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प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान् । प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pratyaṅ devānāṁ viśaḥ pratyaṅṅ ud eṣi mānuṣān | pratyaṅ viśvaṁ svar dṛśe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒त्यङ् । दे॒वाना॑म् । विशः॑ । प्र॒त्यङ् । उत् । ए॒षि॒ । मानु॑षान् । प्र॒त्यङ् । विश्व॑म् । स्वः॑ । दृ॒शे॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:50» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! जो आप (देवानाम्) दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के (विशः) प्रजा (मानुषान्) मनुष्यों को (प्रत्यङ्ङुदेषि) अच्छे प्रकार प्राप्त हो और सब के आत्माओं में (प्रत्यङ्) प्राप्त होते हो इससे (विश्वस्वर्दृशे) सब सुखों के देखने के अर्थ सबों के (प्रत्यङ्) प्रत्यगात्मरूप से उपासनीय हो ॥५॥
भावार्थभाषाः - जिससे ईश्वर सब कहीं व्यापक सबके आत्मा का जाननेवाला और सब कर्मों का साक्षी है इसलिये यही सब सज्जन लोगों को नित्य उपासना करने के योग्य है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'देव व मानुष बनना' - ब्रह्मदर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे सूर्य ! तू (देवानां विशः प्रत्यङ्) = देवों की प्रजाओं के प्रति गति करता हुआ (उदेषि) = उदित होता है, अर्थात् सूर्य का प्रकाश प्रजाओं को दिव्य गुणोंवाला व दैवीवृत्तिवाला बनाता है । सूर्य के प्रकाश में रहनेवाले लोग दिव्य गुणोंवाले बनते हैं । सूर्य का प्रकाश मन पर अत्यन्त स्वास्थ्यजनक प्रभाव डालता है । २. (मानुषान् प्रत्यङ् उदेषि) = मानुषों के प्रति गति करता हुआ यह सूर्य उदय होता है । सूर्य हमें मानुष बनाता है । 'मानुष' वह है जो 'मत्वा कर्माणि सीव्यति' विचारपूर्वक कर्म करता है । सूर्य के प्रकाश में रहनेवाले व्यक्ति समझ से काम करनेवाले बनते हैं । अथवा सूर्य मानुषान् प्रत्यङ् उदेषि - [मानुष-Humane] दयालुओं के प्रति उदय होता है । सूर्यप्रकाश मनुष्य की मनोवृत्ति को अक्रूर बनाता है । सामान्यतः हिंसावृत्ति के पशु व असुर रात्रि के अन्धकार में ही कार्य करते हैं, सूर्य का प्रकाश उनके लिए अरुचिकर होता है । (स्वः दृशे) = उस स्वयं राजमान ज्योति 'ब्रह्म' के दर्शन के लिए तू (विश्वं प्रत्यङ्) = सबके प्रति गति करता हुआ उदय होता है । इस उदय होते हुए सूर्य में द्रष्टा को प्रभु की महिमा का आभास मिलता है । यह सूर्य उसे प्रभु को विभूति के रूप में दिखता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्य का प्रकाश हमें देव व मानुष बनाता है और प्रभु का दर्शन कराता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(प्रत्यङ्) यः प्रत्यञ्चति सः (देवानाम्) दिव्यानां पदार्थानां विदुषां वा (विशः) प्रजाः (प्रत्यङ्) प्रत्यञ्चतीति (उत्) ऊर्ध्वे (एषि) (मानुषान्) मनुष्यान् (प्रत्यङ्) यत्प्रत्यञ्चति तत् (विश्वम्) सर्वम् (स्वः) सुखम् (दृशे) द्रष्टुम् ॥५॥

अन्वय:

पुनः स जगदीश्वरः कीदृशइत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! यस्त्वं देवानां विशो मानुषान् प्रत्यङ्ङुदेष्युत्कृष्टतया प्राप्तोसि सर्वेषामात्मसु प्रत्यङ्ङसि तस्माद्विश्वं स्वर्दृशे प्रत्यङ्ङुपासनीयोऽसि ॥५॥
भावार्थभाषाः - यत ईश्वरः सर्वव्यापकः सकलान्तर्यामी समस्तकर्मसाक्षी वर्त्तते तस्मादयमेव सर्वैः सज्जनैरुपासनीयोऽस्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lord Light of the world, to the noblest powers of nature and humanity, to the people in the business of life, to the people in general, you rise directly and reveal your presence directly in their heart and soul so that the world may see the light divine directly through their experience.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that God is taught further in the fifth Mantra.

अन्वय:

O God, Thou pervadest and appearest before absolutely truthful learned persons and also before men of thoughtful nature. Thou manifestest Thy glory, so that the whole world may attain happiness. Thou shinest to show the path of salvation. Therefore Thou art worthy of communion by all.

भावार्थभाषाः - Because God is Omnipresent, the Inner Spirit pervading all and winness of all actions, He alone is worthy of adoration and communion.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ईश्वर सर्वत्र व्यापक सर्वांच्या आत्म्याला जाणणारा व सर्व कर्मांचा साक्षीदार आहे तोच सर्व सज्जन लोकांनी नित्य उपासना करावी असा आहे. ॥ ५ ॥