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त्वां स्तोमा॑ अवीवृध॒न्त्वामु॒क्था श॑तक्रतो। त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ stomā avīvṛdhan tvām ukthā śatakrato | tvāṁ vardhantu no giraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम्। स्तोमाः॑। अ॒वी॒वृ॒ध॒न्। त्वाम्। उ॒क्था। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। त्वाम्। व॒र्ध॒न्तु॒। नः॒। गिरः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:5» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:2» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

ईश्वर ने उक्त अर्थ ही के प्रकाश करनेवाले इन्द्र शब्द का अगले मन्त्र में भी प्रकाश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शतक्रतो) असंख्यात कर्मों के करने और अनन्त विज्ञान के जाननेवाले परमेश्वर ! जैसे (स्तोमाः) वेद के स्तोत्र तथा (उक्था) प्रशंसनीय स्तोत्र आपको (अवीवृधन्) अत्यन्त प्रसिद्ध करते हैं, वैसे ही (नः) हमारी (गिरः) विद्या और सत्यभाषणयुक्त वाणी भी (त्वाम्) आपको (वर्धन्तु) प्रकाशित करे॥८॥
भावार्थभाषाः - जो विश्व में पृथिवी सूर्य्य आदि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रचे हुए पदार्थ हैं, वे सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले तथा धन्यवाद देने के योग्य परमेश्वर ही को प्रसिद्ध करके जनाते हैं, जिससे न्याय और उपकार आदि ईश्वर के गुणों को अच्छी प्रकार जानके विद्वान् भी वैसे ही कर्मों में प्रवृत्त हों॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तोम - उक्थ - गीः 

पदार्थान्वयभाषाः - १. गत तीन मन्त्रों में सोम - पान व शरीर में सोम की रक्षा के लाभों का वर्णन हुआ है । उस सोम - रक्षा के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात वासना को जीतना है । वासना को जीतने के लिए आवश्यक है कि हमारा सारा समय प्रभु - स्तवन के साथ कार्यों में व्याप्त हो । सो 'मधुच्छन्दाः' [मन्त्र का ऋषि] कहता है कि हे (शतक्रतो) - अनन्त कर्मों व प्रज्ञानोंवाले प्रभो ! (त्वाम्) - आपको (स्तोमाः) हम साम - गों के स्तुति - समूह (अवीवृधन्) - बढ़ानेवाले हों । हृदय में भक्ति का निवास है  , भक्ति - प्रधान पुरुष प्रभु का स्तवन करता है तो ये स्तुतियाँ 'स्तोम' कहलाती हैं । यह भक्त साम - मन्त्रों से प्रभु के गुणों का कीर्तन करता है ।  २. मस्तिष्क में ज्ञान का निवास है । ज्ञानप्रधान पुरुष सूर्य  , चन्द्र  , तारागण व ब्रह्माण्ड के सब पदार्थों में प्रभु की महिमा देखता है । उस - उस पदार्थ की रचना का सौन्दर्य रचयिता की महत्ता को प्रकट करता है और यह ज्ञानी कह उठता है कि ये हिमाच्छादित पर्वत  , समुद्र व पृथिवी सभी आपकी महिमा को कह रहे हैं । इस ज्ञानी के (उक्थाः) - ये स्तुतिवचन भी  , आपकी महिमा के प्रतिपादक वाक्य भी  , हे प्रभो ! (त्वाम्) - आपको बढ़ानेवाले हों ।  ३. हाथों में कर्म का निवास है । यज्ञादि कर्मों में व्याप्त हाथोंवाले कर्मकाण्डी भी अग्नि व अग्नि में डाले गये पदार्थों की महत्ता व विचित्रता का ध्यान करते हुए प्रभु की महिमा का ही उद्गिरण [उच्चारण] करते हैं । (नः) - हम कर्मकाण्डियों की (गिरः) - वे महिमोच्चारण करनेवाली वाणियाँ भी हे प्रभो ! (त्वां वर्धन्तु) - आपको ही बढ़ानेवाली हों ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - भक्तों के स्तोम  , ज्ञानियों के उक्थ [व शस्त्र] तथा कर्मकाण्डियों की गिराएँ - सभी प्रभु की महिमा का वर्धन करें । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

एतदर्थमिन्द्रशब्दार्थ उपदिश्यते।

अन्वय:

हे शतक्रतो बहुकर्मवन् बहुप्रज्ञेश्वर ! यथा स्तोमास्त्वामवीवृधन् अत्यन्तं वर्धयन्ति, यथा च त्वमुक्थानि स्तुतिसाधकानि वर्धितानि कृतवान्, तथैव नो गिरस्त्वां वर्धन्तु सर्वथा प्रकाशयन्तु॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वाम्) इन्द्रं परमेश्वरम् (स्तोमाः) वेदस्तुतिसमूहाः (अवीवृधन्) वर्धयन्ति। अत्र लडर्थे लुङ्। (त्वाम्) स्तोतव्यम् (उक्था) परिभाषितुमर्हाणि वेदस्थानि सर्वाणि स्तोत्राणि। पातॄतुदिवचि०। (उणा०२.७) अनेन वचधातोस्थक्प्रत्ययस्तेनोक्थस्य सिद्धिः। शेश्छन्दसि बहुलमिति शेर्लुक्। (शतक्रतो) उक्तोऽस्यार्थः (त्वाम्) सर्वज्येष्ठम् (वर्धन्तु) वर्धयन्तु। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (नः) अस्माकम् (गिरः) विद्यासत्यभाषणादियुक्ता वाण्यः। गीरिति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं०१.११)॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। यथा ये विश्वस्मिन्पृथिवीसूर्य्यादयः सृष्टाः पदार्थाः सन्ति ते सर्वे सर्वकर्त्तारं परमेश्वरं ज्ञापयित्वा तमेव प्रकाशयन्ति, तथैतानुपकारानीश्वरगुणाँश्च सम्यग् विदित्वा विद्वांसोऽपीदृश एव कर्मणि प्रवर्त्तेरन्निति॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, supreme lord of omnipotence and majesty, the Stoma hymns of the Veda celebrate your glory. Lord infinite of countless acts of creation, the Uktha hymns sing of your power and action. So may all our songs of devotion and homage light up your presence and grandeur all round.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O God, endowed with infinite knowledge and Power of action, as these Vedic Chants of praise and hymns magnify Thee and Thou increasest our power, so may our speeches full of wisdom and truth, reveal or manifest Thee to all persons.

पदार्थान्वयभाषाः - (स्तोमा:) वेदस्तुतिसमूहाः = The Vedic Chants. (उक्था) परिभाषितुमर्हाणि वेदस्थानि सर्वाणि स्तोत्राणि पातृतुदिवचि उणा० सू० २.७ अनेन वच-परिभाषणे इतिधातोस्थक् प्रत्ययः तेनोक्थशब्दसिद्धिः (गिरः ) विद्यासत्यभाषणादियुक्ता वाण्यः = The words or speeches full of wisdom and truth etc.
भावार्थभाषाः - As the earth, the sun and other objects in the world created by God, point out the glory of the Omnipotent Lord and manifest Him, so the learned people after knowing these gifts of God and His attributes thoroughly should engage themselves in this work of revealing or manifesting the Lord's glory to all, through their sermons and noble deeds.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विश्वात जे पृथ्वी, सूर्य इत्यादी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष पदार्थ निर्माण केलेले आहेत, ते सर्व जगाची उत्पत्ती करणाऱ्या व धन्यवाद देण्यायोग्य परमेश्वराचीच प्रसिद्धी करतात व त्याची जाणीव करून देतात. न्याय व उपकार इत्यादी ईश्वराच्या गुणांना चांगल्या प्रकारे जाणून विद्वानांनीही तशाच कर्मात प्रवृत्त व्हावे ॥ ८ ॥