त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य । विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम् ॥
taraṇir viśvadarśato jyotiṣkṛd asi sūrya | viśvam ā bhāsi rocanam ||
त॒रणिः॑ । वि॒श्वद॑र्शतः । ज्यो॒तिः॒कृत् । अ॒सि॒ । सू॒र्य॒ । विश्व॑म् । आ । भा॒सि॒ । रो॒च॒नम्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
त्रिविध स्वास्थ्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
(तरणिः) क्षिप्रतया संप्लविता (विश्वदर्शतः) यो विश्वस्य दर्शयिता (ज्योतिष्कृत्) यो ज्योतिः प्रकाशात्मकैः सूर्यादिलोकं करोति सः (असि) (सूर्य) सर्वप्रकाशक सर्वात्मन् (विश्वम्) सर्वं जगत् (आ) समन्तात् (भासि) प्रकाशयसि (रोचनम्) अभिप्रेतं रुचिकरम् ॥४॥
पुनः स कीदृशइत्युपदिश्यते।
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is He (The Divine Sun) is taught in the fourth Mantra.
Thou, O illuminating Divine Sun (God) art the source of Light; Thou enablest us to see the whole Universe and art Creator of the Sun. Thou art illumining all the radiant realms.
