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अक्षि॑तोतिः सनेदि॒मं वाज॒मिन्द्रः॑ सह॒स्रिण॑म्। यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ पौंस्या॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

akṣitotiḥ saned imaṁ vājam indraḥ sahasriṇam | yasmin viśvāni pauṁsyā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अक्षि॑तऽऊतिः। स॒ने॒त्। इ॒मम्। वाज॑म्। इन्द्रः॑। स॒ह॒स्रिण॑म्। यस्मि॑न्। विश्वा॑नि। पौंस्या॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:5» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:10» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:2» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

वह जगदीश्वर हमारे लिये क्या करे, सो अगले मन्त्र में वर्णन किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अक्षितोतिः) नित्य ज्ञानवाला (इन्द्रः) सब ऐश्वर्य्ययुक्त परमेश्वर है, वह कृपा करके हमारे लिये (यस्मिन्) जिस व्यवहार में (विश्वानि) सब (पौंस्या) पुरुषार्थ से युक्त बल हैं (इमम्) इस (सहस्रिणम्) असंख्यात सुख देनेवाले (वाजम्) पदार्थों के विज्ञान को (सनेत्) सम्यक् सेवन करावे, कि जिससे हम लोग उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त हों॥९॥
भावार्थभाषाः - जिसकी सत्ता से संसार के पदार्थ बलवान् होकर अपने-अपने व्यवहारों में वर्त्तमान हैं, उन सब बल आदि गुणों से उपकार लेकर विश्व के नाना प्रकार के सुख भोगने के लिये हम लोग पूर्ण पुरुषार्थ करें, तथा ईश्वर इस प्रयोजन में हमारा सहाय करे, इसलिये हम लोग ऐसी प्रार्थना करते हैं॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सम्पूर्ण बल 

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु का स्तवन करनेवाला सदा अपनी रक्षा कर पाता है । यह वासनाओं का शिकार होने से बचा रहता है । वासनाओं से बचकर वह सोम - रक्षण कर पाता है । यह (अक्षित-ऊतिः) - न नष्ट हुए-हुए रक्षणवाला  , अर्थात् सदा सोम की रक्षा करनेवाला (इन्द्रः) -  जितेन्द्रिय पुरुष (इयम्) - इस (सहस्त्रिणम्) - [स हस्] सदा हास्य व प्रसन्नता को देनेवाले (वाजम्) - अन्न का (सनेत्) सेवन करे  , (यस्मिन्) - जिस सात्त्विक अन्न में (विश्वानि) - सब (पौंस्या) - बल हैं ।  २. मनुष्य को चाहिए कि उस अन्न का सेवन करे जो सुख व प्रीति का बढ़ानेवाला है [सहस्रिणम्] तथा बल की वृद्धि करनेवाला है [पौंस्या] । गीता में सुख  , प्रीति व बल आदि के बढ़ानेवाले अन्न को ही सात्त्विक अन्न कहा है । इस सात्विक अन्न का सेवन करनेवाला सात्त्विक वृत्तियों की वृद्धि से सोम की रक्षा सुगमता से कर पाता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम उस अन्न का सेवन करें जो सुख - प्रीति - विवर्धक हो तथा बल को बढ़ानेवाला हो । यही अन्न हमें सोम के पान के योग्य बनाते हैं और हमारा जीवन आनन्दमय व शक्तिसम्पन्न बनता है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

स जगदीश्वरोऽस्मदर्थं किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते।

अन्वय:

योऽक्षितोतिरिन्द्रः परमेश्वरोऽस्ति स यस्मिन् विश्वानि पौंस्यानि बलानि सन्ति तानि सनेत्संसेवयेदस्मदर्थमिमं सहस्रिणं वाजं च, यतो वयं सर्वाणि सुखानि प्राप्नुयाम॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षितोतिः) क्षयरहिता ऊतिर्ज्ञानं यस्य सोऽक्षितोतिः (सनेत्) सम्यग् सेवयेत् (इमम्) प्रत्यक्षविषयम् (वाजम्) पदार्थविज्ञानम् (इन्द्रः) सकलैश्वर्य्ययुक्तः परमात्मा (सहस्रिणम्) सहस्राण्यसंख्यातानि सुखानि यस्मिन्सन्ति तम्। तपःसहस्राभ्यां विनीनी। (अष्टा०५.२.१०२) अनेन सहस्रशब्दादिनिः। (यस्मिन्) व्यवहारे (विश्वानि) समस्तानि (पौंस्या) पुंसो बलानि। पौंस्यानीति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) शेर्लुगत्रापि॥९॥
भावार्थभाषाः - वयं यस्य सत्तयेमे पदार्था बलवन्तो भूत्वा स्वस्य स्वस्य व्यवहारे वर्त्तन्ते, तेभ्यो बलादिगुणेभ्यो विश्वसुखार्थं पुरुषार्थं कुर्य्याम, सोऽस्मिन्व्यवहारेऽस्माकं सहायं करोत्विति प्रार्थ्यते॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, whose omnipotence and protection is infinite and imperishable, may, we pray, bless us with this thousand-fold knowledge and power of science in which are contained all the secrets of nature’s vitality.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Subject: What may God do for us is taught in this ninth Mantra.

अन्वय:

May the Lord Whose knowledge is infinite and endless, endow us with the knowledge of the science of all objects which gives happiness of thousands of kinds and in which all powers are contained, so that we may enjoy all true happiness and delight.

पदार्थान्वयभाषाः - पौंस्यानि बलानि पौंस्यानीतिबलनाम (निघ० २.९) = Powers.
भावार्थभाषाः - May we know the Lord Who giv power to all to work and having attained strength, may we exert ourselves for bringing about the welfare of and happiness to all.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted वाजम् as पदार्थविज्ञानम् The word is derived from वज-गतौ गतेस्त्रयोऽर्था ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च so here the meaning of ज्ञान knowledge has been taken. Sayanacharya has taken it here for सोमरूपमन्नम् सनेत् संभजेत् Wilson has followed him translating "May Indra enjoy these manifold sacrificial viands" This translation is wrong as it ascribes body to God Who according to the express statement of the Veda अकायम् अव्रणम्, अस्नाविरम् etc. (Yaj. 40.8 ) परिभू: ( Rig. 1.4 ) etc. is formless and All-pervading.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्याच्या सत्तेमुळे जगातील पदार्थ बलवान होऊन आपल्या व्यवहारात स्थित आहेत, त्या सर्व बल इत्यादी गुणांचा उपयोग करून घेऊन विश्वातील नाना प्रकारचे सुख भोगण्यासाठी आम्ही पूर्ण पुरुषार्थ करावा व ईश्वराने या प्रयोजनासाठी आम्हाला साह्य करावे. त्यासाठी आम्ही अशी प्रार्थना करतो. ॥ ९ ॥