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ए॒षो उ॒षा अपू॑र्व्या॒ व्यु॑च्छति प्रि॒या दि॒वः । स्तु॒षे वा॑मश्विना बृ॒हत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣo uṣā apūrvyā vy ucchati priyā divaḥ | stuṣe vām aśvinā bṛhat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षो इति॑ । उ॒षाः । अपू॑र्व्या । वि । उ॒च्छ॒ति॒ । प्रि॒या । दि॒वः । स्तु॒षे । वा॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । बृ॒हत्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:46» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब छयालीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके पहिले मन्त्र में उषा और सूर्य चन्द्र के दृष्टान्त से विद्वान् स्त्रियों के गुणों का प्रकाश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विदुषि ! जो तू जैसे (एषो) यह (अपूर्व्या) किसी की हुई न (दिवः) सूर्य्य प्रकाश से उत्पन्न हुई (प्रिया) सबको प्रीति की बढ़ाने वाली (उषाः) दाहशील उषा अर्थात् प्रातःकाल की वेला (बृहत्) बड़े दिन को (उच्छति) प्रकाशित करती है वैसे मुझ को (व्युच्छति) आनन्दित करती हो और जैसे वह (अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य पढ़ाने और उपदेश करने हारी स्त्रियों के (स्तुषे) गुणों का प्रकाश करती हो वैसे मैं भी तुझ को सुखों में वसाऊं और तेरी प्रशंसा भी करूं ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो स्त्री लोग सूर्य चन्द्र और उषा के सदृश सब प्राणियों को सुख देती हैं वे आनन्द को प्राप्त होती हैं इनसे विपरीत कभी नहीं हो सकतीं ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अश्विनौ का स्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - १. मन्त्र का ऋषि प्रस्कण्व निश्चय करता है कि (एषा उ) - निश्चय से यह (उषाः) - उषः काल (अपूर्व्या) - 'जो पहलेपहल ही उदय हुआ हो' ऐसी बात नहीं, अर्थात् जो सदा से प्रकट होता चला आ रहा है, ऐसा यह उषः काल (व्युच्छति) - अन्धकार को दूर करता है । बाह्य अन्धकार को ही क्या, यह तो मेरे हृदयान्धकार को भी नष्ट करता है । यह उषः काल (दिवः प्रिया) - प्रकाश के द्वारा सबकी प्रीति का हेतु है, अन्धकार को नष्ट करके प्रकाश से सबके हृदयों को आनन्दित करता है ।  २. इस उषः काल में मैं प्रस्कण्व हे (अश्विना) - प्राणापानो ! (वाम्) - आपका (बृहत् स्तुषे) - खूब ही स्तवन करता हूँ । मैं प्रातः प्रबुद्ध होकर प्राणसाधना के लिए उद्यत होता हूँ ।  
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यह सदा प्रकट होनेवाली उषा बाह्य अन्धकार को दूर करती हुई मेरे हृदयान्धकार को भी दूर करे और मैं तैयार होकर प्राणसाधना में प्रवृत्त होऊँ । प्राणसाधना मेरा प्रथम कर्तव्य हो ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(एषो) इयम् (उषाः) दाहनिमित्तशीला (अपूर्व्या) न पूर्वैः कृता। अत्र पूर्वैः कृतमिनियौ च। अ० ४।४।१३४। अनेनायं सिद्धः। (वि) विविधार्थे (उच्छति) विवसति (प्रिया) या प्रीणाति सर्वान् सा (दिवः) सूर्य्यप्रकाशात् (स्तुषे) तद्गुणान् प्रकाशयसि (वाम्) द्वे (अश्विना) अश्विनौ सूर्य्याचन्द्रमसाविवाध्यापिकोपदेशिके (बृहत्) महद्दिनम् ॥१॥

अन्वय:

तत्रोषरश्विवद्वर्त्तमानानां विदुषीणां गुणा उपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विदुषि ! या त्वं यथैषो अपूर्व्या दिव अद्भुता सती प्रियोषा बृहदुच्छति तथा मां व्युच्छसि यथाऽश्विनौ स्तुषे तथाऽहमपि त्वां विवासयामि स्तौमि च ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। याः स्त्रियः सूर्यचन्द्रोषर्वत्सर्वान् प्राणिनः सुखयन्ति ता एवानन्दाप्ता भवन्ति नेतराः ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This glorious dawn, darling of the sun, shines forth from heaven and proclaims the day. Ashvins, harbingers of this glory, I admire you immensely — infinitely.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In this Mantra, the attributes of learned women behaving like the Dawn and the Ashvins (fire and water etc.) are taught.

अन्वय:

O learned lady, as the wonderful dear dawn who is like the daughter of sky, shines forth and scatters darkness, so you shine forth on account of your noble virtues. As you praise lady teachers who are like the sun and the moon and preachers, so I also praise you much and keep you always happy.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अश्विनौ ) सूर्याचन्द्रमसाविव अध्यापिकोपदेशिके ।
भावार्थभाषाः - Those women who gladden all beings like the sun, the moon and the dawn; enjoy bliss.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात उषा व अश्वी यांचे प्रत्यक्ष वर्णन केलेले आहे. त्यामुळे या सूक्तार्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी. ॥

भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्या स्त्रिया सूर्य, चंद्र व उषाप्रमाणे सर्व प्राण्यांना सुख देतात. त्यांना आनंद प्राप्त होतो. या विपरीत इतर स्त्रिया तो प्राप्त करू शकत नाहीत. ॥ १ ॥