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व॒च्यन्ते॑ वां ककु॒हासो॑ जू॒र्णाया॒मधि॑ वि॒ष्टपि॑ । यद्वां॒ रथो॒ विभि॒ष्पता॑त् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vacyante vāṁ kakuhāso jūrṇāyām adhi viṣṭapi | yad vāṁ ratho vibhiṣ patāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व॒च्यन्ते॑ । वा॒म् । क॒कु॒हासः॑ । जू॒र्णाया॑म् । अधि॑ । वि॒ष्टपि॑ । यत् । वा॒म् । रथः॑ । विभिः॑ । पता॑त्॥

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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे कारीगरो ! जो (जूर्णायां) वृद्धावस्था में वर्त्तमान (ककुहासः) बड़े विद्वान् (वाम्) तुम शिल्पविद्या पढ़ने-पढ़ाने वालों को विद्याओं का (वच्यन्ते) उपदेश करें तो (वाम्) आप लोगों का बनाया हुआ (रथः) विमानादि सवारी (विभिः) पक्षियों के तुल्य (विष्टपि) अन्तरिक्ष में (अधि) ऊपर (पतात्) चलें ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य लोग बड़े ज्ञानी के समीप से कारीगरी और शिक्षा को ग्रहण करें तो विमानादि सवारियों को रच के पक्षी के तुल्य आकाश में जाने आने को समर्थ होवें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वर्ग में रथ का विचरण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यत्) - जब (वाम्) - हे अश्विदेवो ! आपका (रथः) - शरीररूपी रथ (विभिः) - इन्द्रियाश्वों से जुता हुआ (जूर्णायाम्) - अत्यन्त स्तुत (अधिविष्टपि) - स्वर्गलोक में (पतात्) - गति करता है तब (वाम्) - आपकी (ककुहासः) - स्तुतियाँ (वच्यन्ते) - उच्चरित होती हैं ।  २. गतमन्त्र में कहा था कि ये प्राणापान 'दर' हैं, आधि - व्याधियों को समाप्त करनेवाले हैं । मनोतरा - ज्ञान के द्वारा वासनाओं से तरानेवाले हैं, धनों के प्राप्त करानेवाले हैं [धिया रयीणां देवा] । एवं ये प्राणापान शरीर व मानस स्वास्थ्य प्राप्त कराके हमारे इस निवास को स्वर्ग - सा बना देते हैं । उस स्वर्ग में हमारा यह शरीररूप रथ इन्द्रियाश्वों से विचर रहा होता है । यह स्वर्ग - निवास स्तुत्य व प्रशंसनीय तो होता ही है [जूर्णायाम्] ।  ३. 'इस स्वर्ग में रहते हुए जीव को गर्व न हो जाए' इस दृष्टिकोण से कहते हैं कि हे प्राणापानो ! आपकी स्तुतियों उच्चरित होती हैं, अर्थात् आप निरन्तर प्रभु - स्तवन में प्रवृत्त होते हो ताकि यह हमें भूल न जाए कि यह सब - कुछ प्रभुकृपा का ही परिणाम है । प्रभुकृपा से ही हम इस पार्थिव निवास को स्वर्ग बना पाते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से शरीर में निवास स्वर्गापम बनता है, परन्तु उस स्वर्ग का हमें गर्व नहीं हो जाता ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(वच्यन्ते) उच्येरन्। संप्रसा#रणाच्च इत्यत्र वा*छंन्दसि इत्यनुवृत्तेः पूर्वरूपाभावाद्यणादेशः। (वाम्) युवां शिल्पविद्याध्यापकाध्येतारौ (ककुहासः) महान्तो विद्वांसः। ककुहइतिमहन्ना०। निघं० ३।३। (जूर्णायाम्) गन्तुमशक्यायां वृद्धावस्थायाम् (अधि) उपरिभावे (विष्टपि) अन्तरिक्षे (यत्) यः (वाम्) युवयोः (रथः) विमानादियानसमूहः (विभिः) यथा वयन्ति गच्छन्ति ये ते वयः पक्षिणस्तैः (पतात्) गच्छेत् ॥३॥ #[अ० ।६।१।१०७। सं०]*[अ० ६।१।१०५। सं०।]

अन्वय:

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे शिल्पिनौ ! यदि जूर्णायां वर्त्तमानाः ककुहासो वां विद्या वच्यन्ते तर्हि वां युवयोरथो विभिः सह विष्टप्यधिपतात् ॥३॥
भावार्थभाषाः - यदि मनुष्याः परमविदुषां सकाशाच्छिल्पविद्यां गृह्णीयुस्तर्हि विमानादियानानि रचयित्वा पक्षिवदाकाशे गन्तु शक्नुयुः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of light, knowledge and wealth across the Vasus, scientists and technologists, veterans of vision and wisdom celebrate your achievement when your chariot flies like a bird into the ancient sky over the heavens.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

Artisans, if aged and experienced great scholars teach you various sciences, then your car in the form of aero plane etc. flies in the glorious heavens like the birds.

पदार्थान्वयभाषाः - [ ककुहास: ] महान्तो विद्वांसः ककुह इति महन्नाम ( निघ० ३ . ३ ) = Great scholars. (विष्टपि) अन्तरिक्षे = In the firmament or middle region. ( रथ:) विमानादियानसमूहः = Chariot in the form of aero planes etc. ( विभिः) वयन्ति गच्छन्ति ये ते वयः पक्षिणः । = Birds.
भावार्थभाषाः - If men get the knowledge of the arts and industries sitting at the feet of great scholars (or scientists) they are able to fly in the air like the birds by constructing aero planes and other suitable vehicles.
टिप्पणी: Though Wilson and Griffith have not been able to understand that the Mantra has clear reference to aero planes or flying in the sky, even their faulty translation refers to it. For instance, Prof. Wilson's translation is- "Since your chariot proceeds (drawn) by your steeds, above the glorious heavens, your praises are proclaimed by us. Griffith's translation is— "Your giant courses hasten on over the region all in flames, when your car flies with winged steeds.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे अत्यंत ज्ञानी (लोकांच्या) जवळ कारागिरी व शिक्षण ग्रहण करतील तर विमान वगैरे तयार करून ती पक्ष्याप्रमाणे आकाशात जाण्या-येण्यास समर्थ होतील. ॥ ३ ॥