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आ यं पृ॒णन्ति॑ दि॒वि सद्म॑बर्हिषः समु॒द्रं न सु॒भ्वः१॒॑ स्वा अ॒भिष्ट॑यः। तं वृ॑त्र॒हत्ये॒ अनु॑ तस्थुरू॒तयः॒ शुष्मा॒ इन्द्र॑मवा॒ता अह्रु॑तप्सवः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yam pṛṇanti divi sadmabarhiṣaḥ samudraṁ na subhvaḥ svā abhiṣṭayaḥ | taṁ vṛtrahatye anu tasthur ūtayaḥ śuṣmā indram avātā ahrutapsavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। यम्। पृ॒णन्ति॑। दि॒वि। सद्म॑ऽबर्हिषः। स॒मु॒द्रम्। न। सु॒ऽभ्वः॑। स्वाः। अ॒भिष्ट॑यः। तम्। वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑। अनु॑। त॒स्थुः॒। ऊ॒तयः॑। शुष्माः॑। इन्द्र॑म्। अ॒वा॒ताः। अह्रु॑तऽप्सवः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:52» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सद्मबर्हिषः) उत्तम स्थान आसनयुक्त (सुभ्वः) उत्तम होनेवाले मनुष्य (अवाताः) वायु के चलाने से रहित नदियाँ (समुद्रं न) जैसे सागर वा आकाश को प्राप्त होकर स्थित होती हैं, वैसे जिस (इन्द्रम्) सभासदों सहित सभापति को (वृत्रहत्ये) जिनमें मेघावयवों के हनन तुल्य हनन होता, उस संग्राम में (स्वाः) अपने (अभिष्टयः) शुभेच्छायुक्त (शुष्माः) बलसहित (अह्रुतप्सवः) कुटिलतारहित सूर्यरूप (ऊतयः) सुरिक्षत प्रजा (आ पृणन्ति) सुखी करें (तम्) उस परमैश्वर्यकारक वीरपुरुष के (अनुतस्थुः) अनुकूल स्थिर होवें, वही चक्रवर्त्ती राज्य करने को योग्य होता है ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नदी समुद्र वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर स्थिर होती है, वैसे ही सभासदों के सहित विद्वान् को प्राप्त होकर सब प्रजा स्थिर सुखवाली होती हैं ॥ ४ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समुद्र के नदियों के समान प्रभु में

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यम्) = जिस प्रभु को (दिवि) = प्रकाश होनेपर (सद्मबर्हिषः) = [सद्यिनि बर्हिः यज्ञो येषाम्] घरों में सदा यज्ञ करनेवाले ज्ञानी पुरुष उसी प्रकार (आपृणन्ति) = अपने से पूरित करते हैं (न) = जैसे (सुभ्वः) = [शोभना भूः याभिः] नदियाँ (समुद्रम्) = समुद्र को । ज्ञानी व यज्ञशील व्यक्ति उसी प्रकार प्रभु को प्राप्त होता है जैसे नदियों समुद्र में । यह ज्ञानी व यज्ञशील पुरुष (स्वाः) = प्रभु के आत्मीय हो जाते हैं - 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतः' । (अभिष्टयः) = ये सदा प्रभु की ओर आभिमुख्येन जानेवाले होते हैं । इनका लक्ष्य प्रभुप्राप्ति ही होता है । २. (तं इन्द्रम्) = उस प्रभु को (वृत्रहत्ये) = वासना का विनाश होने पर ही (अनुतस्थुः) = लक्ष्य करके स्थित होते हैं । कौन ? [क] (ऊतयः) = अपना रक्षण करनेवाले, रोगादि से अपने को आक्रन्त न होने देनेवाले, [ख] (शुष्माः) = शत्रुओं के शोषक बल से युक्त, [ग] (अवाताः) = प्राणापान की गति को रोककर प्राणायाम में लगे हुए [अ - वात], [घ] (अह्रुतप्सवः) = अकुटिलरूप जिनके विचारों में किसी प्रकार की कुटिलता व छल - छिद्र नहीं है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम ज्ञानी व यज्ञशील बनकर प्रभु को प्राप्त करें । शरीरों को रोगों से बचाते हुए, प्राणमयकोश को सबल बनाते हुए, मनोमय कोश को प्राणायाम द्वारा निरुद्ध चित्तवृत्ति करके, निश्चल सत्यज्ञानवाले हम प्रभु के आत्मीय बन जाएँ ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

सद्मबर्हिषो मनुष्या अवाता नद्यः सुभ्वो समुद्रं न यमिन्द्रं वृत्रहत्ये स्वा अभिष्टयः शुष्मा अह्रुतप्सव ऊतयः प्रजा आपृणन्ति तमनुतस्थुरनुतिष्ठेयुः स एव साम्राज्यं कर्त्तुमर्हति ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (यम्) सभाध्यक्षम् (पृणन्ति) सुखयेयुः (दिवि) न्यायप्रकाशे (सद्मबर्हिषः) सद्मस्थानं बर्हिरुत्तमं यासां ताः (समुद्रम्) सागरम् (न) इव (सुभ्वः) याः सुष्ठु भवन्ति ताः (स्वाः) स्वकीयाः (अभिष्टयः) इष्टेच्छाः (तम्) पूर्वोक्तम् (वृत्रहत्ये) वृत्राणां मेघाऽवयवानां हत्या हननमिव यस्मिँस्तस्मिन् संग्रामे (अनु) आनुपूर्व्ये (तस्थुः) वर्त्तन्ते (ऊतयः) रक्षणाद्याः (शुष्माः) बलवत्यः शोषणकारिण्यो वा (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यहेतुं सूर्य्यम् (अवाताः) अविद्यमानो वायुः कम्पनं यासां तां (अह्रुतप्सवः) अह्रुतं कुटिलं सूर्य्यरूपं यासां ताः। अत्र ह्रु ह्वरेश्छन्दसि। (अष्टा०७.२.३१) अनेन ह्रुरादेशः। प्स्विति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा सरितः समुद्रं जलमयमन्तरिक्षं वा प्राप्य स्थिरा भवन्ति, तथैव ससभं विद्वांसं प्राप्य सर्वाः प्रजाः स्थिरसुखा जायन्ते ॥ ४ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra is in his heaven of light and justice. The high-priests sitting on seats of grass in his house of yajna, his own values, his own well-wishers, his own people assist, complete and promote him, Indra who is the ruler, guide and protector, in the same manner in which the lovely streams and mighty rivers join and fill the sea. In his battles against Vritra, clouds of darkness, hoarders of national wealth and natural resources, his fighting forces of defence, powerful, undisturbed and unopposed, straight and sincere in action stand by him and follow him steadfast in the battle.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

That man alone deserves to rule over a vast Government whom the subjects whose noble desires are fulfilled support in the light of justice and fill up with their tributes as the kindred rivers hasten up to fill the ocean, who has also the support of the officers, occupying high positions in the State. Mighty persons who are protectors, not overcome by their enemies and not crooked, should follow the President of the Assembly or the Commander of the Army to destroy the wicked foes.

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवि ) न्यायप्रकाशे = In the light of justices. ( सद्मबर्हिषः) सद्मस्थानं बहितमं येषां ते । = Occupying high positions,
भावार्थभाषाः - As rivers become established by reaching the ocean or the firmament, all subjects become established in happiness by approaching the learned President with his assembly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जशी नदी, समुद्र व अंतरिक्ष प्राप्त करून स्थिर होते तसेच सभासदासह सर्व विद्वानाबरोबर सर्व प्रजा स्थिर सुख प्राप्त करते. ॥ ४ ॥