स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य । शो॒चिष्के॑शं विचक्षण ॥
sapta tvā harito rathe vahanti deva sūrya | śociṣkeśaṁ vicakṣaṇa ||
स॒प्त । त्वा॒ । ह॒रितः॑ । रथे॑ । वह॑न्ति । दे॒व॒ । सू॒र्य॒ । शो॒चिःके॑शम् । वि॒च॒क्ष॒ण॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सप्ताश्व
स्वामी दयानन्द सरस्वती
(सप्त) सप्तविधाः किरणाः (त्वा) त्वाम् (हरितः) यैः किरणै रसान् हरति त आदित्यरश्मयः। हरितइत्यादिष्टोपयोजनना०। निघं० १।१५। (रथे) रमणीये लोके (वहन्ति) (देव) दातः (सूर्य्य) ज्ञानस्वरूप ज्ञानप्रापक वा (शोचिष्केशम्) शोचींषि केशा दीप्तयो रश्मयो यस्य तं सूर्य्यलोकम् (विचक्षण) विविधान् दर्शक ॥८॥
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is the Divine Sun (God) is taught further in the 8th Mantra with the illustration of the sun.
O illuminator, Omniscient Divine Sun, as seven kinds of rays of the sun, cause to attain the resplendent sun in this beautiful world, so it is the Mantras composed in seven kinds of meters Gayatri, Anushtup, Trishtup etc. that cause us to attain Thee.
