पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) - जितेन्द्रिय पुरुष ! गतमन्त्र के अनुसार तू सात्विक अन्नों के प्रयोग से सोम का रक्षण करनेवाला बनकर प्रयत्न कर कि (मर्ताः) - विषयों के पीछे मरनेवाले मनुष्य (नः) - हमारे (तनूनाम्) - इन शरीरों के (मा अभिद्रुहन्) - हनन करने की इच्छा न करें [द्रुह् - जिघांसा] , मनुष्य विषयों के प्रति लालायित होता है और ये भोगविलास उसके शरीर को रोगों का घर बनाकर नष्ट कर देते हैं । सो हम मर्त न बनें , विषयों के पीछे न मरें , इनकी आपातरमणीयता (Brightness only in appearance) को समझकर इनमें न फंसें और इनसे ऊपर उठें ।
२. हे (गिर्वणः) - ज्ञान की वाणियों का सेवन करनेवाले जीव ! तू (ईशानः) - इन्द्रियों का मालिक , न कि दास बनता हुआ (वधम् यवया) - वध को अपने से दूर कर । वध को , विषयों का शिकार बन जाने को , दूर करने का उपाय एक ही है कि - हम 'ईशान' बनें , जितेन्द्रिय बनें । जितेन्द्रियता के लिए हम सदा 'गिर्वणः' ज्ञान की वाणियों का सेवन करनेवाले हों । इनसे हमें विषयों की तुच्छता का आभास मिलेगा । हम विषयों के पीछे न मरेंगे और प्रभु से दिये गये इन शरीरों की सम्यक्तया रक्षा कर पाएंगे । ये शरीर 'देव - मन्दिर' हैं , 'ऋषियों के आश्रम' हैं । इन्हें पवित्र व सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम स्वाध्यायशील व जितेन्द्रिय [गिर्वणः - ईशानः] बनकर विषयों से ऊपर उठें और प्रभु से दिये गये इन शरीरों को असमय में ही नष्ट न होने दें ।