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देवता: इन्द्र: ऋषि: सव्य आङ्गिरसः छन्द: जगती स्वर: निषादः

ए॒भिर्द्युभिः॑ सु॒मना॑ ए॒भिरिन्दु॑भिर्निरुन्धा॒नो अम॑तिं॒ गोभि॑र॒श्विना॑। इन्द्रे॑ण॒ दस्युं॑ द॒रय॑न्त॒ इन्दु॑भिर्यु॒तद्वे॑षसः॒ समि॒षा र॑भेमहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ebhir dyubhiḥ sumanā ebhir indubhir nirundhāno amatiṁ gobhir aśvinā | indreṇa dasyuṁ darayanta indubhir yutadveṣasaḥ sam iṣā rabhemahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒भिः। द्युभिः॑। सु॒ऽमनाः॑। ए॒भिः। इन्दु॑ऽभिः। निः॒ऽउ॒न्धा॒नः। अम॑तिम्। गोभिः॑। अ॒श्विना॑। इन्द्रे॑ण। दस्यु॑म्। द॒रय॑न्तः। इन्दु॑ऽभिः। यु॒तऽद्वे॑षसः। सम् इ॒षा। र॒भे॒म॒हि॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:53» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हम लोग जो (अमतिम्) विज्ञान वा सुख से अविद्या दरिद्रता तथा सुन्दर रूप को (निरुन्धानः) निरोध वा ग्रहण करता हुआ (सुमनाः) उत्तम विज्ञानयुक्त सभाध्यक्ष है, उसकी प्राप्ति कर उसके सहाय वा (एभिः) इन (द्युभिः) प्रकाशयुक्त द्रव्य (एभिः) इन (इन्दुभिः) आह्लादकारक गुण वा पदार्थ इन (गोभिः) प्रशंसनीय गौ पृथिवी (अश्विना) अग्नि, जल, सूर्य्य, चन्द्र आदि (इषा) इच्छा वा अन्नादि (इन्दुभिः) सोमरसादि पेयों (इन्द्रेण) बिजुली और उसके रचे हुए विदारण करनेवाले शस्त्र से (दस्युम्) बल से दूसरे के धन को लेनेवाले दुष्ट को (दरयन्तः) विदारण करते हुए (युतद्वेषसः) द्वेष से अलग होनेवाले शत्रुओं के साथ युद्ध को सुख से (समारभेमहि) आरम्भ करें ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - जो सभाध्यक्ष सब विद्याओं की शिक्षा कर हम लोगों को सुखी करता है, उसका सब मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । इस के सहाय के विना कोई भी मनुष्य व्यावहारिक और परमार्थविषयक आनन्द को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इसके सहाय से सब धर्मयुक्त कार्यों का आरम्भ वा सुख का सेवन करना चाहिये ॥ ४ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! आपकी कृपा से हममें से प्रत्येक व्यक्ति (एभिः द्युभिः सुमनाः) = इन आपसे दी गई ज्ञान - ज्योतियों से उत्तम मनवाला हो । ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य मन की मैल को दूर कर पाता है । ज्ञान ही आन्तर पवित्रता का साधन है । २. आपकी कृपा से हमारे सब व्यक्ति (एभिः इन्दुभिः) = इन सोमकणों से (अमतिम्) = बुद्धि की मन्दता को (निरुन्धानः) = रोकनेवाले हों । सोम की रक्षा से इन सोमकणों से दीप्त हुई - हुई प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि दीप्त हो । हममें कोई भी मन्दबुद्धि न हो । यह बुद्धि - मान्दता ही सब अवनतियों का मूल हुआ करती है ३. (गोभिः) = गोदुग्ध के सेवन से (अश्विना) = प्राणापान की शक्ति के वर्धन से तथा (इन्द्रेण) = जितेन्द्रियता से (दस्यु दरयन्तः) = दास्यव वृत्ति को विदीर्ण करते हुए हों । हममें तोड़ - फोड़ की भावना न पनपे, हम सदा निर्माण की वृत्तिवाले हों । ४. (इन्दुभिः) = इन सोमकणों की रक्षा से हम (युतद्वेषसः) = परस्पर द्वेष से रहित हों [युत अनिश्चिते] । ५. हे प्रभो ! आप ऐसी कृपा करें कि हम (इषा) = आपकी प्रेरणा से ही (संरभेमहि) = प्रत्येक कार्य को आरम्भ करें । 'स्वस्य च प्रियमात्मनः' इन मनु शब्दों के अनुसार अन्तः स्थित आपको जो प्रिय हो वही कार्य हम करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान प्राप्त करना, सोमकणों का रक्षण करना, गोदुग्ध का प्रयोग तथा प्रभु - प्रेरणा के अनुसार कार्य करना - ये बातें हैं जिनसे हम 'प्रशस्त मनवाले, तीन बुद्धिवाले, दास्यव वृत्ति से शून्य व निर्द्वेष' बनते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

वयं योऽमतिं निरुन्धानः सुमना विद्वानस्ति तं प्राप्य तत्सहायेनैभिर्द्युभिरेभिरन्दुभिर्गोभिरश्विनेन्दुभिरिषेन्द्रेण सह दस्युं दरयन्तो युतद्वेषसः शत्रुभिः सह युद्धं सुखेन समारभेमहि ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एभिः) प्रत्यक्षैः (द्युभिः) प्रकाशयुक्तैर्गुणैर्द्रव्यैर्वा (सुमनाः) शोभनं मनो विज्ञानं यस्य सभाध्यक्षस्य सः (एभिः) वक्ष्यमाणैः (इन्दुभिः) आह्लादकारिभिर्गुणैः पदार्थैर्वा (निरुन्धानः) निरोधं कुर्वन् (अमतिम्) अविद्यमाना मतिर्विज्ञानं सुखं वा यस्यामविद्यायां दरिद्रायां वा तां सुरूपं वा (गोभिः) प्रशस्ताभिर्वाग्धेनुपृथिवीभिः (अश्विना) अग्निजलसूर्यचन्द्रादिभिः (इन्द्रेण) विद्युता तद्रचितेन विदारकेण शस्त्रेण वा (दस्युम्) बलात्कारेण परस्वापहर्त्तारम् (दरयन्तः) विदारयन्तः (इन्दुभिः) अभिषुतैर्बलकारिभिः पेयैः सोमरसाभियुक्तैर्जलैः (युतद्वेषसः) युता अमिश्रिताः पृथग्भूता द्वेषा येभ्यस्ते (सम्) सम्यगर्थे (इषा) इच्छया अन्नादिना वा (रभेमहि) आरम्भं कुर्वीमहि ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - यः सभाद्यध्यक्षो वा सर्वं दारिद्र्यं विनाश्य शत्रुविजयं कृत्वा सर्वा विद्याः शिक्षित्वाऽस्मान् सुखयति स सर्वैर्मनुष्यैः समाश्रयितव्यश्चेति नहि खल्वेतत्सहायेन विना कश्चिदपि व्यावहारिकं चानन्दं प्राप्तुं शक्नोति, तस्मादेतत्सहायेन सर्वेषां धर्म्याणां कार्याणामारम्भः सुखसेवनं च नित्यं कार्य्यमिति ॥ ४ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power and glory, pleased at heart, with these lights of knowledge and these streams of soma, preventing our want and poverty of wealth and knowledge, bless us with cows and horses, gifts of divine speech, lands and wealth of mind and wisdom, and speedy movement in progress, so that, subduing the evil and wicked enemies, and free from the jealous and hateful, we may enjoy and live happily with plenty of food and energy and joyous drinks of soma in a state of power and prosperity.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

Tearing off the thieves and robbers that take away others articles, with the help of Indra (The President of the Assembly) who is highly learned and wise and who dispels all ignorance and poverty, taking assistance from shining qualities and objects, delighting virtues and substances, admirable speech, cattle and land, fire and water, sun and moon, electricity and electrical Joyous and nourishing weapons, with drinking like Soma or essence of various herbs and food, let us commence fight with the wicked enemies with strong will to overcome them, being free from malice in our hearts.

पदार्थान्वयभाषाः - १ (इन्दुभिः) आह्वाद्कारिभिर्गुणै: पदार्थैवा = With delighting virtues and substances. २. (इन्दुभि:) अभिषुतैर्बलकारिभिः पेयैः सोमरसादियुक्तैर्कलैः = With drinkable waters mixed with Soma or essence of various nourishing herbs. ( द्युभिः) प्रकाशयुक्तैर्गुणद्रव्यैर्वा = With shining qualities or objects.
भावार्थभाषाः - The President of the Assembly or the commander of the army who gives us happiness by dispelling all ignorance and poverty, by conquering enemies and by educating all should be approached by all. No one can enjoy worldly happiness without his help. Therefore all should begin the performance of all righteous acts and the enjoyment of all legitimate happiness.
टिप्पणी: The word Indu ( इन्दु ) is derived from उन्दी-क्लेदने उन्हेरिच्चादे: ( उणादि० १.१२ ) उनति आद्रीकरोति पदार्थानानिति इन्दु चन्द्रमा वा चदि आह लादे So Rishi Dayananda taking इन्दु (Indu) and Chandra as synonymous terms has explained इन्दुभि: as आह् लादकारिभिगुर्णै:पदार्थैर्वा While giving the second meaning of waters mixed with Soma also he has derived it from the same root उन्दी-बलेदने to wet and has relied upon the Vedic Lexicon-Nighantu 1.12 इन्दुरिति उदकनाम ( निघ० १.१२ )
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो सभाध्यक्ष दारिद्र्याचा नाश करून शत्रूवर विजय प्राप्त करतो व विद्येचे शिक्षण देऊन सुखी करतो. त्याचा सर्व माणसांनी स्वीकार केला पाहिजे. त्याच्या साह्याखेरीज कोणीही माणूस व्यावहारिक व पारमार्थिक आनंद प्राप्त करण्यास समर्थ होऊ शकत नाही. त्यामुळे त्याच्या साह्याने सर्व धर्मयुक्त कार्यांचा आरंभ व सुखाचा अंगीकार केला पाहिजे. ॥ ४ ॥