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त्वं गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रपो॒तात्र॑ये श॒तदु॑रेषु गातु॒वित्। स॒सेन॑ चिद्विम॒दाया॑वहो॒ वस्वा॒जावद्रिं॑ वावसा॒नस्य॑ न॒र्तय॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ gotram aṅgirobhyo vṛṇor apotātraye śatadureṣu gātuvit | sasena cid vimadāyāvaho vasv ājāv adriṁ vāvasānasya nartayan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। गो॒त्रम्। अङ्गि॑रःऽभ्यः। अ॒वृ॒णोः॒। अप॑। उ॒त। अत्र॑ये। श॒तऽदु॑रेषु। गा॒तु॒ऽवित्। स॒सेन॑। चि॒त्। वि॒ऽम॒दाय॑। अ॒व॒हः॒। वसु॑। आ॒जौ। अद्रि॑म्। व॒व॒सा॒नस्य॑। न॒र्तय॑न् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:51» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ससेन) सेना से सहित सेनाध्यक्ष ! आप जैसे सूर्य (अङ्गिरोभ्यः) प्राणस्वरूप पवनों से (अद्रिम्) पर्वत और मेघों के तुल्य वर्त्तमान (अत्रये) जिसमें तीन अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख नहीं है, उस (आजौ) सङ्ग्राम में शत्रुओं के बल को (अपावृणोः) दूर कर देते हो (वावसानस्य) ढाँकनेवाले शत्रुपक्ष की सेना को (नर्त्तयन्) नचाते के समान कम्पाते हुए (विमदाय) विविध आनन्द के वास्ते (वसु) धन को (आवहः) अच्छे प्रकार प्राप्त कर (उत) और (गातुवित्) भूगर्भविद्या के जाननेवाले आप (शतदुरेषु) असंख्य मेघ के अवयवों में ढके हुए पदार्थों के समान ढकी हुई अपनी सेना को बचाते हो, सो आप सत्कार के योग्य हो ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सेनापति आदि जब तक वायु के सकाश से उत्पन्न हुए सूर्य के समान पराक्रमी नहीं होते, तब तक शत्रुओं को नहीं जीत सकते ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अंगिरस् , अत्रि व विमद

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! (त्वम्) = आप (अंगिरोभ्यः) = अंगिरा ऋषियों के लिए (गोत्रम्) = वेदवाणीरूप ज्ञानराशि को (अप अवृणोः) = अपावृत करते हो । जब हम सोम के संयम द्वारा अपने शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्ग को रसमय बनाते हैं तभी हम वेदज्ञान के अधिकारी होते हैं । २. (उत) = और हे प्रभो ! आप (अ - त्रये) = काम - क्रोध - लोभ - इन तीनों से ऊपर उठनेवाले के लिए (शतदुरेषु) = शत अर्थात् सैकड़ों द्वारोंवाले इस शरीर में निवास करने के समय (गातुवित्) = मार्ग दिखलानेवाले हैं । ३. (विमदाय) =‌ मदशून्य पुरुष के लिए (ससेन) = [सस्येन, ससं, नमः, आयुः अन्न - नि०] वानस्पतिक भोजनों के द्वारा (वसु) = निवास के लिए आवश्यक तत्त्वों को (आवह) = प्राप्त कराते हो । मांस - भोजन मनुष्य को क्रोध, अहंकार व ईर्ष्या - द्वेष की ओर ले जानेवाला है । ४. अंगिरस् बनने पर हमारे लिए वेदवाणी का प्रकाश होता है । इससे हम जीवन के कर्तव्य - मार्ग को देखकर 'अत्रि' बनते हैं । हमें इसी वेदज्ञान से यह भी ज्ञात होता है कि हमें मांस के सेवन से दूर रहना है । यह वानस्पतिक भोजन हमें "विमद" बनाता है । (वावसानस्य) = 'अंगिरस्, अत्रि व विमद' बनकर अपने निवास को उत्तम बनानेवाले इस पुरुष के (अद्रिम्) = अविद्या के पर्वत को (आजौ) = वासनाओं के साथ सतत - संग्राम होने पर वे प्रभु (नर्तयन्) = नचा देते हैं, अर्थात् हिला देते हैं । प्रभुकृपा से इस अविद्या - पर्वत के हिल जाने पर हमारा जीवन अविद्यामूलक क्लेशों से भी रहित हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम अंगिरस बनकर वेदज्ञान को प्राप्त करें, अत्रि बनकर मार्गद्रष्टा हों, विमद बनकर वसु को प्राप्त हों, वावसान बनकर अविद्या - पर्वत को हिला दें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे ससेन राजँस्त्वं यथा सूर्योऽङ्गिरोभ्योऽद्रिं गोत्रं मेघं चिदिवात्रय आजौ शत्रुबलमपावृणोः वावसानस्यारिपक्षस्य सेनां नर्त्तयन्निव विमदाय वस्ववहः। उतापि गातुवित्त्वं शतदुरेष्विवावृतां स्वसेनामपावृणोसि स भवान् सत्कर्त्तव्योऽसि ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) (गोत्रम्) मेघम्। गोत्रमिति मेघनामसु पठितम्। (निघं०१.१०) (अङ्गिरोभ्यः) प्राणरूपेभ्यो वायुभ्यः। प्राणो वा अङ्गिराः। (शत०६.३.७.३) (अवृणोः) वृणु (अप) दूरीकरणे (उत) अपि (अत्रये) अविद्यमानानि त्रीणि दुःखान्याध्यत्मिकाऽऽधिभौतिकाऽऽधिदैविकानि यस्मिन् सुखे तस्मै (शतदुरेषु) शतावरणेषु मेघावयवेषु धनेषु (गातुवित्) यो भूगर्भविद्यया गातुं पृथिवीं वेत्ति सः। गातुरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) (चित्) इव (विमदाय) विविधा मदा हर्षा यस्मिन् व्यवहारे तस्मै (अवहः) प्राप्नुहि (वसु) धनादिकम् (आजौ) संग्रामे (अद्रिम्) मेघम् (वावसानस्य) आच्छादकस्य। अत्र यङ्लुगन्ताद् वस आच्छादने धातोः कर्त्तरि ताच्छीलिकश्चानश् बहुलं छन्दसि इति शपः श्लुः। (नर्त्तयन्) नृत्यं कारयन्। अत्र न पादम्याङ्यम० (अष्टा०१.३.८८) इति निषेधे प्राप्ते व्यत्ययेन परस्मैपदम् ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सेनापत्यादयो यावत्सूर्य्यवत्पराक्रमं न गृह्णीयुस्तावच्छत्रुविजयमाप्तुं न शक्नुयुः ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, you open up the cloud-showers for the sake of pranic energies. Lord of the earth and master of motion and dominions of the earth, you open up a hundred outlets into wealth for the alleviation of want and threefold suffering of body, mind and soul. You bear wealth and comfort with food and energy for joy of the people in a state of sobriety. And reeling the dense forces of the overwhelming enemy into confusion, you throw off the adversaries in battle.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O King with thy army, as the sun dispels the cloud with the aid of the winds, thou demolishest the strength of the enemy in the battle for the sake of perfect happiness (where there is absence of all kinds of misery or suffering). Thou makest dance or subdue the army of the enemy which veils happiness of the people, bringing forth wealth for causing delight. Knowing the science of Geology, thou preservest and guardest thy army covered by thick clouds in the form of hundreds of difficulties and obstacles. Therefore, we honor thee whole-heartedly.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अंगिरोभ्य:) प्राणरूपेभ्यो वायुभ्यः ( प्राणो वा अंगिराः) ( शतपथ ६.३.७.२ ) = From winds. (अत्रये) अविद्यमानानि त्रीणि दुःखान्याध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकानि यस्मिन् सुखे तस्मै | = For perfect happiness free from three kinds of sufferings, physical, social and cosmic. (अद्रिम् ) मेघम् = Cloud. अद्रिरिति मेघनाम ( निघं० १.७ )
भावार्थभाषाः - Unless and until the Commander of the army and other military officers become mighty like the sun, they cannot achieve victory over their enemies.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सेनापती इत्यादी जोपर्यंत वायूच्या साह्याने उत्पन्न झालेल्या सूर्याप्रमाणे पराक्रमी नसतात. तोपर्यंत शत्रूंना जिंकू शकत नाहीत. ॥ ३ ॥