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या नः॒ पीप॑रदश्विना॒ ज्योति॑ष्मती॒ तम॑स्ति॒रः । ताम॒स्मे रा॑साथा॒मिष॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yā naḥ pīparad aśvinā jyotiṣmatī tamas tiraḥ | tām asme rāsāthām iṣam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । नः॒ । पीप॑रत् । अ॒श्वि॒ना॒ । ज्योति॑ष्मती । तमः॑ । ति॒रः । ताम् । अ॒स्मे इति॑ । रा॒सा॒था॒म् । इष॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:34» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर सूर्य्य चन्द्रमा के समान सभा सेनापति क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) सभासेनाध्यक्षो ! जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा की (ज्योतिष्मती) उत्तम प्रकाश युक्त कान्ति (तमः) रात्रि का निवारण करके प्रभात और शुक्लपक्ष से सबका पोषण करते हैं वैसे (अस्मे) हमारी अविद्या को छुड़ा विद्या का प्रकाश कर (नः) हम सबको (ताम्) उस (इषम्) अन्न आदि को (रसाथाम्) दिया करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जिस प्रकार सूर्य्य और चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर प्राणियों को सुखी करते हैं वैसे ही सभा और सेना के अध्यक्षों को चाहिये कि अन्याय दूर कर प्रजा को सुखी करें ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुशंस, मधुजिह्व, स्वाहुत

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! आप (गृणते) - स्तुति करनेवाले के लिए (सशंसः) - उत्तम शंसन व उपदेश करनेवाले (बोधि) - जाने जाते हो । स्तोता के लिए आप उत्तम ज्ञान देते हैं ।  २. (यविष्ठ्य) - गुणों को प्राप्त कराने तथा अवगुणों को दूर करने में सर्वोत्तम प्रभो ! आप अपने स्तोता के लिए (मधुजिह्वः) - माधुर्यमय जिह्वावाले, अर्थात् अत्यन्त मधुर शब्दोंवाले तथा (स्वाहुतः) - [सु आहुतः] उत्तमोत्तम हव्य पदार्थों को देनेवाले हो ।  ३. आप (प्रस्कण्वस्य) - इस मेधावी पुरुष की (आयुः) - आयु को (प्रतिरन्) - बढ़ाते हुए (जीवसे) - उत्तम जीवन के लिए (दैव्यं जनम्) - दैव्य लोगों को, अर्थात् प्रभुप्रवण पुरुषों को (नमस्या) - [परिचरणकर्मा नमस्यति] पूजित कराइए । आपकी कृपा से यह अध्यात्मवृत्तिवाले लोगों के सम्पर्क में आये और उनकी सेवा - शुश्रूषा [परिचरण] करता हुआ उनके उपदेशों से जीवन - निर्माण की प्रेरणा लेता हुआ जीवन को उन्नत बनाए । उत्तम जीवन यही है कि मनुष्य [क] प्रभु के उत्तम उपदेशों को सुने, [ख] माधुर्यमयी जिह्वावाला हो, [ग] उत्तम सात्त्विक पदार्थों का ही सेवन करे, [घ] दैव्य लोगों के सम्पर्क में आकर जीवन को उत्तम बनाते हुए दीर्घ जीवनवाला हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उत्तम जीवन का परिचय प्रस्तुत मन्त्र में 'सुशंसः, मधुजिह्वः, स्वाहुतः ' - इन शब्दों में दिया गया है । इस जीवन के निर्माण को लिए यत्नशील होना चाहिए तथा दीर्घजीवन प्राप्त करना चाहिए ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(या) यौ वक्ष्यमाणौ (नः) अस्मभ्यम् (पीपरत्) सुखैः पूरयेत्। अत्र लिङर्थे लुङडभावश्च। (अश्विना) सूर्य्याचन्द्रमसाविव सभासेनेशौ (ज्योतिष्मती) प्रशस्तानि ज्योतींषि विद्यन्ते यस्यां सा। अत्र सुपां सुलुग् इत्यमो लुक्। (तमः) रात्रिम्। तम इति रात्रिना० निघं० १।७। (तिरः) अन्तर्धाने (ताम्) (अस्मे) अस्माकम्। अत्र सुपाम् इति शे आदेशः। (रासाथाम्) दद्यातम् (इषम्) उत्तमगुणसंपादकमन्नाद्यौषध समूहम् ॥६॥

अन्वय:

पुनः सूर्य्यचन्द्रवदश्विनौ किंकुरुतइत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना सभासेनेशौ ! युवां यथा सूर्याचन्द्रमसोर्ज्योतिष्मती तमस्तिरस्कृत्योषसं रात्रिं च कृत्वा नः सर्वान् पीपरत्तयास्मे अविद्यां निवार्य तामिषं रासाथाम् ॥६॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकार है। यथा सूर्याचन्द्रमसावन्धकारं निवार्य्य प्राणिनः सुखयन्ति तथैव सभासेनेशावन्यायं निवर्त्त्य प्रजाः सुखयेताम् ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of light and inspiration, like the dawn give us that light of heaven which may help us cross over beyond the night and darkness of life and bring us total fulfilment.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What do Ashvinau (The President of the Assembly and the commander-in-chief of the Army) do like the sun and the moon is taught in the sixth mantra.

अन्वय:

O Ashvinau (the President of the Assembly and the Commander-in-chief of the army) As the light of sun and the moon dispels the darkness of the night and delights us all by creating the dawn or the white fortnight, so you should also dispel the darkness of ignorance from us and vouchsafe to us invigorating food and herbs full of strengthening good qualities.

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) सूर्याचन्द्रमसाविव सभासेनेशौ = The President of the Assembly and the Chief Commander of the Army who are like the sun and the moon. ( इषम् ) उत्तमगुणसम्पादकम् अन्नाद्यौषधसमूहम् = Invigorating food and strengthening herbs etc.
भावार्थभाषाः - As the sun and the moon dispel the darkness and thus make people happy, in the same manner, the President of the assembly and the Commander of the Army should cast aside all injustice and make people happy and contented.
टिप्पणी: The word Ashvinau has many meanings in the Vedas as stated in the Brahmanas and the Nirukta etc. इमे ह वै द्यावापृथिवी प्रत्यक्षमश्विनौ इमे हीदं सर्वम् अनुवाताम् (शतपथ० ४.१५.१६) अश्विनावध्वर्यू ( ऐतरेय १.१८ ) = Rishi Dayananda's interpretation as अध्यापकोपदेशकौ i. e. teachers and preachers is based upon this authority. अश्विनौ वै देवानां भिषजौ (ऐत० १.१८ ) = Physicians and surgeons. In the Nirukta (12.1) Yaskacharya has stated. तत्कौ अश्विनौ द्यावापृथिव्यावित्येके | अहोरात्रावित्येके | सूर्याचन्द्रमसावित्येके | (निरु० १२.१ )Here Rishi Dayananda has interpreted अश्विनौ as सभासेनेशौ on the analogy of सूर्याचन्द्रमसौ i e the sun and the moon. For the meaning of as or food see Kausheetaki Brahmana 28-5 अन्नं वा इपम् (कौषीतकी ब्रा० २८.५)
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - येथे वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्या प्रकारे सूर्य व चंद्र अंधकार दूर करून प्राण्यांना सुखी करतात तसेच सभा व सेनेच्या अध्यक्षांनी अन्याय दूर करून प्रजेला सुुखी करावे. ॥ ६ ॥