला तु (करजम्) = धार्मिकों को दुःख देनेवाले को (उत) = और (पर्णयम्) = पर - पदार्थों का हरण करनेवाले को (वधीः) = नष्ट करता है, अर्थात् तू अपने में धार्मिक को कष्ट देने की वृत्ति को तथा पर - द्रव्य - हरण की चौर्य वृत्ति को पनपने नहीं देता । तू सदा धार्मिकों का मान करता है और श्रम से ही धर्नाजन करता है । ३. इन करञ्ज व पर्णय की अशुभ वृत्तियों को तू (अतिथिग्वस्य) = अतिथि की (तेजिष्ठया वर्तनी) = अत्यन्त तीन सत्क्रिया से [वर्ततेऽनया] (वधीः) = नष्ट करता है । अतिथिग्व वह है जो सदा अतिथियों के प्रति आदरभाव से जाता है । इस अतिथिग्व का अतिथियों के प्रति वर्तन अत्यन्त नम्रता व आदर को लिये हुए होता है । यह अतिथियज्ञ इसके जीवन में अशुभ भावनाओं को कभी पनपने नहीं देता । यह अतिथि - सत्क्रिया वह तीव्र अस्त्र है जो 'करज व पर्णय' जैसे शत्रुओं को पराजित करने में सफल होता है । ४. (त्वम्) = तू (अनानुदः) = शत्रुओं से न धकेला जाता हुआ (ऋजिश्वना) = [ऋजुना श्वपति] ऋजु मार्ग से गति करनेवाले के द्वारा (परिषूताः) = चारों ओर से घेर लिये गये (वंगदस्य) = विषादि देनेवाले असुर के (शता पुरः) = सैकड़ों नगरों को (अभिनत्) = विदीर्ण करता है । लोक में औरों का पात - पात करके अपने ऐश्वर्यों को बढ़ानेवाले व्यक्ति अपनी सैकड़ों कोठियाँ बना लेते हैं । प्रभु इनकी इन कोठियों को क्षणभर में नष्ट कर डालते हैं [विज इवामिनाति] । प्रभु 'अनानुद' हैं, किसी से भी पराजित न किये जानेवाले हैं । वंगृद के ये पुर ऋजिश्वा से परिषूत होते हैं । ऋजुमार्ग से बढ़नेवाला व्यक्ति अन्ततः इनको अवष्टब्ध कर लेता है । अन्तिम विजय ऋजिश्वा की ही होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'करज, पर्णय व वंगृद' न बनकर ऋजिश्वा बनें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे सभाध्यक्ष ! यतस्त्वं यस्मिन् युद्धव्यवहारे तेजिष्ठया सेनया करञ्जमुतापि पर्णयं वधीर्हंसि याऽतिथिग्वस्य वर्त्तनी गमनागमनसत्करणक्रियाऽस्ति तां रक्षित्वाऽननुदो वङ्गृदस्य दुष्टस्य शतानि पुरः पुराण्यभिनद्भिनत्सि ये परिसूताः पदार्थास्तानृजिश्वनां व्यवहारेण रक्षसि तस्मात्त्वमेव सभाध्यक्षत्वे योग्योऽसीति वयं निश्चिनुमः ॥ ८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) सभाध्यक्षः (करञ्जम्) यः किरति विक्षिपति धार्मिकाँस्तम्। अत्र कॄ विक्षेप इत्यस्माद्धातोः बाहुलकाद् औणादिकोऽञ्जन् प्रत्ययः। (उत) अपि (पर्णयम्) पर्णानि परप्राप्तानि वस्तूनि याति प्राप्नोति तं चोरम् (वधीः) हंसि (तेजिष्ठया) या अतिशयेन तीव्रा तेजिष्ठा सेनानीतिर्वा तया (अतिथिग्वस्य) अतिथीन् गच्छति गमयति वा येन तस्य। अत्रातिथ्युपपदाद्गमधातोः बाहुलकादौणादिको ड्वः प्रत्ययः। (वर्त्तनी) वर्त्तते यया क्रियया सा (त्वम्) (शता) बहूनि (वङ्गृदस्य) यो वङ्गॄन् वक्रान् विषादीन् पदार्थान् व्यवहारान् ददात्युपदिशति वा तस्य दुष्टस्य (अभिनत्) विदारयसि (पुरः) पुराणि (अननुदः) योऽनुगतं न ददाति तस्य (परिषूताः) परितः सर्वतः सूता उत्पन्ना उत्पादिता वा पदार्थाः (ऋजिश्वना) ऋजव ऋजुगुणयुक्ता सुशिक्षिताः श्वानो येन तेन सह ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषैर्दुष्टान् शत्रून् छित्त्वा पूर्णविद्यावतां परोपकारिणां धार्मिकाणामतिथीनां सत्क्रियार्थं सर्वान् प्राणिनः पदार्थांश्च रक्षित्वा धर्म्यं राज्यं सेवनीयम्। यथा श्वानः स्वामिनं रक्षन्ति तथान्ये रक्षितुं न शक्नुवन्ति तस्मादेते सुशिक्ष्य परिरक्षणीयाः ॥ ८ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By your ardour and brilliance you destroy the man who troubles the pious, who steals others’ money and property, and who waylays the travellers and prevents hospitality. By your own strength you rout a hundred strongholds of the purveyors of poison and exploitation and you protect the good creations and productions of people by disciplined expert masters of management.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should Indra do is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

O Indra (President of the Assembly or King) Thou slyest in battles with thy vigorous army an unrighteous person who attacks the righteous. Thou/slyest a thief who takes away other's articles. Protecting the movements and honor shown by a righteous person to his guests, thou demolishest the cities or forts of a wicked fellow who uses poison and teaches others to do so in order to kill good persons and who being utterly selfish does not feed his followers. Thou protectest and preservest the articles which have been made, like one who has trained dogs. Therefore we are certain that thou art fit to be the President of the Assembly or King.

पदार्थान्वयभाषाः - ( करंजम् ) यः किरति विक्षिपति धार्मिकांस्तम् अत्र कृविक्षेप इत्यस्माद् धातोर्बाहुलकादौणादिकोऽजन् प्रत्ययः = One who throws away or insults righteous persons. (पर्णयम् ) पर्णानि परप्राप्तानि वस्तूनि याति प्राप्नोति तं चोरम् = A thief. (अतिथिग्वस्य ) अतिथीन् गच्छति गमयति वा येन तस्य | अत्रातिथ्युपपदाद् गमधातोर्बाहुलकादौणादिको ड्वः प्रत्ययः = One who approaches or serves the guests. ( ऋजिश्वना ) ऋजयः ऋजुगुणयुक्ताः सुशिक्षिताः श्वानो येन तेन सह = With a trainer of dogs.
भावार्थभाषाः - The officers of the State should destroy their enemies and protect the substances and beings in order to honor highly learned, benevolent righteous guests and thus administer the State lawfully and righteously. The dogs should be trained properly and utilized for watch as other animals cannot protect their masters like them, they being most faithful.
टिप्पणी: It is wrong on the part of Sayanacharya, Prof. Wilson, Griffith and others to take words like Karanja, Parnaya, Atithigva, and Rijishva as proper nouns denoting the names of certain persons, while as they are derivative nouns denoting certain attributes as explained above by Rishi Dayananda.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजपुरुषांनी दुष्ट शत्रूंचे छेदन करून पूर्ण विद्यायुक्त, परोपकारी, धार्मिक अतिथींच्या सत्कारासाठी सर्व प्राण्यांचे व सर्व पदार्थांचे रक्षण करून धर्मयुक्त राज्याचे सेवन केले पाहिजे. जसे श्वान आपल्या स्वामीचे रक्षण करतात तसे अन्य प्राणी रक्षण करू शकत नाहीत. त्यामुळे त्या श्वानांना शिकवून त्यांचे रक्षण केले पाहिजे. ॥ ८ ॥