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उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud vayaṁ tamasas pari jyotiṣ paśyanta uttaram | devaṁ devatrā sūryam aganma jyotir uttamam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । व॒यम् । तम॑सः । परि॑ । ज्योतिः॑ । पश्य॑न्तः । उत्त॑रम् । दे॒वम् । दे॒व॒त्रा । सूर्य॑म् । अग॑न्म । ज्योतिः॑ । उ॒त्त॒मम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:50» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसको विद्वान्लोग किस प्रकार का जानें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! जैसे (ज्योति) ईश्वर ने उत्पन्न किये प्रकाशमान सूर्य्य को (पश्यन्तः) देखते हुए (वयम्) हम लोग (तमसः) अज्ञानान्धकार से अलग होके (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप (उत्तरम्) सबसे उत्तम प्रलय से ऊर्ध्व वर्त्तमान वा प्रलय करनेहारा (देवत्रा) देव मनुष्य पृथिव्यादिकों में व्यापक (देवम्) सुख देने (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण कर्म स्वभाव युक्त (सूर्य्यम्) सर्वात्मा ईश्वर को (पर्युदगन्म) सब प्रकार प्राप्त होवें वैसे तुम भी उस को प्राप्त होओ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त होने योग्य कोई भी मनुष्य हो सकता है ऐसा निश्चित जानें ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अग्नि - विद्युत् - सूर्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. (वयम्) = हम तमसः (परि) = अन्धकार से परे (उत्) = उत्कृष्ट ज्योति अग्नि को तथा (उत्तरम्) = उद्गततर ज्योति, अधिक उत्कृष्ट (ज्योतिः) = विद्युत् को (पश्यन्तः) देखते हुए (देवं देवत्रा) = देवों में भी देव, प्रकाशमान पदार्थों में भी प्रकाशमान (उत्तम ज्योतिः) = सर्वोत्तम ज्योति (सूर्यम्) = सूर्य को (अगन्म) = प्राप्त हों । २. हम अग्नि का ज्ञान प्राप्त करें, विद्युत् - तत्त्व को समझने का यत्न करें और सूर्य के विज्ञान को अपनाएँ । ये ही तीन ज्योतियाँ अध्यात्म में शरीर, हृदय व मस्तिष्क में निवास करती हैं । इन ज्योतियों के अध्यात्म में ठीक कार्य करने पर हमारी वाणी, मन व मस्तिष्क सभी सुन्दर होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अग्नि उत्कृष्ट ज्योति है, विद्युत् उत्कृष्टतर है और सूर्य उत्कृष्टतम है । ये क्रमशः पार्थिव, अन्तरिक्ष व दिव्य ज्योतियाँ हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(उत्) ऊर्ध्वेर्थे (वयम्) विद्वांसः (तमसः) आवरकादज्ञानादन्धकारात् (परि) परितः (ज्योतिः) ईश्वररचितं प्रकाशस्वरूपं सूर्य्यलोकं (पश्यन्तः) प्रेक्षमाणाः (उत्तरम्) सर्वोत्कृष्टं प्रलयादूर्ध्वं वर्त्तमानं संप्लवकर्त्तारम् (देवम्) दातारम् (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु मनुष्येषु पृथिव्यादिषु वा वर्त्तमानम् (सूर्य्यम्) सर्वात्मानम् (अगन्म) प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशम् (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम् ॥१०॥

अन्वय:

पुनस्तं विद्वांसः कीदृशं जानीयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्या ! यथा ज्योतिः पश्यन्तो वयं तमसः पृथग्भूते ज्योतिरुत्तमं देवत्रा देवमुत्तमं ज्योतिः सूर्य्यं परात्मानं पर्य्युदगन्मोत्कृष्टतया प्राप्नुयाम तथा युयमप्येतं प्राप्नुत ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्नहि परमेश्वरेण सदृशः कश्चिदुत्तमः प्रकाशकः पदार्थोऽस्ति न खल्वेतत्प्राप्तिमन्तरेण मुक्तिसुखं प्राप्तुं कोऽपि मनुष्योऽर्हतीति वेद्यम् ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us rise beyond the dark seeing the light higher and still higher and reach the sun, the highest light and Lord Supreme of the divinities of the universe.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should the learned men know God is taught further in the tenth Mantra.

अन्वय:

O men, as we seeing the light of the sun who dispels darkness as made by God rise above and see within our souls God who remains even after dissolution and then attain that Divine Sun who is the Best Light, Giver of Peace and Bliss and present among all enlightened persons and worlds, being the most exalted.

भावार्थभाषाः - Men should know that there is none who is equal to God, the Supreme Being and none can get emancipation without attaining Him.
टिप्पणी: In this Mantra we find उत्, उत्तर, उत्तम denoting the the common, comparative and superlative degrees. So many good scholars take them to denote matter, soul and God the three eternal entities. Taking that meaning which is also significant, we can translate the Mantra metrically as follows- We are rising above darkness. Of the matter that's below. Are perceiving immortal spirit By whose power we can grow. Then we see the light of light. Bestower of pure delight. Sun Divine we attain. In His shelter we remain.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. परमेश्वरासारखा कोणताही पदार्थ उत्तम नाही व त्याच्या प्राप्तीशिवाय कोणताही मनुष्य मुक्तिसुख प्राप्त करू शकत नाही, हे निश्चित जाणावे. ॥ १० ॥