ए॒षो उ॒षा अपू॑र्व्या॒ व्यु॑च्छति प्रि॒या दि॒वः । स्तु॒षे वा॑मश्विना बृ॒हत् ॥
eṣo uṣā apūrvyā vy ucchati priyā divaḥ | stuṣe vām aśvinā bṛhat ||
ए॒षो इति॑ । उ॒षाः । अपू॑र्व्या । वि । उ॒च्छ॒ति॒ । प्रि॒या । दि॒वः । स्तु॒षे । वा॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । बृ॒हत्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब छयालीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके पहिले मन्त्र में उषा और सूर्य चन्द्र के दृष्टान्त से विद्वान् स्त्रियों के गुणों का प्रकाश किया है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अश्विनौ का स्तवन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
(एषो) इयम् (उषाः) दाहनिमित्तशीला (अपूर्व्या) न पूर्वैः कृता। अत्र पूर्वैः कृतमिनियौ च। अ० ४।४।१३४। अनेनायं सिद्धः। (वि) विविधार्थे (उच्छति) विवसति (प्रिया) या प्रीणाति सर्वान् सा (दिवः) सूर्य्यप्रकाशात् (स्तुषे) तद्गुणान् प्रकाशयसि (वाम्) द्वे (अश्विना) अश्विनौ सूर्य्याचन्द्रमसाविवाध्यापिकोपदेशिके (बृहत्) महद्दिनम् ॥१॥
तत्रोषरश्विवद्वर्त्तमानानां विदुषीणां गुणा उपदिश्यन्ते।
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
In this Mantra, the attributes of learned women behaving like the Dawn and the Ashvins (fire and water etc.) are taught.
O learned lady, as the wonderful dear dawn who is like the daughter of sky, shines forth and scatters darkness, so you shine forth on account of your noble virtues. As you praise lady teachers who are like the sun and the moon and preachers, so I also praise you much and keep you always happy.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात उषा व अश्वी यांचे प्रत्यक्ष वर्णन केलेले आहे. त्यामुळे या सूक्तार्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी. ॥
