वांछित मन्त्र चुनें

मा नो॒ मर्ता॑ अ॒भिद्रु॑हन्त॒नूना॑मिन्द्र गिर्वणः। ईशा॑नो यवया व॒धम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mā no martā abhi druhan tanūnām indra girvaṇaḥ | īśāno yavayā vadham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा। नः॒। मर्ताः॑। अ॒भि। द्रु॒ह॒न्। त॒नूना॑म्। इ॒न्द्र॒। गि॒र्व॒णः॒। ईशा॑नः। य॒व॒य॒। व॒धम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:5» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:10» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:2» मन्त्र:10


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

किसकी रक्षा से पुरुषार्थ सिद्ध होता है, इस विषय का प्रकाश ईश्वर ने अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (गिर्वणः) वेद वा उत्तम-उत्तम शिक्षाओं से सिद्ध की हुई वाणियों करके सेवा करने योग्य सर्वशक्तिमान् (इन्द्र) सब के रक्षक (ईशानः) परमेश्वर ! आप (नः) हमारे (तनूनाम्) शरीरों के (वधम्) नाश (मा) कभी मत (यवय) कीजिये, तथा आपके उपदेश से (मर्त्ताः) ये सब मनुष्य लोग भी (नः) हम से (मा) (अभिद्रुहन्) वैर कभी न करें॥१०॥
भावार्थभाषाः - कोई मनुष्य अन्याय से किसी प्राणी को मारने की इच्छा न करे, किन्तु परस्पर मित्रभाव से वर्त्तें, क्योंकि जैसे परमेश्वर विना अपराध से किसी का तिरस्कार नहीं करता, वैसे ही सब मनुष्यों को भी करना चाहिये॥१०॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अनभिद्रोह 

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) - जितेन्द्रिय पुरुष ! गतमन्त्र के अनुसार तू सात्विक अन्नों के प्रयोग से सोम का रक्षण करनेवाला बनकर प्रयत्न कर कि (मर्ताः) - विषयों के पीछे मरनेवाले मनुष्य (नः) - हमारे (तनूनाम्) - इन शरीरों के (मा अभिद्रुहन्) - हनन करने की इच्छा न करें [द्रुह् - जिघांसा]  , मनुष्य विषयों के प्रति लालायित होता है और ये भोगविलास उसके शरीर को रोगों का घर बनाकर नष्ट कर देते हैं । सो हम मर्त न बनें  , विषयों के पीछे न मरें  , इनकी आपातरमणीयता (Brightness only in appearance) को समझकर इनमें न फंसें और इनसे ऊपर उठें ।  २. हे (गिर्वणः) - ज्ञान की वाणियों का सेवन करनेवाले जीव ! तू (ईशानः) - इन्द्रियों का मालिक  , न कि दास बनता हुआ (वधम् यवया) - वध को अपने से दूर कर । वध को  , विषयों का शिकार बन जाने को  , दूर करने का उपाय एक ही है कि - हम 'ईशान' बनें  , जितेन्द्रिय बनें । जितेन्द्रियता के लिए हम सदा 'गिर्वणः' ज्ञान की वाणियों का सेवन करनेवाले हों । इनसे हमें विषयों की तुच्छता का आभास मिलेगा । हम विषयों के पीछे न मरेंगे और प्रभु से दिये गये इन शरीरों की सम्यक्तया रक्षा कर पाएंगे । ये शरीर 'देव - मन्दिर' हैं  , 'ऋषियों के आश्रम' हैं । इन्हें पवित्र व सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है ।     
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम स्वाध्यायशील व जितेन्द्रिय [गिर्वणः - ईशानः] बनकर विषयों से ऊपर उठें और प्रभु से दिये गये इन शरीरों को असमय में ही नष्ट न होने दें । 
टिप्पणी: विशेष - इस सूक्त का प्रारम्भ मिलकर प्रभु का गायन करने के निर्देश से होता है [१]  , वे प्रभु ही पालकों के पालक हैं [३]  , प्रभु के हृदयस्थ होने पर कामादि शत्रु हमारी इन्द्रियों को आक्रान्त नहीं कर सकते [४]  , इस प्रकार प्रभु - स्तवन सोम के रक्षण में सहायक होता है । सोम - रक्षण करनेवाले को सात्त्विक अन्न को ही सेवन करना है [२]  , और ईशान - इन्द्रियों का स्वामी बनकर उसे शरीरों को असमय में नष्ट नहीं होने देना [१०] । इन सुरक्षित शरीरों को [शरीर  , मन व बुद्धि को] हम किन कार्यों में लगाएँ ? इस जिज्ञासा का उत्तर अगले सूक्त में देते हैं -
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

कस्य रक्षणेन पुरुषार्थः सिद्धो भवतीत्युपदिश्यते।

अन्वय:

हे गिर्वणः सर्वशक्तिमन्निन्द्र परमेश्वर ! ईशानस्त्वं नोऽस्माकं तनूनां वधं मा यवय। इमे मर्त्ताः सर्वे प्राणिनोऽस्मान् मा अभिद्रुहन् मा जिघांसन्तु॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मा) निषेधार्थे (नः) अस्माकमस्मान्वा (मर्त्ताः) मरणधर्माणो मनुष्याः। मर्त्ता इति मनुष्यनामसु पठितम्। (निघं०२.३) (अभिद्रुहन्) अभिद्रुह्यन्त्वभिजिघांसन्तु। अत्र व्यत्ययेन शो लोडर्थे लुङ् च। (तनूनाम्) शरीराणां विस्तृतानां पदार्थानां वा (इन्द्र) सर्वरक्षकेश्वर ! (गिर्वणः) वेदशिक्षाभ्यां संस्कृताभिर्गीर्भिर्वन्यते सम्यक् सेव्यते यस्तत्सम्बुद्धौ (ईशानः) योऽसावीष्टे (यवय) मिश्रय। प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्चेति यवशब्दाद्धात्वर्थे णिच्। अन्येषामपि दृश्यते। (अष्टा०६.३.१३७) इति दीर्घः। (वधम्) हननम्॥१०॥
भावार्थभाषाः - नैव कोऽपि मनुष्योऽन्यायेन कंचिदपि प्राणिनं हिंसितुमिच्छेत्, किन्तु सर्वैः सह मित्रतामाचरेत्। यथेश्वरः कंचिदपि नाभिद्रुह्यति, तथैव सर्वैर्मनुष्यैरनुष्ठातव्यमिति॥१०॥अनेन पञ्चमेन सूक्तेन मनुष्यैः कथं पुरुषार्थः कर्त्तव्यः सर्वोपकारश्चेति चतुर्थेन सूक्तेन सह सङ्गतिरस्तीति विज्ञेयम्। इदमपि सूक्तं सायणाचार्य्यादिभिर्विलसनाख्यादिभिश्चान्यथार्थं वर्णितम्॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord adorable in sacred song, let no mortal hate or injure our body and mind from anywhere. Keep off hate, violence and murder far away from us. You are the ruler, ordainer and dispenser of justice and punishment.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कोणत्याही माणसाने अन्यायाने एखाद्या प्राण्याला मारण्याची इच्छा धरू नये, तर मित्रभावाने वागावे. कारण परमेश्वर अपराध न करता कुणाचाही तिरस्कार करीत नाही, तसेच माणसानेही वागावे. ॥ १० ॥
टिप्पणी: या सूक्ताचाही अर्थ सायणाचार्य इत्यादी व डॉक्टर विल्सन इत्यादी साहेबांनी विपरीत केलेला आहे.