वि द्यामे॑षि॒ रज॑स्पृ॒थ्वहा॒ मिमा॑नो अ॒क्तुभिः॑ । पश्य॒ञ्जन्मा॑नि सूर्य ॥
vi dyām eṣi rajas pṛthv ahā mimāno aktubhiḥ | paśyañ janmāni sūrya ||
वि । द्याम् । ए॒षि॒ । रजः॑ । पृ॒थु । अहा॑ । मिमा॑नः । अ॒क्तुभिः॑ । पश्य॑न् । जन्मा॑नि । सू॒र्य॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दिन - रात्रि का निर्माण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
(वि) विशेषार्थे (द्याम्) प्रकाशम् (एषि) (रजः) लोकसमूहम् (पृथु) विस्तीर्णम् (अहा) अहानि दिनानि (मिमानः) प्रक्षिपन् विभजन् (अक्तुभिः) रात्रिभिः (पश्यन्) समीक्षमाणः (जन्मानि) पूर्वापरवर्त्तमानानि (सूर्य्य) चराऽचरात्मन् ॥७॥
पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What does He (God) do is taught in the seventh Mantra.
O God Divine Sun the Universal Spirit pervading all, Thou illuminest the heaven and the middle region and the earth dividing days and nights like the sun. Thou seest the actions of all creatures and fully knowest about their births as Thou art Omniscient.
