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त्वमा॑विथ सु॒श्रव॑सं॒ तवो॒तिभि॒स्तव॒ त्राम॑भिरिन्द्र॒ तूर्व॑याणम्। त्वम॑स्मै॒ कुत्स॑मतिथि॒ग्वमा॒युं म॒हे राज्ञे॒ यूने॑ अरन्धनायः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam āvitha suśravasaṁ tavotibhis tava trāmabhir indra tūrvayāṇam | tvam asmai kutsam atithigvam āyum mahe rājñe yūne arandhanāyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। आ॒वि॒थ॒। सु॒ऽश्रव॑सम्। तव॑। ऊ॒तिऽभिः॑। तव॑। त्राम॑ऽभिः। इ॒न्द्र॒। तूर्व॑याणम्। त्वम्। अ॒स्मै॒। कुत्स॑म्। अ॒ति॒थि॒ऽग्वम्। आ॒युम्। म॒हे। राज्ञे॑। यूने॑। अ॒र॒न्ध॒ना॒यः॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:53» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सभासेनाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (अस्मै) इस (महे) महा उत्तम-उत्तम गुणयुक्त (यूने) युवावस्था में वर्त्तमान (राज्ञे) न्याय, विनय और विद्यादि गुणों से देदीप्यमान राजा के लिये (तव) आप के (ऊतिभिः) रक्षण आदि कर्मों से सेनादि सहित और (तव) वर्त्तमान आपके (त्रामभिः) रक्षा करनेवाले धार्मिक विद्वानों से रक्षा किये हुए जिस (अतिथिग्वम्) अतिथियों को प्राप्त करने कराने (तूर्वयाणम्) शत्रुबलों की हिंसा करनेवाले यानसहित (आयुम्) जीवनयुक्त (सुश्रवसम्) उत्तम श्रवण वा अन्नादि युक्त मनुष्यों को (अरन्धनायः) पूर्ण धनवाले मनुष्य के समान आचरण करते और (त्वम्) आप जिस (कुत्सम्) वज्र के समान वीर पुरुष की (आविथ) रक्षा करते हो, उसको कुछ भी दुःख नहीं होता ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषों को योग्य है कि शत्रुओं को निवारण कर सब की रक्षा करके सर्वथा उनको सुखयुक्त करें तथा ये निश्चय करके राजोन्नतिरूपी लक्ष्मी से सदा युक्त रहें और विद्याशाला के अध्यक्ष उत्तम शिक्षा से सब शस्त्रास्त्रविद्या में कुशल निपुण विद्वानों को सम्पन्न करके इन से प्रजा की निरन्तर रक्षा करें ॥ १० ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु किसकी रक्षा करते हैं ?

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (तव ऊतिभिः) = अपनी रक्षण - प्रक्रियाओं से (सुश्रवसम्) = उत्तम ज्ञानी को अथवा आपकी प्रेरणा को सुननेवाले को (आविथ) = रक्षित करते हो । २. हे इन्द्र ! आप (तव त्रामभिः) = अपने रक्षण - साधनों से (तूर्वयाणम्) = 'तूर्व याति' हिंसक कामादि वासनाओं पर आक्रमण करनेवाले को रक्षित करते हो । प्रभु की रक्षा का पात्र 'सुश्रवस' और 'तूर्वयाण' है । उत्तम ज्ञान प्राप्त करना और सब प्रकार की अवनति की कारणभूत वासनाओं पर आक्रमण करना' - ये ऐसे कार्य हैं जोकि हमें प्रभु के प्रिय बनाते हैं । इन कार्यों को करते हुए ही हम प्रभु से रक्षित होते हैं । ३. हे प्रभो ! (त्वम्) = आप (अस्मै) = इस (महे) = महान् पूजा के योग्य, (राज्ञे) = सारे संसार को व्यवस्थित Regulate करनेवाले (यूने) = दोषों के अमिश्रण व गुणों का मिश्रण करनेवाले प्रभु के लिए, अर्थात् प्रभु की प्राप्ति के लिए (कुत्सम्) = सब दोषों का संहार करनेवाले (अतिथिग्वम्) = अतिथियों के प्रति आदरभाव से जानेवाले (आयुम्) = गतिशील पुरुष को (अरन्धनायः) = तैयार करते हैं, उसे इन्द्रियों को वश में करनेवाला बनाते हैं । यह जितेन्द्रिय, शान्तमानस पुरुष ही प्रभु से वरण किया जाता है, यही प्रभु का दर्शन कर पाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'सुश्रवा, तूर्वयाण, कुत्स, अतिथिग्व व आयु' बनें ताकि प्रभु के प्रीतिपात्र हों और प्रभुदर्शन कर सकें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे इन्द्र सभाद्यध्यक्ष ! त्वमस्मै महे यूने राज्ञे तवोतिभिस्तव त्रामभी रक्षितं यमतिथिग्वं तूर्वयाणमायुं सुश्रवसमरन्धनायो यं त्वं कुत्समाविथ तं किमपि दुःखं न भवति ॥ १० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) सभाद्यध्यक्षः (आविथ) रक्षसि (सुश्रवसम्) सुष्ठु श्रवांसि श्रवणान्यन्नादीनि यस्य तम् (तव) रक्षणे वर्त्तमानस्य (ऊतिभिः) रक्षणादिभिः (तव) सेनादिभिः सह वर्त्तमानस्य (त्रामभिः) त्रायन्ते ते धार्मिका विद्वांसः शूरास्तैः (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद (तूर्वयाणम्) तूर्वाः शत्रुबलहिंसका योद्धारो यानेषु यस्य तम् (त्वम्) सभाशालासेनाप्रजारक्षकः (अस्मै) युध्यमानाय वीराय (कुत्सम्) वज्रम्। कुत्स इति वज्रनामसु पठितम्। (निघं०२.२०) (अतिथिग्वम्) योऽतिथीन् गच्छति गमयति वा तम् (आयुम्) य एति प्राप्नोति तम् (महे) महोत्तमगुणविशिष्टाय (राज्ञे) न्यायविनयविद्यागुणैर्देदीप्यमानाय (यूने) युवावस्थायां वर्त्तमानाय (अरन्धनायः) अरमलं धनं यस्य स इवाचरसीत्यरन्धनायः। अत्र लडर्थे लिङ् ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषैः शत्रून् निवार्य सर्वान् रक्षित्वा सर्वदा सुखिनः सम्पादनीयाः एते किल राजोन्नतिश्रियः सदा भवेयुः। विद्याशालाध्यक्षः सर्वान् सुशिक्षया विदुषः शस्त्रास्त्रकुशलान् सम्पाद्यैतैः प्रजां सततं रक्षेत् ॥ १० ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power and force of divinity, with your modes of protection and your modes of sustenance you cover and protect the man of noble fame and fast motion and, with your power of fulfilment and prosperity, you grant good health and full age, love of hospitality and the mighty thunderbolt of arms and justice to this great and youthful ruler commanding honour and brilliance.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is Indra is taught further in the tenth Mantra.

अन्वय:

O Indra (The President of the Assembly or the commander of the army) Thou preservest highly learned man possessing Divine knowledge and liberal, with thy protective power. Thou preservest with Thy aids the man who has under him in chariots many great heroes, destroyers of the strength of the enemies. To the mighty but youthful king shining on account of knowledge, justice and humility, thou givest thunderbolt or powerful weapon, for the protection of such persons who are hospitable to their guests. Such persons protected by thee never suffer.

पदार्थान्वयभाषाः - ( तूर्वयाणम् ) तूर्वाः शत्रुबलहिंसका योद्धारो यानेषु यस्य तम् = He who has brave soldiers in various cars. ( कुत्सम् ) वज्रम् कुत्स इति वज्रनाम ( निघ० २.२० ) = Thunderbolt or powerful weapon. (आयुम्) य एति प्राप्नोति तम् = A man who approaches.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the officers of the State to drive away all enemies and to keep all happy by protecting them well. They should always have at heart the progress and prosperity of the State. The Acharya or Principal of the educational institution should educate all and should make them well-versed in the use of various weapons, so that they may protect the people.
टिप्पणी: It is wrong on the part of Sayanacharya, Prof. Wilson, Griffith and others to take Sushravas, Toorvayana, Atithigva, and Aya as proper nouns instead of taking them as derivative words denoting certain attributes as explained by Rishi Dayananda on the basis of the Vedic Lexicon Nighantu etc.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजपुरुषांनी शत्रूंचे निवारण करून सर्वांचे रक्षण करावे व त्यांना सुखी करावे. असा निश्चय करावा की हे (सुख) राजाच्या उन्नतीरूपी लक्ष्मीने सदैव युक्त असावे. तसेच पाठशाळेच्या अध्यक्षाने उत्तम शिक्षणाद्वारे सर्व शस्त्रास्त्र विद्येत कुशल, निपुण विद्वानांना संपन्न करून त्यांच्याकडून प्रजेचे निरंतर रक्षण करावे. ॥ १० ॥