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व्यु॒च्छन्ती॒ हि र॒श्मिभि॒र्विश्व॑मा॒भासि॑ रोच॒नम् । तां त्वामु॑षर्वसू॒यवो॑ गी॒र्भिः कण्वा॑ अहूषत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vyucchantī hi raśmibhir viśvam ābhāsi rocanam | tāṁ tvām uṣar vasūyavo gīrbhiḥ kaṇvā ahūṣata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व्यि॒उच्छन्ती॑ । हि । र॒श्मिभिः॑ । विश्व॑म् । आ॒भासि॑ । रो॒च॒नम् । ताम् । त्वाम् । उ॒षः॒ । व॒सु॒यवः॑ । गीः॒भिः । कण्वाः॑ । अ॒हू॒ष॒त॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:49» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी और क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वसुयवः) जो पृथिवी आदि वसुओं को संयुक्त और वियुक्त करनेवाले (कण्वाः) बुद्धिमान् लोग ! जैसे (उषः) उषा (व्युच्छन्ती) विविध प्रकार से वसानेवाली (हि) निश्चय करके (रश्मिभिः) किरणों से (रोचनम्) रुचिकारक (विश्वम्) सब संसार को (आभासि) अच्छे प्रकार प्रकाशित करती है वैसी (ताम्) उस (त्वाम्) तुझ स्त्री को (गीर्भिः) वेदशिक्षायुक्त अपनी वाणियों से (अहूषत) प्रशंसित करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों को चाहिये कि उषा के गुणों के तुल्य स्त्री उत्तम होती है इस बात को जानें और सबको उपदेश करें ॥४॥ इसमें उषा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह उनचासवां सूक्त ४९ और छठा वर्ग ६ समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसूयवः कण्वाः

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (उषः) = उषः काल ! तू (हि) = निश्चय से (रश्मिभिः) = प्रकाश की किरणों से (व्युच्छन्ती) = अन्धकार को दूर करती हुई (विश्वम्) = सम्पूर्ण संसार को (रोचनम्) = खूब दीप्ति के साथ (आभासि) = प्रकाशित करती है । २. हे उषे ! (तां त्वा) = उस तुझको (वसूयवः) = उत्तम निवासक तत्त्वों की कामनावाले (कण्वाः) = मेधावी पुरुष (गीर्भिः) = वाणियों से (अहूषत) = पुकारते हैं, अर्थात् मेधावी पुरुष प्रातः काल जागकर स्वाध्याय के लिए तैयारी करते हैं और ज्ञान की वाणियों का अध्ययन करते हुए अपने निवास को उत्तम बनाते हैं । इस निवास के उत्तम होने पर जीवन में उसी प्रकार प्रकाश का अनुभव होता है जैसेकि उषा अपने प्रकाश से जगत् को प्रकाशित करती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम उषः काल में स्वाध्याय के द्वारा अपने अन्दर उसी प्रकार प्रकाश प्राप्त करें जैसे उषा बाह्य जगत् को प्रकाश प्राप्त कराती है ।
टिप्पणी: विशेष - सूक्त का आरम्भ इस प्रकार हुआ है कि उषा हमें भद्रताओं को प्राप्त कराये [१] । हमारा शरीररूप रथ स्वास्थ्य के सौन्दर्यवाला और प्रशस्तेन्द्रियोंवाला हो [२] | यह उषा हमें गतिमय जीवन की प्रेरणा दे [३] । यह हमारे अन्तर्जगत् को भी उसी प्रकार प्रकाशित करे जैसेकि बाह्य जगत् को [४] । अब उषा के पश्चात् सूर्योदय होता है -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(व्युच्छन्ति) विविधतया वासयन्ति (हि) खलु (रश्मिभिः) किरणैः (विश्वम्) सर्वं जगत् (आभासि) समन्तात् प्रकाशयति। अत्र व्यत्ययः (रोचनम्) देदीप्यमानं रुचिकरम् (ताम्) (त्वाम्) एताम् (उषः) उषाः (वसुयवः) ये वसून् पृथिव्यादीन् युवन्ति मिश्रयन्त्यमिश्रयन्ति ते विद्वांसः (गीर्भिः) वेदशिक्षासहिताभिः (कण्वाः) मेधाविनः (अहूषत) स्पर्द्धन्ताम् ॥४॥

अन्वय:

पुनः सा कीदृशी किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वसुयवः कण्वा ! यूयं यथोषरुषा व्युच्छन्ती हि खलुरश्मिभीरोचनं विश्वमाभास्याभाति तथाभूतां त्वां स्त्रियं गीर्भिरहूषत ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वद्भिरुषर्गुणवद्वर्त्तमाना स्त्री श्रेष्ठाऽस्तीति बोद्धव्यं सर्वेभ्य उपदेष्टव्यं च ॥४॥ इत्येकोनपंचाशं सूक्तं षष्ठो वर्गश्च समाप्तः ॥४९॥ अत्रोषर्गुणवत्स्त्रीगुणवर्णनादेतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Illuminating and revealing this world of beauty with the rays of light, you shine in glory and divine majesty. Lady of light, daughter of heaven, O Dawn, saints and sages of vision and wisdom devoted to life of the earth and her children celebrate you in songs of adoration and dedication.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should she (Usha) be is further taught in the fourth Mantra.

अन्वय:

4. O intelligent persons making proper use of the earth and other spheres or desirous of wealth you should praise with your Vedic words a woman who is like the Dawn dispersing the darkness and illumining the shining universe with her rays.

पदार्थान्वयभाषाः - ( वसूयवः) ये वसून् पृथिव्यादीन् युवन्ति मिश्रयन्ति ते विद्वांसः = Those learned persons like scientists who mix and separate the earth and other substances or make proper use of them. (कण्वा:) मेधाविनः कण्व इति मेधाविनामसु (निघ० ३.१५)
भावार्थभाषाः - The learned persons should know and teach others that a woman behaving like the Dawn dispelling the darkness (of ignorance) is admirable.
टिप्पणी: As in this hymn, the attributes of a noble woman have been described by the illustration of the Dawn, it is connected with the previous hymn. Here ends the commentary on the forty-ninth hymn of the Ist Mandala of the Rigveda.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वानांनी उषेच्या गुणाप्रमाणे स्त्री उत्तम असते ही गोष्ट जाणावी व सर्वांना उपदेश करावा. ॥ ४ ॥