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आ॒दा॒रो वां॑ मती॒नां नास॑त्या मतवचसा । पा॒तं सोम॑स्य धृष्णु॒या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ādāro vām matīnāṁ nāsatyā matavacasā | pātaṁ somasya dhṛṣṇuyā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒दा॒रः । वा॒म् । म॒ती॒नाम् । नास॑त्या । म॒त॒व॒च॒सा॒ । पा॒तम् । सोम॑स्य । धृ॒ष्णु॒या॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:33» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (नासत्या) पवित्र गुण स्वभाव युक्त (मतवचसा) ज्ञान से बोलने वाले सभा सेना के पति ! तुम जो (वाम्) तुम्हारे (आदारः) सब प्रकार से शत्रुओं को विदारण कर्त्ता गुण हैं उस और (धृष्णुया) प्रगल्भता से (सोमस्य) ऐश्वर्य्य और (मतीनाम्) मनुष्यों की (पातम्) रक्षा करो ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषों को चाहिये कि दृढ़ बल युक्त सेना से शत्रुओं को जीत अपनी प्रजा के ऐश्वर्य्य की निरन्तर वृद्धि किया करें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नासत्या - मतवचसा

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (नासत्या) - [न असत्या] जिनकी साधना से जीवन में असत्य नहीं रहता, (मतवचसा) - मननीय वचनोंवाले, अर्थात् जिनकी साधना से प्रत्येक शब्द ज्ञानपूर्वक उच्चरित होता है, ऐसे प्राणापानो ! आप (धृष्णुया) - वासनारूप शत्रुओं के तथा रोगों के धर्षण के दृष्टिकोण से (सोमस्य पातम्) - सोम का रक्षण करो । उस सोम का, जोकि (वाम्) - आपकी (मतीनाम्) - बुद्धियों का (आदारः) - प्रेरक है [प्रेरक - सा०, दृ आदरे] ।  २. प्राणसाधना से मन की पवित्रता होकर मन में सत्य का ही निवास होता है, इससे ये प्राणापान 'नासत्या' हैं । इस साधना से हमारा ज्ञान निर्मल होता है और हमारे वचन ज्ञानपूर्वक ही बोले जाते हैं, अतः प्राणापान को मन्त्र में 'मतवचसा' कहा गया है ।  ३. प्राणसाधना से होनेवाले सब लाभ सोमरक्षण के द्वारा ही होते हैं । प्राणसाधना से सोमरक्षण होता है । यह सुरक्षित सोम रोग व वासनारूप शत्रुओं का घर्षण करता है और बुद्धियों को प्रेरित करता है । सोमरक्षण से बुद्धि तीव्र होकर सूक्ष्म - से - सूक्ष्म विषय को भी ग्रहण करने लगती है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से सोम का रक्षण होने पर हमारे [क] मनों में सत्य होगा, [ख] वाणी में ज्ञानपूर्ण वचन होंगे, तथा [ग] रोग व वासनाओं का धर्षण होकर बुद्धियाँ सूक्ष्म - से - सूक्ष्म विषयों का भी ग्रहण करनेवाली होंगी ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आदारः) समन्ताच्छत्रूणां दारणकर्त्ता गणः (वाम्) युवयोः (मतीनाम्) मनुष्याणाम् (नासत्या) सत्यगुणस्वभावौ। अत्र सुपांसुलुग् इत्याकारादेशः। (मतवचसा) मतानि वचांसि वेदवचनानि याभ्यां तौ (पातम्) प्राप्नुतम् (सोमस्य) ऐश्वर्य्यम्। अत्र कर्मणि# षष्ठी (धृष्णुया) धर्षणेन प्रगल्भत्वेन ॥५॥ #[अ० २।३।६५। इत्यनेन सूत्रेण। सं०]

अन्वय:

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे नासत्या मतवचसाऽश्विना सभासेनेशौ ! युवां यो वामादारोऽस्ति तेन धृष्णुया सोमस्य मतीनां पातम् ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषा दृढेन बलेन शत्रून् जित्वा स्वेषां प्रजानां चैश्वर्य्यं सततं वर्द्धयेयुः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of light and destroyers of enemy forces, dedicated to truth and holy speech, defend your people and protect their peace and prosperity with confidence and daring courage.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O leading men, the President of the Assembly and the Chief-commander of the Army, who are devoid of falsehood and absolutely truthful accepting the commands of the Vedas, protect with your cleverness and your followers who are destroyers of the enemies from all sides, the wealth of wise men.

पदार्थान्वयभाषाः - (आदार:) समन्तात् शत्रूणां दारणकर्ता गणः = The band of followers that is the destroyer of the enemies from all sides. ( दृ - विदारणे Tr.) (मतीनाम् ) मनुष्याणाम्-मेधाविनाम् मन ज्ञाने मतय इति मेधाविनाम ( निघ० ३.१५) = of wise men. ( सोमस्य ) ऐश्वर्यम् अत्र कर्मणि षष्ठी = Wealth. ( नासत्या ) सत्यगुणकर्मस्वभावौ । अत्र सुपां सुलुक् (अष्टा० ७.१.३ ) इत्याकारादेश:= Absolutely truthful. (मतवचसा) मतानि वचांसि वेदवचनानिद्रयाभ्यां तौ = Those who accept the words or teachings of the Vedas.
भावार्थभाषाः - The officers and workers of the State should conquer their enemies by their powerful might and multiply their own and the wealth of their subjects.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजपुरुषांनी दृढ बलयुक्त सेनेने शत्रूंना जिंकून आपल्या प्रजेच्या ऐश्वर्याची निरंतर वृद्धी करावी. ॥ ५ ॥