वांछित मन्त्र चुनें

विश्व॑मस्या नानाम॒ चक्ष॑से॒ जग॒ज्ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑ । अप॒ द्वेषो॑ म॒घोनी॑ दुहि॒ता दि॒व उ॒षा उ॑च्छ॒दप॒ स्रिधः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvam asyā nānāma cakṣase jagaj jyotiṣ kṛṇoti sūnarī | apa dveṣo maghonī duhitā diva uṣā ucchad apa sridhaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्व॑म् । अ॒स्याः॒ । न॒ना॒म॒ । चक्ष॑से । जग॑त् । ज्योतिः॑ । कृ॒णो॒ति॒ । सू॒नरी॑ । अप॑ । द्वेषः॑ । म॒घोनी॑ । दि॒वः । उ॒षाः । उ॒च्छ॒त् । अप॑ । स्रिधः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:48» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:4» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:8


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी हो, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्री जनो ! तुम जैसे (मघोनी) प्रशंसनीय धन का निमित्त (सूनरी) अच्छे प्रकार प्राप्त करानेवाली (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहिता) पुत्री के सदृश (उषाः) प्रकाशने वाली प्रभात की वेला (विश्वम्) सब जगत् को (नानाम) आदर करता है, और उसको (चक्षसे) देखने के लिये (ज्योतिः) प्रकाश को (कृणोति) करती है और (स्रिधः) हिंसक (द्वेषः) बुरा द्वेष करनेवाले शत्रुओं को (अपोच्छत्) दूर वास कराती है वैसे पति आदि में वर्त्तो ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सती स्त्री विघ्नों को दूरकर कर्त्तव्य कर्मो को सिद्ध करती है, वैसे ही उषा डाकू, चोर, शत्रु आदि को दूर कर कार्य्य की सिद्धि कराने वाली होती है ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मघोनी

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अस्याः) = इस उषा के (चक्षसे) = प्रकाश के लिए (विश्वं जगत्) = सम्पूर्ण संसार (नानाम) = प्रभु को प्रति नतमस्तक होता है । "वस्तुतः रात्रि के अन्धकार को समाप्त करके किस प्रकार उषः काल प्रकाश को देता हुआ और न केवल प्रकाश को अपितु प्राणशक्ति को भी बढ़ाता हुआ आता है" - यह सब विचार करनेवाला पुरुष उस प्रभु के प्रति नतमस्तक होता है । प्रभु की विभूतियों में उषा का भी एक विशिष्ट स्थान है । उषा की लालिमा प्रभु की महिमा का गायन करती प्रतीत होती है । २. (सूनरी) = संसार के कार्यों का उत्तम प्रणयन करनेवाली उषा (ज्योतिः कृणोति) = चारों ओर प्रकाश कर देती है । यह उषा उषाबाह्य प्रकाश के साथ हृदय के अन्तस्तल को भी प्रकाशित करती है और इस प्रकार हमें उत्तम मार्ग से ले - चलनेवाली होती है । ३. (मघोनी) = प्रकाशरूप मघ - ऐश्वर्यवाली यह उषा (द्वेषः) = द्वेष की भावनाओं को हमारे हृदय से (अप उच्छत्) = दूर करनेवाली हो । द्वेष अज्ञानान्धकार में ही पनपता है । उषा अन्धकार को दूर करती हुई द्वेष को भी दूर करती है । ४. यह (दिवः दुहिता) = प्रकाश का पूरण करनेवाली (उषाः) = उषा (स्रिधः) = [स्त्रिधु शोषणे] हृदय की शोषक कामवासना को भी (अप उच्छत्) = हमारे हृदयों से दूर करे । वस्तुतः उषः काल में प्रभु के प्रति नतमस्तक होता हुआ व्यक्ति इन वासनाओं को विनष्ट ही कर डालता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषः काल प्रकाश को करता हुआ द्वेष व रागात्मक वासना को हमसे दूर कर दे । राग - द्वेष से ऊपर उठकर हम जीवन को सुन्दरता से बितानेवाले हों ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(विश्वम्) सर्वम् (अस्याः) उषसः (नानाम) नमति। अत्र तुजादित्वाद् अभ्यासदीर्घत्वम्। (चक्षसे) द्रष्टुम् (जगत्) संसारम् (ज्योतिः) प्रकाशम् (कृणोति) करोति (सूनरी) सुष्ठ नेत्री (अप) दूरीकरणे (द्वेषः) द्विषन्ति ये शत्रवस्ते। अत्र अन्येभ्योऽपि दृश्यन्त इति विच्। (मघोनि) प्रशस्तानि मघानि पूज्यानि धनानि यस्याः सन्ति सा (दुहिता) पुत्रीव (दिवः) प्रकाशमानस्य सवितुः (उषाः) प्रभातः (उच्छत्) विवासयति (अप) अपराधे (स्रिधः) हिंसकान् ॥८॥

अन्वय:

पुनस्सा कीदृशीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रियो ! यूयं यथा मघोनी सूनरी दिवो दुहितेवोषा विश्वं जगन्नानामतस्याश्चक्षसे ज्योतिः कृणोति स्रिधोऽपद्वेषोऽपोच्छद्दूरतो विवासयति तथापत्यादिषु वर्त्तध्वम् ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः यथा सत्स्त्री विघ्नान्निवार्य्य क्रियमाणानि कार्य्याणि साध्नोति तथैवोषा दस्युचोरशत्र्वादीन्निवार्य्य कार्यसाधिका भवतीति ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The whole world bows in homage to this dawn. Noble guide and leader, it brings the light of the world for all so that they may see the glory of the universe. Daughter of light Divine, Queen of wealth and splendour, it lights up and life drives out the darkness of jealousy and throws off the violence of enmity.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that Usha is taught further in the 8th Mantra.

अन्वय:

O women, you should behave towards your husbands and others as the Dawn who is the daughter of the sky, good leader of the day, to meet whose glance all living creatures bend down, who lights up or illuminates the world, bringer of good, who drives away the malevolent and wild beasts, thieves and robbers and at whose appearance all bow to God in reverence.

भावार्थभाषाः - As a good woman accomplishes all good works casting aside all obstacles, in the same way, the Dawn drives away with her light robbers, thieves and enemies and helps to accomplish noble acts.
टिप्पणी: Unlike most of the translators or commentators of the Rigveda, Rishi Dayananda has taken the word Ushas (उषा:) for a noble wife also, for which there is the following clear authority from the Brahmana, besides the Vedic hints like योषेव सुनरी ( ऋ० १.४८.५ ) which even Sayanacharya explains as " सुष्ठु गृहकृत्यस्य नेत्री गृहिणी इव " (सायणाचार्य:) and which Prof. Wilson following him translates as “like a Matron, the directress of household duties (Wilson). In the Shatpath Brahmana 6.1.3.7 we find भूतानां गृहपतिः आसीत् उषा: पत्नी | Here by Usha is meant wife. So Rishi Dayananda's interpretation is well-authenticated.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचक लुप्तोपमालंकार आहे. जसे सत् स्त्री विघ्नांना दूर करून कर्तव्य कर्म सिद्ध करते तसेच उषा डाकू, चोर, शत्रू इत्यादींना दूर करून कार्याची सिद्धी करविणारी असते. ॥ ८ ॥