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या द॒स्रा सिन्धु॑मातरा मनो॒तरा॑ रयी॒णाम् । धि॒या दे॒वा व॑सु॒विदा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yā dasrā sindhumātarā manotarā rayīṇām | dhiyā devā vasuvidā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । द॒स्रा । सिन्धु॑मातरा । म॒नो॒तरा॑ । र॒यी॒णाम् । धि॒या । दे॒वा । व॒सु॒विदा॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे अश्वि कैसे हैं इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्य लोगो ! तुम लोग (या) जो (दस्रा) दुःखों को नष्ट (सिंधुमातरा) समुद्र नदियों के प्रमाण कारक (मनोतरा) मन के समान पार करने हारे (धिया) कर्म से (रयीणाम्) धनों के (देवा) देने हारे (वसुविदा) बहुत धन को प्राप्त कराने वाले अग्नि और जल के तुल्य वर्त्तमान अध्यापक और उपदेशक हैं उनकी सेवा करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे कारीगर लोगों ने ठीक-२ युक्त किये हुए अग्नि और जल के यानों को मन के वेग के समान तुरन्त पहुँचाने वा बहुत धन को प्राप्त कराने वाले हैं उसी प्रकार अध्यापक और उपदेशकों को होना चाहिये ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दस्त्रा वसुविदा

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार मैं उषः कालों में जागकर उन प्राणापान का स्तवन करता हूँ (या) - जो (दस्रा) - सब रोग व वासनारूप दुःखों के नष्ट करनेवाले हैं । प्राणायाम के द्वारा रोग तो नष्ट होते ही हैं, वासनाओं का भी विनाश होता है, शरीर भी स्वस्थ होता है, मन भी ।  २. (सिन्धमातरा) - ये प्राणापान शरीर के सारे (नाड़ी) - संस्थान में रुधिर में व्याप्त होकर प्रवाहित होनेवाले [स्यन्दते] रेतः कणों का निर्माण करनेवाले हैं । प्राणसाधना से ही रेतः कणों की ऊर्ध्वगति होती है ।  ३. (मनोतरा) - [मनसा तारयितारौ] ज्ञान की वृद्धि से ये हमें वासनाओं से तरानेवाले हैं । ये हमें वासनाओं में फंसने से बचाते हैं ।  ४. (धिया) - ज्ञानपूर्वक कर्मों के द्वारा ये प्राणापान (रयीणाम्) - धनों के (देवा) - देनेवाले हैं [देवो दानात्] तथा (वसुविदा) - उत्तम निवासस्थानभूत शरीर को प्राप्त करानेवाले हैं । प्राणसाधना के द्वारा मनुष्य की क्रियाशक्ति व ज्ञानशक्ति बढ़ती है । इनसे जहाँ यह उत्तम धनों का संग्रह कर पाता है, वहाँ इस शरीर को नीरोग व सक्षम बनाकर अपने निवास को सुन्दर व स्पृहणीय बना लेता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से रोग नष्ट होते हैं, वासनाओं का विलय होता है । हमारा शरीर में निवास सुन्दर होता है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(या) यौ (दस्रा) दुःखोपक्षेतारौ (सिंधुमातरा) सिंधूनां समुद्राणां नदीनां वा मातरौ यद्वा सिंधवो मातरो ययोः (मनोतरा) अतिशयितं मनो ययोस्तौ (रयीणाम्) धनानाम् (धिया) कर्मणा (देवा) दिव्यगुणप्रापकौ (वसुविदा) बहुधनप्रदौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः ॥२॥

अन्वय:

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्या ! यूयं या दस्रा सिंधुमातरा मनोतरा धिया रयीणां देवा वसुविदावग्निजलवद्वर्त्तमानावध्यापकोपदेशकौ स्तस्तौ सेवध्वम् ॥२॥
भावार्थभाषाः - यथा शिल्पिभिर्यथावत्संप्रयोजिते अग्निजले यानानां मनोवेगवत्सद्यो गमयितृणी बहुधनप्रापके वर्त्तेते तथाऽध्यापकोपदेशकौ भवेतामिति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of the dawn, wonder workers are they. Bom of the oceans of space, they create the seas of morning mist. Faster than the mind, they bring wealths of the world. With intelligence and inspiration, they reveal the treasures of the Vasus, they are brilliant, generous, divine.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The lady teacher and the preacher like the sun and the moon.

अन्वय:

O men, you should always serve the teachers and the preachers who are like the fire and the water, who are destroyers of misery, whose mothers are the Oceans of virtues, who are full of abundant knowledge, leading to divine virtues, and givers of much wealth with their wisdom and noble acts.

पदार्थान्वयभाषाः - ( दस्रा) दु:खोपक्षेतारौ = Destroyers of misery. ( दसु-उपक्षये इति धातोः रक् ( उणा० २.१३ ) (सिन्धुमातरा) (गुण) सिन्धवो मातरो ययोः = Whose mothers are oceans of virtues -Tr.
भावार्थभाषाः - As the fire and the water when methodically used by expert artisans are conveyers of the Vehicles swiftly, like the mind and means of obtaining much wealth, so the teachers and the preachers should also be.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसे कारागीर योग्यरीत्या युक्त केलेल्या अग्नी व जलाच्या यानांना मनाच्या वेगाप्रमाणे ताबडतोब पोचविण्यासाठी व पुष्कळ धन प्राप्त करविण्यासाठी सुसज्ज करतात. त्याच प्रकारे अध्यापक व उपदेशकांनी बनले पाहिजे. ॥ २ ॥