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यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अधि॑ तु॒र्वशे॑ । अतो॒ रथे॑न सु॒वृता॑ न॒ आ ग॑तं सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yan nāsatyā parāvati yad vā stho adhi turvaśe | ato rathena suvṛtā na ā gataṁ sākaṁ sūryasya raśmibhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ना॒स॒त्या॒ । प॒रा॒वति॑ । यत् । वा॒ । स्थः । अधि॑ । तु॒र्वशे॑ । अतः॑ । रथे॑न । सु॒वृता॑ । नः॒ । आ । ग॒त॒म् । सा॒कम् । सूर्य॑स्य । र॒श्मिभिः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:47» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (नासत्या) सत्य गुण कर्म स्वभाव वाले सभा सेना के ईश ! आप (यत्) जिस (सुवृता) उत्तम अङ्गों से परिपूर्ण (रथेन) विमान आदि यान से (यत्) जिस कारण (परावति) दूर देश में गमन करने तथा (तुर्वशे) वेद और शिल्पविद्या के जानने वाले विद्वान् जन के (अधिष्ठः) ऊपर स्थित होते हैं (अतः) इससे (सूर्य्यस्य) सूर्य के (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ (नः) हम लोगों को (आगतम्) सब प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजसभा के पति जिस सवारी से अन्तरिक्ष मार्ग करके देश देशान्तर जाने को समर्थ होवें उसको प्रयत्न से बनावें ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्योदय के साथ प्राणसाधना

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (नासत्या) = जिनके कारण पाप नहीं रहता, ऐसे प्राणापानो ! (यत्) = यदि (परावति) = दूर देश में (स्थः) = हो, (यत् वा) = या (तुर्वशे) = [अन्तिकनाम - नि० २/१६] समीपता में (अधिस्थः) = आधिक्येन हो, अति समीप हो, अर्थात् आप चाहे दूर हों चाहे पास (अतः) = उस स्थान से (सुवृता) = शोभन वर्तनवाले, अर्थात् प्रत्येक सुन्दर कर्म के अधिष्ठानभूत (रथेन) = इस शरीररूप रथ से (नः) = हमें (सूर्यस्य रश्मिभिः साकम् ) = सूर्योदय के साथ ही (आगतम्) = प्राप्त होओ । २. यहाँ यह स्पष्ट है कि सूर्योदय के साथ ही प्राणसाधना करना आवश्यक है; वह प्राणायाम के लिए सर्वोत्तम समय है । ३. 'प्राणों का दूर व अधिक - से - अधिक समीप होना' - इस बात का सकेंत कर रहा है कि 'रेचक' प्राणायाम में हम प्राणों को दूर - से - दूर फेंकते हैं और 'पूरक' में उसे अधिक - से - अधिक समीप प्राप्त कराते हैं । ४. इस प्राणायाम का मुख्य लाभ शरीररूप रथ का शोभन वर्तन, अर्थात् उत्तमता से युक्त होना है । प्राणसाधना अङ्ग - प्रत्यङ्ग को सशक्त व सुडौल बनाती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्योदय के साथ ही प्राणसाधना करते हुए हम शरीररूप रथ को सुन्दर बनानेवाले हों ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यत्) यं रथम् (नासत्या) सत्यगुणकर्मस्वभावौ सभासेनेशौ (परावति) दूरं दूरं देशं प्रति गमने कर्त्तव्ये (यत्) यत्र (वा) पक्षान्तरे (स्थः) (अधि) उपरिभावे (तुर्वशे) वेद शिल्पादिविद्यावति मनुष्ये। तुर्वश इति मनुष्यना०। निघं० २।३। (अतः) कारणात् (रथेन) विमानादियानेन (सुवृता) शोभना वृतोऽङ्गपूर्त्तिर्य्यस्य तेन (नः) अस्मान् (आ) अभितः (गतम्) गच्छतम् (साकम्) सह (सूर्यस्य) सवितृमंडलस्य (रश्मिभिः) किरणैः ॥७॥

अन्वय:

पुनरेतौ किं कुरुतामित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे नासत्यावश्विना ! युवां यत्सुवृता रथेन यद्यतः परावति देशे तुर्वशेऽधिष्ठस्तेनातः सूर्य्यस्य रश्मिभिः साकं नोऽस्मानागतम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजसभेशादयो येन यानेनान्तरिक्षमार्गेण देशान्तरं गन्तुम् शक्नुयुस्तद्यानं प्रयत्नेन रचयेयुः ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, friends of truth and humanity, whether you live and operate far off in a distant place or you rule close by over noble people of dedication, all the same come by the beautiful flying chariot alongwith the rays of the sun.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O Ashvins (President of the Assembly and the Commander of the Army) who are truthful in mind, word and deed, whether you abide far off or close at hand, come to us in your well-constructed vehicle like the aero plane etc. with the rays of the sun, approach a person who is endowed with Vehicle and technical knowledge.

पदार्थान्वयभाषाः - (तुर्वंशे) वेद शिल्पविद्यावति मनुष्ये तुर्वश इति मनुष्यनाम ( निघ० २.३ ) = In a learned person.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the President of the Council of Ministers and the Commander of the Army to make arrangements for the construction of such vehicles as may travel in the firmament and take to distant countries.
टिप्पणी: Deva Raja Yajva in his commentary on the Nirukta, explains Turvasha (तुर्वशा ) in various ways, the following of which is specially worth-mentioning. चतुर्षु धर्मार्थकाममोक्षेषु वश एषाम् इति चतुर्वशाः सन्तः चकारलोपेन तुर्वशा: तुर्वशेष्वगन्महिं ( ऋ० ५.७. ३३.४) इति निगम: वश-कान्तौ Desirous of four objects of human life i. e. Dharma (righteousness) Artha ( achievement of wealth) Kama (fulfilment of noble desires) and Moksha ( emancipation). ( २ ) तुर्वशे इति अन्तिक नाम ( निघ० २.१६) = Near or close at hand.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजसभेच्या पतीने ज्या वाहनाद्वारे अंतरिक्ष मार्गातून देशदेशांतरी जाण्यास समर्थ बनता येईल, असे प्रयत्नपूर्वक बनवावे. ॥ ७ ॥