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अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॒ सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्यः॑ । ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayukta sapta śundhyuvaḥ sūro rathasya naptyaḥ | tābhir yāti svayuktibhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अयु॑क्त । स॒प्त । शु॒न्ध्युवः॑ । सूरः॑ । रथ॑स्य । न॒प्त्यः॑ । ताभिः॑ । या॒ति॒ । स्वयु॑क्तिभिः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:50» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश्वर ! जैसे (सूरः) सबका प्रकाशक जो (सप्त) पूर्वोक्त सात (नप्तः) नाश से रहित (शुन्ध्युवः) शुद्धि करनेवाली किरणें हैं उनको (रथस्य) रमणीयस्वरूप में (अयुक्त) युक्त करता और उनसे सहित प्राप्त होता है वैसे आप (ताभिः) उन (स्वयुक्तिभिः) अपनी युक्तियों से सब संसार को संयुक्त रखते हो ऐसा हमको दृढ़ निश्चय है ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो सूर्य के समान आपही आपसे प्रकाश स्वरूप आकाश के तुल्य सर्वत्र व्यापक उपासकों को पवित्रकर्त्ता परमात्मा है वही सब मनुष्यों का उपास्यदेव है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्य चङ्क्रमण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (सूरः) = सूर्य (रथस्य) = हमारे शरीररूपी रथों की (नप्त्यः) = न गिरने देनेवाली (सप्त) = सात (शुन्ध्यवः) = शोधक किरणों को (अयुक्त) = रथ में जोतता है । सूर्य की किरणें सात रंगों के भेद से सात प्रकार की हैं । ये हमारे शरीर में प्राणशक्ति का सञ्चार करके हमारे शरीरों का शोधन करती हैं और उन शरीरों को गिरने नहीं देती, अर्थात् क्षीणशक्ति नहीं होने देती । २. यह सूर्य (ताभिः) = उन (स्वयुक्तिभिः) = अपने रथ में जुते हुए किरणरूप अश्वों के साथ (याति) = अन्तरिक्ष में आगे और आगे चलता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्य अपनी सातों किरणों के साथ अन्तरिक्ष में आगे - आगे चल रहा है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अयुक्त) योजयति (सप्त) पूर्वोक्ताः (शुन्ध्युवः) पवित्रहेतवो रश्मयोऽश्वाः। अत्र तन्वादीनां छन्दसि बहुलमुपसंख्यानम्। अ० ६।४।७७। अनेन वार्त्तिकेनोवङादेशः। (सूरः) यः सरति प्राप्नोति स सूर्यः (रथस्य) रमणाधिकरणस्य जगतो मध्ये (नप्तः) पातेन नाशेन रहिताः। अत्र सुपां सुलुग् इति जसः स्थाने सुः। नञुपपदात् पतधातोरिक्कृषादिभ्यः। अ० *३।१।८। इतीक्। तनिपत्योश्छन्दसि अ० ६।४।९९। अनेनोपधालोपः। इकारस्याकारादेशश्च। (ताभिः) व्याप्तिभिः (याति) प्राप्नोति (स्वयुक्तिभिः) स्वा युक्तयो योजनानि यासु ताभिः ॥९॥ #[अ० ३।३।१०८ इति सूत्र स्थवार्तिकेनेक् प्र०। सं०।]

अन्वय:

पुनः सा #कीदृशीत्युपदिश्यते। *[हिन्दी लेखानुसार सः कीदृश इत्यु०। सं०]

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश्वर ! यथा सूरो याः सप्त नप्तः शुन्ध्युवः सन्ति ता रथस्य मध्येऽयुक्त तैः सह याति प्राप्नोति तथा त्वं स्वयुक्तिभिः सर्वं विश्वं जगत्संयोजयसीति वयं विजानीमः ॥९॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यः सूर्यवत् स्वयं प्रकाश आकाशमिव व्याप्त उपासकानां शुद्धिकरः परमेश्वरोस्ति स खलु सर्वैर्मनुष्यैरुपासनीयो वर्त्तते ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The sun, bright and illuminant, yokes the seven pure, immaculate, purifying and infallible sunbeams like horses to his chariot of motion, and with these self-yoked powers moves on across the spaces to the regions of light.$So does the Lord of the Universe with His laws and powers of Prakrti move the world like His own chariot of creative manifestation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O God, the Divine Sun, as the sun is attained through the purifying seven kinds of rays, so Thou art attained or known by Thy wonderful designs with which thou control lest the Universe.

पदार्थान्वयभाषाः - (शुन्ध्युव:) पवित्रहेतवो रश्मयोऽश्वाः शुन्ध्युरित्यश्वनामसु. ( निघ० १) शुन्ध-विशुद्धौ यजिमनिशुन्धिदसिजनिभ्यो युः ( उण० ३.२० ) इति यु· प्रत्ययः । शसि तन्वादीनां छन्दसि बहुलम् उपसंख्यानम् ( अष्टा० ६.४.७७।१ ) इति वार्तिकेन उवङादेशः ॥ = Purifying rays of the sun like the horses. ( रथस्य ) रमणाधिकरणस्य जगतो मध्ये ( रथो रमतेर्वा रंहतेर्वा निरुक्ते ९.२.११) = Of the world, the means of proper enjoyment.
भावार्थभाषाः - God alone should be adored by all men, who is Self effulgent like the sun, pervading all like the sky and purifier of His devotees.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जो सूर्याप्रमाणे स्वतःचा स्वतःच प्रकाशस्वरूप, आकाशाप्रमाणे सर्वत्र व्यापक, उपासकांना पवित्र करणारा, असा परमेश्वर आहे, तोच सर्व माणसांचा उपास्य देव आहे. ॥ ९ ॥