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त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य । विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taraṇir viśvadarśato jyotiṣkṛd asi sūrya | viśvam ā bhāsi rocanam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त॒रणिः॑ । वि॒श्वद॑र्शतः । ज्यो॒तिः॒कृत् । अ॒सि॒ । सू॒र्य॒ । विश्व॑म् । आ । भा॒सि॒ । रो॒च॒नम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:50» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सूर्य्य) चराचर के आत्मा ईश्वर ! जिससे (विश्वदर्शतः) विश्व के दिखाने और (तरणिः) शीघ्र सबका आक्रमण करने (ज्योतिष्कृत्) स्वप्रकाश स्वरूप आप ! (रोचनम्) रुचिकारक (विश्वम्) सब जगत् को प्रकाशित करते हैं इसीसे आप स्वप्रकाशस्वरूप हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्य्य और बिजुली बाहर भीतर रहने वाले सब स्थूल पदार्थों को प्रकाशित करते हैं वैसे ही ईश्वर भी सब वस्तु मात्र को प्रकाशित करता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिविध स्वास्थ्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (सूर्य) = सूर्य ! तू (तरणिः) = हमें रोगों से तारनेवाला है । उदय होता हुआ सूर्य रोगकृमियों को नष्ट करता है और इस प्रकार हमें नीरोग बनाता है । (विश्वदर्शतः) = [विश्वं दर्शतं द्रष्टव्यं यस्य] सूर्य सारे संसार का पालन करता है [दृश् - to look after] । (ज्योतिः कृत् असि) = यह सूर्य सर्वत्र प्रकाश करनेवाला है । (विश्वं रोचनम्) = सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को (आभासि) = समन्तात् भासित कर देता है । सूर्य के उदय होते ही सम्पूर्ण अन्तरिक्ष सब ओर से चमक उठता है । २. सूर्य शरीर को रोगों से रहित करके स्वस्थ बनाता है [तरणिः], मस्तिष्क को यह ज्योतिर्मय करता है [ज्योतिष्कृत्] और हृदयान्तरिक्ष को सब मलिनताओं से रहित करके चमका देता है । एवं, सूर्य के प्रकाश का प्रभाव 'शरीर, मस्तिष्क व मन' सभी को सौन्दर्य प्रदान करनेवाला भावार्थ - सूर्य हमें 'श
भावार्थभाषाः - सूर्य हमें शरीर मन व मस्तिष्क के त्रिविध स्वास्थ्य को प्राप्त कराता है। 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(तरणिः) क्षिप्रतया संप्लविता (विश्वदर्शतः) यो विश्वस्य दर्शयिता (ज्योतिष्कृत्) यो ज्योतिः प्रकाशात्मकैः सूर्यादिलोकं करोति सः (असि) (सूर्य) सर्वप्रकाशक सर्वात्मन् (विश्वम्) सर्वं जगत् (आ) समन्तात् (भासि) प्रकाशयसि (रोचनम्) अभिप्रेतं रुचिकरम् ॥४॥

अन्वय:

पुनः स कीदृशइत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सूर्य्येश्वर ! यतो विश्वदर्शतस्तरणिर्ज्योतिष्कृत् त्वं रोचनं विश्वमाभासि तस्मात्स्वयं प्रकाशोऽसि ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथा सूर्य्यविद्युतौ बाह्याभ्यन्तरस्थान्मूर्त्तान् पदार्थान् प्रकाशेतान्तथेश्वरः सर्वमखिलं जगत् प्रकाशयति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Sun, light of the world, creator of light and Light Itself, it is you alone who light the lights of the universe and reveal the wondrous worlds of beauty and glory. You are the saviour, you are the redeemer, taking us across the seas of existence.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is He (The Divine Sun) is taught in the fourth Mantra.

अन्वय:

Thou, O illuminating Divine Sun (God) art the source of Light; Thou enablest us to see the whole Universe and art Creator of the Sun. Thou art illumining all the radiant realms.

भावार्थभाषाः - As the sun and the electricity illuminate external gross or embodied objects, God illuminates the whole world.
टिप्पणी: Even the orthodox commentators like Sayanacharya have to admit that here the word सूर्य stands primarily for God. Sayanacharya after giving the material interpretation regarding the sun, says. यद्वा हे सूर्य अन्तर्यामितया सर्वस्य प्रेरक परमात्मम् त्वं तरणिः -संसाराब्धेस्तारकोऽसि सर्वैर्मुमुक्षुभिः द्रष्टव्योऽसि । Thou O God, the Impeller of all on account of being the Inner most Spirit of all art worthy of being seen by all desirous of attaining emancipation and art able to take us across the ocean of the world etc. Shri Kapali Shastri-a great scholar and Yogi of South India has given spiritual interpretation of this whole hymn, interpreting. सूर्य as सर्वस्य प्रेरक परमात्मन् तरणि:- तारयिता यजमानं तमसस्पारम् = God the Impeller of all and taking the worshipper beyond all darkness. षू-प्रेरणे
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्य व विद्युत आत बाहेर राहणाऱ्या सर्व स्थूल पदार्थांना प्रकाशित करतात तसेच ईश्वरही सर्व वस्तूंना प्रकाशित करतो. ॥ ४ ॥