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आ नो॑ ना॒वा म॑ती॒नां या॒तं पा॒राय॒ गन्त॑वे । यु॒ञ्जाथा॑मश्विना॒ रथ॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no nāvā matīnāṁ yātam pārāya gantave | yuñjāthām aśvinā ratham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । ना॒वा । म॒ती॒नाम् । या॒तम् । पा॒राय॑ । गन्त॑वे । यु॒ञ्जाथा॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । रथ॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:34» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) व्यवहार करनेवाले कारीगरो ! आप (मतीनाम्) मनुष्यों की (नावा) नौका से (पाराय) पार (गन्तवे) जाने के लिये (नः) हमारे लिये (रथम्) विमान आदि यान समूहों को (युंजाथाम्) युक्त कर चलाइये ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि रथ से स्थल अर्थात् सूखे में नाव से जल में विमान से आकाश में जाया आया करें ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नाव या रथ

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! आप हमारी बुद्धियों को सूक्ष्म तो बनाते ही हो, आप (मतीनां नावा) - इन बुद्धियों की नौका के साथ (नः) - हमें (आयातम्) - प्राप्त होओ । आपकी कृपा से बुद्धि हमारे लिए नौका के रूप में हो जोकि (पाराय गन्तवे) - इस भवसागर से पार जाने के लिए हमारा साधन बने । संसार समुद्र है तो प्रभु ने यह बुद्धि हमें नाव के रूप में दी है । प्राणसाधना से यह नाव ठीक - ठाक बनी रहेगी, तो हम भवसागर से अवश्य ही पार उतर पाएँगे ।  २. हे प्राणापानो ! (रथं युञ्जाथाम्) - शरीररूप रथ को इन्द्रियाश्वों से युक्त करो । प्राणसाधना से इस शरीररूप रथ में उत्तम इन्द्रियरूप अश्वों का संयोजन होता है और हम इस जीवनयात्रा को पूर्ण कर पाते हैं । जीवनयात्रा की पूर्णता के लिए क्रियाशीलता आवश्यक है और प्राणसाधना के बिना शक्ति व क्रियाशीलता सम्भव नहीं होती । एवं ये अश्विनौ इस शरीर को भवार्णव के तैरने के लिए नौका का रूप देते हैं तो इस संसार - कान्तार को पार करने के लिए रथ का ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमारा यह शरीर एक सुन्दर नाव के समान हो जो हमें भवसागर से पार उतारनेवाली हो तथा यह शरीर वह रथ हो जो हमारी जीवन - यात्रा की पूर्ति में सहायक हो ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आ) समन्तात् (नः) अस्मान् (नावा) नौकादिना (मतीनाम्) मनुष्याणाम् (यातम्) प्राप्नुतम् (पाराय) परतटम् (गन्तवे) गन्तुम्। अत्र# गत्यर्थकर्मणि० इति *द्वितीयार्थे चतुर्थी। (युंजाथाम्) (अश्विना) व्यवहारव्यापिनौ। अत्र सुपांसुलुग् इत्याकारादेशः। (रथम्) रमणीयं विमानादिकं यानसमूहम् ॥७॥ #[अ० २।३।१२।] *[कर्मणीत्यर्थः। सं०]

अन्वय:

पुनस्तौ किं कुर्य्यातामित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना ! युवां मतीनां नावा पाराय गन्तवे नोऽस्मानायातं रथं च युञ्जाथाम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यै रथेन स्थले नौकया समुद्रे विमानेनाऽकाशे गमनाऽगमने कार्य्ये ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of light, knowledge and power, design and prepare and bring us the chariot for the people to cross over land and sea and sky and reach their destination.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What else should they ( Ashvinau ) do is taught in the seventh Mantra.

अन्वय:

O expert learned artisans, come by a ship prepared by wise men to take us across the ocean. Harness your chariot to go everywhere.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अश्विना ) व्यवहारव्यापिनौ । अत्र सुपांसुलुक् (अष्टा० ) इत्याकारादेशः अशूङ्-व्याप्तौ = Well-versed in worldly dealings, expert artisans. ( रथम् ) रमणीयं विमानादिकं यानसमूहम् = Beautiful vehicles like aero plane etc.
भावार्थभाषाः - Men should come and go by a Chariot on land, by a boat or ship to the river or sea and by aero plane on the sky.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी रथाने जमिनीवर, नौकेने समुद्रातून व विमानाने आकाशातून गमनागमन करावे. ॥ ७ ॥