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त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॑ सु॒पेश॑सा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना । कण्वा॑सो वां॒ ब्रह्म॑ कृण्वन्त्यध्व॒रे तेषां॒ सु शृ॑णुतं॒ हव॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

trivandhureṇa trivṛtā supeśasā rathenā yātam aśvinā | kaṇvāso vām brahma kṛṇvanty adhvare teṣāṁ su śṛṇutaṁ havam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ । त्रि॒वृता॑ । सु॒पेश॑सा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । कण्वा॑सः । वा॒म् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्व॒न्ति॒ । अ॒ध्व॒रे । तेषा॑म् । सु । शृ॒णु॒त॒म् । हव॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:47» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:1» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

उससे सिद्ध किये हुए यान से क्या करना चाहिये इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) पावक और जल के तुल्य सभा और सेना के ईश ! तुम लोग जैसे (कण्वासः) बुद्धिमान् लोग (अध्वरे) अग्निहोत्रादि वा शिल्पक्रिया से सिद्ध यज्ञ में जिस (त्रिबन्धुरेण) तीन बन्धनयुक्त (त्रिवृता) तीन शिल्पक्रिया के प्रकारों से पूरित (सुपेशसा) उत्तम रूप वा सोने से जटित (रथेन) विमान आदि यान से देश देशान्तरों में शीघ्र जा आके (ब्रह्म) अन्नादि पदार्थों को (कृण्वन्ति) करते हैं वैसे उससे देश देशान्तर और द्वीपद्वीपान्तरों को (आयातम्) जाओ आओ (तेषाम्) उन बुद्धिमानों का (हवम्) ग्रहण करने योग्य विद्याओं के उपदेश को (शृणुतम्) सुनो और अन्नादि समृद्धि को बढ़ाया करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सङ्ग से पदार्थ विज्ञानपूर्वक यज्ञ और शिल्पविद्या की हस्तक्रिया को साक्षात् करके व्यवहाररूपी कार्यों को सिद्ध करें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिवन्धुर रथ

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (त्रिवन्धुरेण) = इन्द्रियों, मन व बुद्धि - 'घोड़े, लगाम व सारथि' ये तीनों जिसमें बड़े सुन्दर हैं, (त्रिवृता) = धर्म, अर्थ और काम - तीनों में समरूप से प्रवृत्त होनेवाले (सुपेशसा) = स्वास्थ्य व व्यायाम के कारण सुन्दर रूपवाले (रथेन) = इस शरीररूप रथ से (आयातम्) = आप हमें प्राप्त होओ । प्राणसाधना से ही वस्तुतः 'इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' तीनों बड़े सुन्दर बनते हैं, मानसवृत्ति धर्मपूर्वक ही धन कमाने व उचित आनन्दों को ही प्राप्त करने की बनी रहती है तथा नीरोगता व स्वास्थ्य से इस शरीर - रथ का सौन्दर्य बना रहता है । २. (कण्वासः) = मेधावी लोग (वाम्) = आप दोनों के ब्रह्म - स्तोत्रों को (कृण्वन्ति) = करते हैं । प्राणापान की महिमा का गायन करते हुए वे इनकी साधना में प्रवृत्त होते हैं । ३. हे प्राणापानो ! आप (अध्वरे) = इस जीवनयज्ञ के निमित्त (तेषाम्) = उन उपासकों व साधकों की (हवम्) = पुकार को (सुश्रृणुतम्) = उत्तमता से सुनिए, अर्थात् आप उनके जीवनों को यज्ञमय बनाने में सहायक होओ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से यह शरीर - रथ 'त्रिवन्धुर, त्रिवृत् व सुपेश' बनता है । प्राणसाधना जीवन को यज्ञमय बनाती है, अर्थात् यह साधक इस शरीर के लिए कोई क्रूर कर्म नहीं करता ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्रिबंधुरेण) त्रीणि बन्धुराणि बंधनानि यस्मिंस्तेन (त्रिवृता) त्रिभिः शिल्पक्रियाप्रकारैः प्रपूरितस्तेन (सुपेशसा) शोभनं पेशो रूपं हिरण्यं वा यस्मिन् तेन। पेश इतिरूपना०। निघं० ३।७। हिरण्यना० च निघं० १।२। (रथेन) विमानादिना (आ) अभितः (यातम्) गच्छतम् (अश्विना) अग्निजले इव वर्त्तमानौ (कण्वासः) मेधाविनः (वाम्) एतयोः सकाशात् (ब्रह्म) अन्नम्। ब्रह्मेत्यन्नना० निघं० २।७। (कृण्वन्ति) कुर्वन्ति (अध्वरे) संगते शिल्पक्रियासिद्धे याने (तेषाम्) मेधाविनाम् (सु) शोभनार्थे (शृणुतम्) (हवम्) ग्राह्यं विद्याशब्दसमूहम् ॥२॥

अन्वय:

ताभ्यां साधितेन #किं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते। #[यानेन। सं०]

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना वर्त्तमानौ सभासेनेशौ ! युवां यथा कण्वासोऽध्वरे येन त्रिबंधुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेन देशदेशाऽन्तरं शीघ्रं गत्वाऽऽगत्य ब्रह्म कृण्वन्ति तथा तेनायातम्। तेषां हवं सुशृणुतमन्नादिसमृद्धि च वर्द्धयतम् ॥२॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्यैर्विदुषां सकाशात् पदार्थविज्ञानपुरःसरां यज्ञशिल्पहस्तक्रियां साक्षात्कृत्वा व्यवहारकृत्यानि निष्पादनीयानि ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, brilliant scholars of science and technology, come by three-stage, three armoured, beautifully structured chariot. The geniuses study and advance universal knowledge for you in scientific yajna. Listen to their prayers, accept their holy call.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should be done with what has been accomplished by them (Ashvins) is taught in the 2nd Mantra.

अन्वय:

2. Come O Ashvins (President of the Assembly and the Commander of the Army) who are like the fire and the water, with your three-columned, triangular chariot like aero plane etc. beautiful of form and full of gold and other metals, as highly intelligent persons do with their charming chariots manufactured with the help of technology, going from country to country and coming back and producing food materials. Listen to their words of wisdom and increase growth of food and other kinds of prosperity.

पदार्थान्वयभाषाः - ( रथेन) विमानादिना = Vehicle in the form of aero plane etc. ( अश्विना ) अग्निजले इव वर्तमानौ = Like the fire and the water. ( कण्वासः) मेधाविनः = Wise or highly intelligent men. ( हवम् ) ग्राह्य विद्याशब्दसमूहम् = Words of wisdom that are to be received or accepted.
भावार्थभाषाः - Men should visualize the practical activities along with the theoretical scientific knowledge and then should accomplish all dealings.
टिप्पणी: अश्विनौ इति पदनामसु ( निघ० ५.६) पद-गतौ गतेस्त्रयोऽर्थाः ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च । = So here the 3rd meaning of if has been taken. व्यावहारिकसुखस्य प्रापकौ । = A means of worldly happiness or prosperity, fire and water combination in the form of steam engines etc. leads to comfort or सुर्यपवनौ The sun and air which lead to happiness when properly utilized. (कण्वास:) मेधाविन: ( निघ० ३.१५) (ब्रह्म) अन्नम् = Food ब्रह्मति अन्ननामसु ( निघ० २.७)
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - येथे वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी विद्वानांच्या संगतीने पदार्थ विज्ञानाद्वारे यज्ञ व शिल्पविद्येद्वारे हस्तक्रिया प्रत्यक्ष करून व्यवहाररूपी कार्य सिद्ध करावे. ॥ २ ॥