वांछित मन्त्र चुनें

वय॑श्चित्ते पत॒त्रिणो॑ द्वि॒पच्चतु॑ष्पदर्जुनि । उषः॒ प्रार॑न्नृ॒तूँरनु॑ दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaś cit te patatriṇo dvipac catuṣpad arjuni | uṣaḥ prārann ṛtūm̐r anu divo antebhyas pari ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वयः॑ । चि॒त् । ते॒ । प॒त॒त्रिणः॑ । द्वि॒पत् । चतुः॑पत् । अ॒र्जु॒नि॒ । उषः॑ । प्र । आ॒र॒न् ऋ॒तून् । अनु॑ । दि॒वः । अन्ते॑भ्यः । परि॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:49» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि ! जैसे (अर्जुनि) अच्छे प्रकार प्रयत्न का निमित्त (उषः) उषा (दिवः) सूर्य्यप्रकाश के (अन्तेभ्यः) समीप से (ऋतून्) ऋतुओं को सिद्ध और (द्विपत्) मनुष्यादि तथा (चतुष्पत्) पशु आदि का बोध कराती हुई सबको प्राप्त होके जैसे इससे (पतत्त्रिणः) नीचे ऊचे उड़नेवाले (वयः) पक्षी (प्रारन्) इधर उधर जाते (चित्) वैसे ही (ते) तेरे गुण हों ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालंकार है जैसे उषा मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, मास, ऋतु, अयन अर्थात् दक्षिणायन और वर्षो का विभाग करती हुई सब प्राणियों के व्यवहार और चेतनता को करती है वैसे ही स्त्री सब गृहकृत्यों को पृथक्-२ करें ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अर्जुनी उषा

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अर्जुनि उषः) = शुभ प्रकाशवाली उषे ! (ते ऋतून् अनु) = तेरी नियमित गतियों के अनुसार, अर्थात् यथासमय तेरे उदित होने पर (दिवः अन्तेभ्यः परि) = आकाश के सुदूर प्रान्तों से (पतत्रिणः वयः) = पंखोंवाले ये पक्षी (चित्) = भी और (द्विपत्) = दो पाँवोंवाले मनुष्य तथा (चतुष्पत्) = चार पाँवोंवाले गौ आदि पशु (प्रारन्) = प्रकृष्ट गतिवाले होते हैं । २. उषा का प्रकाश होते ही मनुष्य, पशु, पक्षी सभी गतिवाले हो जाते हैं । उषा सबको जागने व कर्म में लगने की प्रेरणा देती है । उषा अर्जुनी - शुभ्र प्रकाशवाली है । उसका अनुसरण करनेवाला व्यक्ति भी इसी प्रकार शुभ्रप्रकाश का अर्जन करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषा के होते ही हमें गतिमय जीवनवाला होने का प्रयत्न करना चाहिए ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(वयः) पक्षिणः (चित्) इव (ते) तव (पतत्रिणः) पतनशीलाः। अत्र पतेरत्रिन्। उ० ४।८०। #अनेनायं सिद्धः (द्विपत्) द्वौपादौ यस्य मनुष्यादेः सः (चतुष्पत्) चत्वारः पादा यस्य पश्वादेः सः। अत्रोभयत्र वाच्छन्दसि इति पदादेशः। (अर्जुनि) अर्जयन्ति प्रतियतन्ते ययोषसा सा। अत्र अर्जप्रतियत्ने धातोः रक्* प्रत्ययो णिलुक् च। ¤उ० ३।५७। अनेनायं सिद्धः। अर्जुनीत्युषर्ना० निघं० १।८। (उषः) उषर्वत्पुरुषार्थनिमित्ते (प्र) (आरन्) प्रापयति (ऋतून्) वसन्तादीन् (अनु) पश्चात् (दिवः) प्रकाशस्य (अन्तेभ्यः) समीपेभ्योऽहोरात्रेभ्यः (परि) सर्वतः ॥३॥ #[उ० ४।६९।] *[उनन् प्र०। सं०।] ¤[अर्जे र्णिलुक् च उ० ३।५८। सं०।]

अन्वय:

पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि ! यथार्जुनि दिवोंऽतेभ्य ऋतून् संपादयन्ती द्विपचतुष्पच्च बोधयन्ती सत्पुषाः सर्वान् प्राप्नोती यथाऽस्याः पतत्रिणो वयः प्रारँश्चित्ते गुणा भवन्तु ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालंकारः। यथोषा मुहूर्त्तप्रहरदिनमासर्त्वयनसंवत्सरान् विभजन्ती सर्वेषां प्राणिनां व्यवहारचेतने विभजति तथा स्त्री सर्वाणि गृहकृत्यानि विभजेत् ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Blessed Dawn, fiery messenger of light and life, may humans and animals as the birds of flight, we pray, rise and reach unto the bounds of heaven in pursuance of the time and seasons of your arrival.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is she (Usha) is taught further in the third Mantra.

अन्वय:

3. As after appearance of the mobile, bright and activating dawn, the bipeds, quadrupeds and birds all start moving to and from, in the same manner, O noble woman, thou shouldst also be active and charming like that, on account of thy virtues. (Thou shouldst be able to stir all into activity by thy noble example.

पदार्थान्वयभाषाः - (अर्जुनि) अर्जयन्ति प्रतियतन्ते यया उषा सा अत्र अर्जप्रयतने इति धातोः रक् प्रत्ययो णिलुक् च (उणादि ३.५७) अनेनायं सिद्धः । अर्जुनीत्युषर्नामसु ( निघ० १.८) = Dawn.
भावार्थभाषाः - As the Dawn divides the year into the moments, hours, days, months, seasons etc. in the same manner, a wife should divide her domestic duties regularly.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जशी उषा, मुहूर्त, प्रवर, दिवस, महिना, ऋतू, अयन अर्थात् दक्षिणायन व वर्ष यांचा विभाग करून सर्व प्राण्यांचे व्यवहार व चेतना प्राप्त करवून देते. तसेच स्त्रीने सर्व गृहकृत्यांना पृथक पृथक करावे. ॥ ३ ॥