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देवता: इन्द्र: ऋषि: सव्य आङ्गिरसः छन्द: जगती स्वर: निषादः

तक्ष॒द्यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शवः॑। आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रवः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

takṣad yat ta uśanā sahasā saho vi rodasī majmanā bādhate śavaḥ | ā tvā vātasya nṛmaṇo manoyuja ā pūryamāṇam avahann abhi śravaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तक्ष॑त्। यत्। ते॒। उ॒शना॑। सह॑सा। सहः॑। वि। रोद॑सी॒ इति॑। म॒ज्मना॑। बा॒ध॒ते॒। शवः॑। आ। त्वा॒। वात॑स्य। नृ॒ऽम॒नः॒। म॒नः॒ऽयुजः॑। आ। पूर्य॑माणम्। अ॒व॒ह॒न्। अ॒भि। श्रवः॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:51» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:10» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:10» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (नृमणाः) मनुष्यों में मन देनेवाले (उशना) कामयमान विद्वान् आप ! (सहसा) अपने सामर्थ्य से शत्रुओं के (सहः) बल का हनन कर के जैसे सूर्य (रोदसी) भूमि और प्रकाश को करता है, वैसे (मज्मना) शुद्ध बल से (शवः) शत्रुओं के बल को (विबाधते) विलोड़न वा (आतक्षत्) छेदन करते हो और (ते) आप के (मनोयुजः) मन से युक्त होनेवाले भृत्य (त्वा) आप का आश्रय ले के (ते) आप के (वातस्य) बलयुक्त वायु के सम्बन्धी (आपूर्यमाणम्) न्यूनतारहित (श्रवः) श्रवण और अन्नादि को (अभ्यावहन्) प्राप्त होवें ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् सभाध्यक्ष के विना पृथिवी के राज्य की व्यवस्था शत्रुओं के बल की हानि विद्यादि सद्गुणों का प्रकाश और उत्तम अन्नादि की प्राप्ति नहीं होती ॥ १० ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान व यश की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार जिस समय राजा अपव्रतों को दूर करके अनुव्रतों को उत्तम परिस्थिति प्राप्त कराता है, तब (यत्) = यदि (उशना) = सर्वलोकहित की कामनावाला वह प्रभु (सहसा) = सब बुराइयों का पराभव करनेवाले बल के द्वारा (ते सहः) = तेरे बल को (तक्षत्) = तीन करता है, तो (शवः) = तेरा यह बल (मज्मना) = अपनी शोधक शक्ति से [मस्ज् शुद्धौ] (रोदसी) = द्युलोक व पृथिवीलोक को (विबाधते) = विशिष्ट रूप से आलोडित करनेवाला होता है । सारा संसार भी उसके विरोध में हो तो भी वह पराजित नहीं होता और सम्पूर्ण संसार में एक हलचल मचा देता है, जोकि संसार का शोधन करनेवाली होती है । २. हे (नृमणः) = [नृषु मनो यस्य] लोकहित की भावनायुक्त मनवाले ! (त्वा) = शोधक शक्ति से संसार को आलोडित करनेवाले तुझे (आपूर्यमाणम्) = प्रभु के द्वारा शक्ति से पूर्ण किये जाते हुए तुझे (वातस्य) = आत्मा के (मनोयुजः) = मन से युक्त ये इन्द्रियरूप अश्व (श्रवः अभि) = ज्ञान व यश के प्रति (आवहन्) = प्राप्त करानेवाले हों । आत्मा को यहाँ 'वात' शब्द से कहा गया है । 'वा' धातु से 'वात' शब्द बना है, 'अत्' धातु से 'आत्मा' । दोनों धातुओं का अर्थ गति है । आत्मा को स्वाभाविक रूप से गतिशील होना ही चाहिए । यह आत्मा रथी है । इसके शरीररूप रथ में इन्द्रियरूप अश्व जुते हैं । ये इन्द्रियरूप अश्व मनरूपी लगाम से युक्त हैं । जब ये घोड़े लगाम द्वारा काबू में होते हैं, तब ये ज्ञान और उत्तम कर्मों द्वारा यश का वर्धन करनेवाले होते हैं । ३. यह सब होता तभी है जब सबका हित चाहनेवाले प्रभु अपने बल से जीव को बलयुक्त करते हैं । प्रभु के तेज से तेजस्वी बनकर यह प्रभुभक्त अपने जीवन को तो शुद्ध बनाता ही है, इसी बल के द्वारा यह सम्पूर्ण संसार में भी उस हलचल को पैदा करता है, जो सारे संसार की शोधक होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुकृपा से हम तेजस्वी बनकर, शोधक बल से संसार को शुद्ध करनेवाले हों । वशीभूत इन्द्रियाँ हमें ज्ञान व यश की ओर ले - चलें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सभाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे नृमणो विद्वन्नुशना ! भवान् सहसा शत्रूणां सहो हत्वा सूर्यो रोदसी भूमिप्रकाशाविव मज्मना स्वकीयेन शुद्धेन बलेन शवः शत्रूणां बलं विबाधत आतक्षच्च। मनोयुजो भृत्यास्त्वा त्वामाश्रित्य ते तव वातस्यापूर्यमाणं श्रवोऽभ्यवहन् समन्तात् प्राप्नुयुः ॥ १० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तक्षत्) तनूकरोति (यत्) (ते) तव (उशना) कामयमानः (सहसा) सामर्थ्येनाकर्षणेन वा (सहः) बलं सहनम् (वि) विशेषार्थे (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (मज्मना) शुद्धेन बलेन। मज्मेति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) (बाधते) विलोडयति (शवः) बलम् (आ) समन्तात् (त्वा) त्वाम् (वातस्य) बलिष्ठस्य वायोरिव (नृमणः) नृषु नयनकारिषु मनो यस्य तत्सम्बुद्धौ (मनोयुजः) ये मनसा युज्यन्ते ते भृत्याः (आ) समन्तात् (पूर्य्यमाणम्) न्यूनतारहितम् (अवहन्) प्राप्नुयुः (अभि) आभिमुख्ये (श्रवः) श्रवणमन्नं वा ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। नहि विदुषा सेनाध्यक्षेण विना पृथिवीराज्यव्यवस्था शत्रूणां बलहानिर्विद्यासद्गुणप्रकाशा उत्तमान्नादिप्राप्तिश्च जायते ॥ १० ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ushana, power of love and honour, with courage and dignity tempered and sharpened, your valour and grandeur, and your valour and splendour with its speed and sharpness bounds the heaven and earth. Indra, admirable hero of humanity, may the currents of wind fast as mind elevate you, lord of fulfilment, and amply fulfilled, may they carry your fame to the heavens.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O friend or well-wisher of men, desiring the welfare of all, thou shouldst diminish and destroy the power of thy enemies with thy pure might like the sun that dispels all darkness. Thy servants that are devoted to thee-who art mighty like the wind, and full of virtues should approach thee from all sides and get knowledge and food from thee.

पदार्थान्वयभाषाः - ( मज्मना ) शुद्धेन बलेन मज्मेति बलनाम (निघ० २.९) = with pure might. ( वातस्य) बलिष्ठस्य वायोरिव = of the mighty like the wind.
भावार्थभाषाः - Without the help and guidance of the learned commander in-chief of the army, it is not possible to establish law and order on earth, the destruction of the power of the enemies, the manifestation and diffusion of knowledge and noble virtues and the acquisition of food materials and other articles.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. विद्वान सेनाध्यक्षाशिवाय पृथ्वीवरील राज्याची व्यवस्था, शत्रूंच्या बलाची हानी, विद्या इत्यादी सद्गुणांचा प्रकाश व उत्तम अन्न इत्यादींची प्राप्ती होत नाही. ॥ १० ॥