वांछित मन्त्र चुनें

विश्व॑स्य॒ हि प्राण॑नं॒ जीव॑नं॒ त्वे वि यदु॒च्छसि॑ सूनरि । सा नो॒ रथे॑न बृह॒ता वि॑भावरि श्रु॒धि चि॑त्रामघे॒ हव॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvasya hi prāṇanaṁ jīvanaṁ tve vi yad ucchasi sūnari | sā no rathena bṛhatā vibhāvari śrudhi citrāmaghe havam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्व॑स्य । हि । प्राण॑नम् । जीव॑नम् । त्वे इति॑ । वि । यत् । उ॒च्छसि॑ । सू॒न॒रि॒ । सा । नः॒ । रथे॑न । बृ॒ह॒ता । वि॒भा॒व॒रि॒ । श्रु॒धि । चि॒त्र॒म॒घे॒ । हव॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:48» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:10


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी होकर किससे क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सूनरि) अच्छे प्रकार व्यवहारों को प्राप्त (विभावरि) विविध प्रकाशयुक्त (चित्रामघे) चित्र विचित्र धन से सुशोभित स्त्री जैसे उषा (बृहता) बड़े (रथेन) रमणीय स्वरूप वा विमानादि यान से विद्यमान जिस में (विश्वस्य) सब प्राणियों के (प्राणनम्) प्राण और (जीवनम्) जीविका की प्राप्ति का संभव होता है वैसे ही (त्वे) तेरे में होता है (यत्) जो तू (नः) हम लोगों को (व्युच्छसि) विविध प्रकार वास करती है वह तू हमारा (हवम्) सुनने सुनाने योग्य वाक्यों को (श्रुधि) सुन ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे उषा से सब प्राणिजात को सुख होता है वैसे ही पतिव्रता स्त्री से प्रसन्न पुरुष को सब आनन्द होते हैं ॥१०॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणनं जीवनम्

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (सूनरि) = उत्तमता से कार्यों का प्रणयन करानेवाली तथा प्रातः जागरणशील पुरुषों को उन्नति - पथ पर ले - चलनेवाली उषे ! (यत्) = जब तू (व्युच्छसि) = विशेषरूप से उदित होती है और अन्धकार को नष्ट करती है तब (विश्वस्य) = सम्पूर्ण संसार का (प्राणनम्) = प्रकृष्टरूपेण प्राणों का धारण करना तथा (जीवनम्) = उत्तम जीवन को प्राप्त करना (हि) = निश्चय से (त्वे) = तुझमें ही आश्रित होता है, अर्थात् यह उषा सबको जीवन व प्राणशक्ति प्राप्त कराती है । उषा के समय सोये हुए का तेज क्षीण हो जाता है । २. (सा विभावरि) = हे उषे ! वह प्रकाशवाली तू (चित्रामघे) = अद्भूत ऐश्वर्यवाली ! (बृहता रथेन) = सब प्रकार की शक्तियों के वर्धनवाले शरीररूप रथ से (नः) = हमें प्राप्त हो और (हवम्) = हमारी प्रार्थनावाणी को (श्रुधि) = सुन । उषा की कृपा से हमें बाह्यप्रकाश की भाँति अन्तः प्रकाश भी प्राप्त हो । यह उषा 'जीवन व प्राणन' के रूप में अद्भुत ऐश्वर्य प्राप्त कराये । प्रातः काल उठकर अपने आवश्यक कृत्यों को करते हुए हम शरीररूप रथ को प्रवृद्ध शक्तियोंवाला बनाएँ [बृहता रथेन] । स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान का ऐश्वर्य प्राप्त करें [चित्रामधे] । प्रातः की इस पुण्यवेला में प्रभु की प्रार्थना में प्रवृत्त हों [हवं श्रुधि] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषा हमें प्राणशक्ति - सम्पन्न दीर्घ जीवन प्राप्त कराती है । यह हमारे शरीररूप रथ को दृढ़ व सुन्दर बनाती है ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(विश्वस्य) सर्वस्य (हि) खलु (प्राणनम्) प्राणधारणम् (जीवनम्) जीविकाप्रापणम् (त्वे) त्वयि। अत्र सुपांसुलुग् इति शे आदेशः। (वि) विविधार्थे (यत्) या (उच्छसि) (सूनरि) सुष्ठुतया व्यवहारनेत्री (सा) (नः) अस्मभ्यम् (रथेन) रमणीयेन स्वरूपेण विमानादिना वा (बृहता) महता (विभावरि) या विविधतया भाति प्रकाशयति तत्सम्बुद्धौ (श्रुधि) श्रृणु (चित्रामघे) चित्राण्यद्भुतानि मघानि धनानि यस्यास्तत्संबुद्धौ। अत्रान्येषामपि० इति पूर्वपदस्य दीर्घः। (हवम्) श्रोतव्यं श्रावयितव्यं वा शब्दसमूहम् ॥१०॥

अन्वय:

पुनः सा कीदृशेन किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सूनरि विभावरि चित्रामघे स्त्रि ! यथोषा बृहता महता रथेन रमणीयेन स्वरूपेण वर्त्तते यस्यां विश्वस्य प्राणिजातस्य हि प्राणनं जीवनं सम्भवति तथा त्वे त्वय्यप्यस्तु यद्या त्वं न उच्छसि साऽस्माकं हवं श्रुधि ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथोषसा सर्वस्य प्राणिजातस्य सुखानि जायन्ते तथा सत्या स्त्रिया प्रसीदन्तं सर्व आनन्दाः प्राप्नुवन्ति ॥१०॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Dawn, leading light of humanity, when you shine in splendour, you hold the breath and life of the world in you. The same, lady of light, harbinger of wondrous wealth and good fortune, come by your magnificent chariot and listen to our prayer.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should she (Usha) do is taught in the tenth Mantra.

अन्वय:

O noble woman, good leader of domestic dealings, shining in various ways on account of your virtues, possessor of wondrous wealth, as the dawn comes in beautiful form in her lofty car (so to speak) and in each living creature's breath and life, O lady of light, you should also be like her, giving new life to all. You who make us happy, listen to our words of wisdom that must be heard and taught.

पदार्थान्वयभाषाः - ( हवम् ) श्रोतव्यं श्रावयितव्यं वा शब्दसमूहम् = The group of words that are to be heard and taught. (सूनरी) सुष्ठुतया व्यवहारनेत्री = Good leader of domestic dealings. (रथेन) रमणीयेन स्वरूपेण विमानादिना वा = With beautiful form or aero plane etc.
भावार्थभाषाः - As all living creatures are pleased with and get happiness by the dawn, in the same manner, those husbands who are pleased and contented with their noble wives, enjoy all -happiness and bliss.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचक लुप्तोपमालंकार आहे. जसे उषेमुळे सर्व प्राणिमात्र सुखी होतात त्याप्रमाणे पतिव्रता स्त्रीमुळे पुरुष प्रसन्न व आनंदित होतो. ॥ १० ॥