वांछित मन्त्र चुनें

यु॒वोरु॒षा अनु॒ श्रियं॒ परि॑ज्मनोरु॒पाच॑रत् । ऋ॒ता व॑नथो अ॒क्तुभिः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvor uṣā anu śriyam parijmanor upācarat | ṛtā vanatho aktubhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यु॒वोः । उ॒षाः । अनु॑ । श्रिय॑म् । परि॑ज्मनोः । उ॒प॒आच॑रत् । ऋ॒ता । व॒न॒थः॒ । अ॒क्तुभिः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:14 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:35» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:14


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

इन दोनों से क्या प्राप्त करें इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋता) उचित् गुण सुन्दरस्वरूप ! सभासेनापति ! जैसे (उषाः) प्रभात समय (अक्त्तुभिः) रात्रियों के साथ (उपाचरत्) प्राप्त होता है वैसे जिन (परिज्मनोः) सर्वत्र गमन कर्त्ता पदार्थों को प्रकाश से फेंकने हारे सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश वर्त्तमान (युवोः) आपका न्याय और रक्षा हमको प्राप्त होवे आप (श्रियम्) उत्तम लक्ष्मी को (अनुवनथः) अनुकूलता से सेवन कीजिये ॥१४॥
भावार्थभाषाः - राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि परस्पर प्रीति से बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सदा सबके उपकार में यत्न किया करें ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्री - ऋत + अक्तु

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्राणापानो ! (परिज्मनोः युवोः) - शरीर में सर्वत्र गति करनेवाले आपके (अनु) - अनुपात में ही (उषाः) - उषः काल (श्रियम्) - शोभा को (उपाचरत्) - समीपता से प्राप्त होता है । उषः काल में जागरण स्वयं मनुष्य के लिए हितकर है, उसे स्वस्थ बनानेवाला एवं तेजस्विता प्राप्त करानेवाला है, परन्तु यह सब - कुछ होता तभी है जबकि मनुष्य प्राणसाधना करता है ।  २. हे प्राणापानो ! आप (अक्तुभिः) - ज्ञान की रश्मियों के साथ (ऋता) - सत्यों व यज्ञों का (वनथः) - सम्भजन - सेवन करते हो अथवा [वन् - win] विजय करते हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से शरीर 'श्री' सम्पन्न होता है, मन 'ऋत' सत्य से युक्त होता है और मस्तिष्क 'अक्तु' ज्ञान की रश्मियों से परिपूर्ण होता है ।   
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(युवोः) सभासेनेशयोः (उषाः) सूर्य्याचन्द्रमसोः प्रातःप्रकाशः (अनु) पश्चादर्थे (श्रियम्) विद्याराजलक्ष्मीम् (परिज्मनोः) यः परितः सर्वतोऽजतः प्रक्षिपतो गच्छतस्तयोः (उपाचरत्) उपचारिणीव वर्त्तते (ऋता) ऋतौ यथार्थसुगुणस्वरूपौ। अत्र सुपांसुलुग् इत्याकारादेशः। (वनथः) संभजेथाम् (अक्तुभिः) रात्रिभिः। अक्तुरिति रात्रिना०। निघं० १।७। ॥१४॥

अन्वय:

तयोः सकाशात्किंप्राप्नुयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ऋता सभासेनाधिपती ! यथोषा अक्तुभिरुपाचरत्तथा ययोः परिज्मनोर्युवोर्न्यायो रक्षणं चोपाचरत् तौ युवां श्रियमनुवनथः ॥१४॥
भावार्थभाषाः - राजप्रजाजना अन्योन्येषु प्रीतिं कृत्वा महदैश्वर्य्यं प्राप्य सदा सर्वोपकारे प्रयतंताम् ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, inspiring and protective powers of nature and humanity, ever on the move like the sun and moon, let the dawn of light and joy follow upon your beauty and glory. High-priests of truth and universal law, shine, illuminate and create the joy of life by nights and days.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should be got from them (Ashvinau) is taught in the fourteenth Mantra.

अन्वय:

O president of the Assembly and Chief Commander of the Army, you who are truthful, virtuous and circumambient (going everywhere on duty) when justice and protection follow you as the dawn follows the sun and the moon, you can enjoy all prosperity of knowledge and royal wealth.

पदार्थान्वयभाषाः - (उषा:) सूर्याचन्द्रमसोः प्रातः प्रकाशः = The morning light of the sun and the moon. ( श्रियम्) विद्याराजलक्ष्मीम् = Prosperity of knowledge and royal wealth.
भावार्थभाषाः - The ruler and the subjects should love one another intensely and thus having achieved much prosperity, should always endeavor to do good to all.
टिप्पणी: Here by अश्विनौ Rishi Dayananda has taken सभासेनाधिपती as अश्व: according to वीर्य बा अश्व: (शत० २.१.४ | २३.२४) means strength or सौ बा आदित्योऽश्व: ( तेत्तिरीय० ३.९.२३.२ ) and both of them are full of virility and are like the sun. ( परिज्मनोः) यौ परितः सर्वतः प्रजतो गच्छत स्तौ = Those who go everywhere for the discharge of their duties. अज-गतिक्षेपणयोः
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजा व प्रजा यांनी परस्पर प्रेमाने अत्यंत ऐश्वर्य प्राप्त करून सदैव सर्वांवर उपकार करण्याचा यत्न करावा. ॥ १४ ॥