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देवता: इन्द्र: ऋषि: सव्य आङ्गिरसः छन्द: जगती स्वर: निषादः

अनु॑व्रताय र॒न्धय॒न्नप॑व्रताना॒भूभि॒रिन्द्रः॑ श्न॒थय॒न्नना॑भुवः। वृ॒द्धस्य॑ चि॒द्वर्ध॑तो॒ द्यामिन॑क्षतः॒ स्तवा॑नो व॒म्रो वि ज॑घान सं॒दिहः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anuvratāya randhayann apavratān ābhūbhir indraḥ śnathayann anābhuvaḥ | vṛddhasya cid vardhato dyām inakṣataḥ stavāno vamro vi jaghāna saṁdihaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनु॑ऽव्रताय। र॒न्धय॑न्। अप॑ऽव्रतान्। आ॒ऽभूभिः॑। इन्द्रः॑। श्न॒थय॑न्। अना॑भुवः। वृ॒द्धस्य॑। चि॒त्। वर्ध॑तः। द्याम्। इन॑क्षतः। स्तवा॑नः। व॒म्रः। वि। ज॒घा॒न॒। स॒म्ऽदिहः॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:51» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:10» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करके किस को करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि जो (इन्द्रः) परम विद्या आदि ऐश्वर्य्य, सभा, शाला, सेना और न्याय का अध्यक्ष (आभूभिः) उत्तम वीरों को शिक्षा करनेवाली क्रियाओं के साथ वर्त्तमान (अनुव्रताय) अनुकूल धर्मयुक्त व्रतों के धारण करनेवाले आर्य मनुष्य के लिये (अपव्रतान्) मिथ्या भाषणादि दुष्ट कर्मयुक्त डाकू मनुष्यों को (रन्धयन्) अति ताड़ना करता हुआ (अनाभुवः) जो धर्मात्माओं से विरुद्ध मनुष्य हैं, उन पापियों को (श्नथयन्) शिथिल करता (इनक्षतः) व्याप्तियुक्त (वर्धतः) गुण दोषों से बढ़नेवाले (वृद्धस्य) ज्ञानादि गुणों से युक्त श्रेष्ठ की (स्तवानः) स्तुति का कर्त्ता (वम्रः) अधर्म का नाश (संदिहः) धर्माऽधर्म को संदेह से निश्चय करनेवाला (द्याम्) सूर्य प्रकाश के (चित्) समान विद्या के प्रकाश को विस्तारयुक्त करता हुआ दुष्टों को (विजघान) विशेष करके मारता है, उसी कुल को सुभूषित करनेवाले आर्य मनुष्य को सर्वाधिपतिपन में स्वीकार कर राजधर्म का यथावत् पालन करें ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब धार्मिक मनुष्यों को उचित है कि सब मनुष्यों को अविद्या से निवारण और विद्या पढ़ा विद्वान् करके धर्माऽधर्म के विचारपूर्वक निश्चय से धर्म का ग्रहण और अधर्म का त्याग करें। सदैव आर्यों का सङ्ग डाकुओं के सङ्ग का त्याग कर सबसे उत्तम व्यवस्था में वर्त्तें ॥ ९ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आदर्श शासक

पदार्थान्वयभाषाः - १. राष्ट्र में (अनुव्रताय) = अनुकूल व्रतवालों के लिए, राष्ट्र के नियमों के अनुसार चलनेवालों के लिए (अपव्रतान्) = नियम भंग करनेवाले पुरुषों को (रन्धयन्) = नष्ट करता हुआ, पीड़ित करता हुआ और २. (आभूभिः) = [आभिमुख्येन भवन्तीति आभुवः स्तोतारः - सा०] अपने को सदा प्रभु के समक्ष जानकर उत्तम कार्य ही करनेवाले स्तोताओं के हेतु से (अनाभुवः) = [न आभिमुख्येन भवन्ति] नास्तिक व आसुरीवृत्तिवाले लोगों को (श्नथयन्) = हिंसित करता हुआ (इन्द्रः) = शत्रु - विद्रावक तथा स्वयं जितेन्द्रिय राजा ३. (वृद्धस्य चित्) = बढ़े हुए भी राष्ट्र का (वर्धतः) = वर्धन करनेवाले पुरुष का तथा (द्याम्, इनक्षतः) = [इनक्षतिर्गत्यर्थः] प्रकाश व ज्ञान के मार्ग पर चलनेवाले का (स्तवानः) = स्तवन करता हुआ, अर्थात् इनको उचित प्रशंसा प्राप्त कराता हुआ और इस प्रकार ४. (सन्दिहः) = [दिह उपच्ये] राष्ट्र का उपचय करनेवाला (वम्रः) = उद्गिरणशील, अर्थात् प्रजा से लिये हुए कर का प्रजाहित के लिए ही दे डालनेवाला राजा (विजघान) = राष्ट्र के शत्रुओं का नाश करता है [हन् हिंसा] अथवा विशिष्ट गतिवाला होता है [हन् गतौ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा राष्ट्र में 'अनुव्रत', 'आभू' पुरुषों का रक्षण करे, राष्ट्रवर्धक ज्ञानियों को प्रशंसित करे । राष्ट्रवर्धन के लिए ही सम्पूर्ण कर - प्राप्त धन का विनियोग करे । ऐसा ही राजा राष्ट्र के शत्रुओं का नाशक व उत्तम गतिवाला होता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स किं कुर्वन् किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

मनुष्यैर्य इन्द्रः परमविद्याद्यैश्वर्यवान् मनुष्य आभूभिः सह वर्त्तमानोऽनुव्रतायार्यायाव्रतान् दुष्टान् दस्यून् रन्धयन्ननाभुवः श्नथयन् शिथिली कुर्वन्निनक्षतो वर्धतो वृद्धस्य स्तवानो वम्रोऽधर्मस्योद्गिरकः सन्दिहो द्यां चिदिव प्रकाशं कुर्वन् सूर्य्य इव विद्याप्रचारं विस्तारयन् दुष्टान् विजघान विशेषेण हन्ति स एव कुलभूषकोऽस्ति तं सर्वाधिपतित्वेऽधिकृत्य राजधर्मः पालनीयः ॥ ९ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अनुव्रताय) अनुगतानि धर्म्याणि व्रतानि यस्य तस्मै (रन्धयन्) सेनया सामादिभिर्वा हिंसयन् (अपव्रतान्) अपगतानि दुष्टानि मिथ्याभाषणादीनि व्रतानि कर्माणि येषान्तान् दस्यून् (आभूभिः) समन्ताद्भवन्ति वीरा यासु प्रशासनक्रियासु ताभिः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सभाशालासेनान्यायाधीशः (श्नथयन्) हिंसयन् (अनाभुवः) ये समन्ताद्धर्माचरणे भवन्ति त आभुवो नाभुवोऽनाभुवस्तान् (वृद्धस्य) ज्ञानादिगुणैः श्रेष्ठस्य (चित्) इव (वर्द्धतः) यो गुणैर्दोर्षैर्वा वर्द्धते तस्य (द्याम्) किरणप्रकाशवद्विद्याप्रकाशम् (इनक्षतः) व्याप्नुवतः। अयं निपातेकारोपपदस्य नक्षधातोः प्रयोगः। (स्तवानः) यः स्तौति सः (वम्रः) उद्गिरकस्त्यक्ता (वि) विशेषे (जघान) हन्ति (संदिहः) संदिहत्यसौ सन्दिहः ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्धार्मिकैर्भूत्वा सर्वान् मनुष्यानविद्यातो निवर्त्य विद्यावतः कृत्वा धर्माऽधर्मौ संदिह्य निश्चित्य च धर्मग्रहणमधर्मत्यागश्च कार्य्यः कारयितव्यश्च। सदैवार्य्याणां सङ्गं कृत्वा दस्यूनां च त्यक्त्वा सर्वोत्तमायां व्यवस्थायां वर्त्तितव्यमिति ॥ ९ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Subduing the lawless for the law-abiding, fixing the traitors by proper acts of the patriots, appreciating and honouring the seniors, the progressive, and the growing and rising ones to the heights of knowledge and light of heaven, rejecting the scoffers and eliminating the skeptics, Indra, ruler, fighter and saviour marches on.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

Men should appoint such a person for administering the State who is full of abundant wealth of all kinds (spiritual as well as material) who with his brave soldiers and army humbles those persons who are devoid of vows of truthfulness and the like, in favor of those who observe them, who punishes those who are unrighteous, who praises the aged virtuous persons and gives up all unrighteous acts, who convinces those who are sceptics, who like the sun that dispels darkness, spreads the light of knowledge everywhere and slays well the wicked. Such a person is the ornament of his family and by appointing him as the administrator of the State, men should discharge their national duties.

पदार्थान्वयभाषाः - ( इन्द्र) परमैश्वर्यवान् सभाशालासेनान्यायाधीशः = A man possessing wealth of all kinds, the President of the Assembly, head of an educational institution, commander of the army or a judge. (वव्रः) उद्गिरकः त्यक्ता = Renouncer of unrighteousness.
भावार्थभाषाः - Men should become righteous, dispelling all darkness of ignorance of the people, They should accept Dharma and renounce Adharma (unrighteousness) after proper deliberation and should prompt others also to do the same. They should keep company with noble righteous persons and give up the association of the ignoble and thus should remain in good order of the society.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. सर्व धार्मिक माणसांनी सर्व माणसांच्या अविद्येचे निवारण करून विद्येचे अध्यापन करून विद्वान करावे. धर्माधर्माचा निश्चयपूर्वक विचार करावा. धर्माचे ग्रहण व अधर्माचा त्याग करावा. आर्यांची संगती, दस्यूंचा त्याग करावा व सर्वांशी व्यवस्थित वागावे. ॥ ९ ॥