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शची॑व इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम॒ तवेदि॒दम॒भित॑श्चेकिते॒ वसु॑। अतः॑ सं॒गृभ्या॑भिभूत॒ आ भ॑र॒ मा त्वा॑य॒तो ज॑रि॒तुः काम॑मूनयीः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śacīva indra purukṛd dyumattama taved idam abhitaś cekite vasu | ataḥ saṁgṛbhyābhibhūta ā bhara mā tvāyato jarituḥ kāmam ūnayīḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शची॑ऽवः। इ॒न्द्र॒। पु॒रु॒ऽकृ॒त्। द्यु॒म॒त्ऽत॒म॒। तव॑। इत्। इ॒दम्। अ॒भितः॑। चे॒कि॒ते॒। वसु॑। अतः॑। स॒म्ऽगृभ्य॑। अ॒भि॒ऽभू॒ते॒। आ। भ॒र॒। मा। त्वा॒ऽय॒तः। ज॒रि॒तुः। काम॑म्। ऊ॒न॒यीः॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:53» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में उपदेश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शचीवः) प्रशंसनीय प्रज्ञा, वाणी और कर्मयुक्त (द्युमत्तम) अतिशय करके सर्वज्ञता विद्याप्रकाशयुक्त (पुरुकृत्) बहुत सुखों के दाता (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त जगदीश्वर वा एैश्वर्यप्रापक सभापति विद्वान् ! आपकी कृपा वा आप के सहाय से मनुष्य (अभितः) सब ओर से (इदम्) इस (वसु) उत्तम धन को (चेकिते) जानता है, हे (अभिभूते) शत्रुओं के पराजय करनेवाले ! जिस कारण आप (त्वायतः) आप वा उस के आत्मा की इच्छा करते हुए (जरितुः) स्तुति करनेवाले धार्मिक भक्तजन की (कामम्) इष्टसिद्धि को (आभर) पूर्ण करें (अतः) इस पुरुषार्थ से आपको (संगृभ्य) ग्रहण करके मैं वर्त्तता हूँ और आप मुझे सब कामों से पूर्ण कीजिये, आपकी इच्छा करते हुए स्तुति करनेवाले मेरी इष्टसिद्धि को (मोनयीः) कभी क्षीण मत कीजिये ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - निश्चय ही मनुष्यों को परमेश्वर वा विद्वान् मनुष्य के संग के विना कोई भी इष्टसिद्धियों को पूरण कर सकनेवाला नहीं है। इससे इसी की उपासना वा विद्वान् मनुष्य का सत्संग करके इष्टसिद्धि को सम्पादन करना चाहिये ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुभक्त को कमी कहाँ ?

पदार्थान्वयभाषाः - १. (शचीवः) = हे प्रज्ञावन् ! [शची - प्रज्ञा] 'बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि’ सब बुद्धिमानों की बुद्धि आप ही हैं । शची - Power, strength, energy - सम्पूर्ण शक्ति के स्रोत वे प्रभु ही हैं । (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् ! सब ऐश्वर्यों के स्वामी आप ही हैं । (पुरुकृत्) = पालन व पोषण करनेवाले प्रभो ! माता - पिता आदि के द्वारा सबकी पालन - व्यवस्था आप ही कर रहें हैं । (द्युमत्तम) = हे अत्यन्त ज्योतिर्मय प्रभो ! (इदम्) = यह (अभितः) = आगे - पीछे, दायें - बायें, ऊपर - नीचे सर्वत्र वर्तमान (वसु) = धन (तव इत्) = आपका ही (चेकिते) = जाना जाता है । यह सम्पूर्ण धन आपका ही है । इसके वास्तविक स्वामी आप ही हैं । २. (अतः) = इस धन में से (संगृभ्यः) = ग्रहण करके, अपने हाथों में लेकर हे (अभिभूते) = हमारे शत्रुओं का पराभव करनेवाले प्रभो ! (आभर) = हमारी झोलियों को भर दीजिए । 'उभा हि हस्ता वसुना पूणस्व' दोनों हाथों से भर - भरके धनों को हमें दीजिए । ३. (त्वायतः) = [त्वाम् आत्मन इच्छतः] आपको अपनाने के इच्छुक (जरितुः) = स्तोता की (कामम्) = कामना को (मा ऊनयीः) = अपूर्ण मत कीजिए । मैं आपका स्तवन करनेवाला हूँ । आपकी कृपा से मेरी सब आवश्यकताएँ पूर्ण हों ही । वस्तुतः प्रभुभक्तों के योग - क्षेम को प्रभु चलाया ही करते हैं 'तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमावहो हरिः' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सम्पूर्ण धनों के स्वामी प्रभु ही हैं । प्रभुभक्तों की कामनाएँ पूर्ण होती ही हैं ।
टिप्पणी: सूचना - प्रस्तुत मन्त्र में सच्चे प्रभुभक्त के लक्षण प्रभु के सम्बोधक शब्दों द्वारा इस प्रकार सूचित हुए हैं - [१] (शचीवः) = प्रभुभक्त अङ्ग - प्रत्यङ्ग में शक्तिसम्पन्न होता है । [२] (इन्द्र) = वह इन्द्रियों का अधिष्ठाता होता है और इस प्रकार प्राणमयकोश पर इसका पूर्ण प्रभुत्व होता है । [३] (पुरुकृत्) = मनोमयकोश में यह सदा पालन व पोषण की लोकहित की भावनाओंवाला होता है और [४] (द्युमत्तम) = विज्ञानमयकोश में यह ज्योतिर्मय होता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे शचीवो द्युमत्तम पुरुकृदिन्द्र सभेश ! यो मनुष्यस्तव कृपया सहायेन वाऽभित इदं वसु चेकिते जानाति। हे अभिभूते शत्रूणां पराभवकर्त्तर्यतस्त्वं त्वायतो जरितुर्धार्मिकस्य स्वजनस्य काममाभर समन्तात्प्रपूर्द्धि। अतस्त्वां संगृभ्याहं वर्त्ते त्वं मां सर्वैः कामैराभर त्वायतो जरितुर्मम कामं मोनयीः परिहीणं क्षीणं न्यूनं कदाचिन्मा सम्पादयेः ॥ १३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीवः) प्रशस्ताः प्रज्ञा बह्वी वाक् प्रशस्तं कर्म च विद्यते यस्य तत्संबुद्धौ (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रापक विद्वन् वा (पुरुकृत्) यः पुरूणि बहूनि सुखानि करोति सः (द्युमत्तम) द्यौर्बहुः सर्वज्ञः प्रकाशो विद्याप्रकाशो वा विद्यते यस्मिन् सोऽतिशयितस्तत्संबुद्धौ (तव) (इत्) एव (इदम्) वक्ष्यमाणम् (अभितः) सर्वतः (चेकिते) जानाति (वसु) परं प्रकृष्टं द्रव्यम् (अतः) पुरुषार्थात् (संगृभ्य) सम्यग्गृहीत्वा (अभिभूतम्) अभिभूतिः शत्रूणामभिभवनं पराभवो यस्मात्तत्सम्बुद्धौ (आ) आभिमुख्ये (भर) धर (मा) निषेधे (त्वायतः) त्वामात्मानं तवात्मानं वेच्छतः (जरितुः) स्तोतुः (कामम्) इष्टसिद्धिम् (ऊनयीः) ऊनयेः। लुङ्प्रयोगोऽयम् ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्न किल परमेश्वरेणाप्तेन पुरुषसङ्गेन वा विना सर्वेषां कामानां पूर्त्तिः कर्त्तुं शक्या तस्मादेतमेवोपास्य संगम्य वा कामपूर्त्तिः सम्पादनीयेति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power and glory, lord of wisdom, Word, and action, versatile giver of success and victory, most brilliant and omniscient, the wealth all round is yours, you know. Therefore, O lord of victory, take that up and bear it along to bless us. Neglect not the desire and ambition of your celebrant, discount him not.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is Indra is taught in the third Mantra.

अन्वय:

In the case of God (1) O God, most splendid, Almighty, Rich in mighty deeds and knowledge, this treasure spread around is known to be Thine own. Gather, therefore, O conqueror of all and bring to us, fail not the hope of that righteous devotee who loves and sings to Thee. (2) It is also applicable to Indra-- The President of the Assembly-who is most splendid and rich in mighty deeds and knowledge. He should always try to fulfil the noble desires of righteous and learned people.

भावार्थभाषाः - A man cannot fulfil his desires without the Grace of God and the association with absolutely truthful learned persons like the President of the Assembly and others. Therefore men should adore God and associate with the learned wise men so that they may be able to accomplish their noble desires. ( धुमत्तम) द्यौः बहुः सर्व सर्वज्ञः प्रकाशो विद्याप्रकाशों वा विद्यते यस्मिन् सोऽतिशयितः तत् सम्बुद्धौ | = Omniscient source of light or possessor of the light of knowledge.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी निश्चयपूर्वक जाणावे की परमेश्वर व विद्वान माणसाशिवाय कोणताही मनुष्य इष्टसिद्धीची पूर्तता करू शकत नाही. त्यामुळे त्याची उपासना व विद्वान माणसाचा सत्संग करून इष्टसिद्धी संपादन केली पाहिजे. ॥ ३ ॥