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देवता: रुद्रः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

गा॒थप॑तिं मे॒धप॑तिं रु॒द्रं जला॑षभेषजम् । तच्छं॒योः सु॒म्नमी॑महे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gāthapatim medhapatiṁ rudraṁ jalāṣabheṣajam | tac chaṁyoḥ sumnam īmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गा॒थप॑तिम् । मे॒धप॑तिम् । रु॒द्रम् । जला॑षभेषजम् । तत् । श॒म्योः । सु॒म्नम् । ई॒म॒हे॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:43» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह रुद्र कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (गाथपतिम्) स्तुति करनेवालों के पालक (मेधपतिम्) यज्ञ वा पवित्र पुरुषों की पालना करनेवाले (जलाषभेषजम्) जिससे सुख के लिये ओषधी हो उस (रुद्रम्) परमेश्वर के आश्रम होकर (तत्) उस विज्ञान वा (शंयोः) व्यावहारिक पारमार्थिक सुख से भी (सुम्नम्) मोक्ष के सुख की (ईमहे) याचना करते हैं वैसे तुम भी करो ॥४॥
भावार्थभाषाः - कोई भी मनुष्य स्तुति यज्ञ वा दुःखों के नाश करनेवाली ओषधियों की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर विद्वान् और प्राणायाम के विना विज्ञान और लौकिक सुख वा मोक्ष सुख प्राप्त होने के योग्य नहीं हो सकता ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुखप्राप्ति के मूल साधन [Basic principles of Happiness]

पदार्थान्वयभाषाः - १. (गाथपतिम्) - [गाथा वाङ्नाम] सब गाथाओं, वेदवाणियों के स्वामी तथा (मेधपतिम्) - सब यज्ञों के रक्षक (रुद्रम्) - [रुत्+र] हृदयस्थरूपेण ही उपदेश देनेवाले, (जलाषभेषजम्) - जलरूप औषध से युक्त प्रभु से (तत्) - उस (शंयोः) - शान्ति को देनेवाले तथा भयों के यावन - [दूर करने] - वाले (सुम्नम्) - सुख को (ईमहे) - माँगते हैं ।  २. प्रभु हमें वेदज्ञान देते हैं, वेद द्वारा सब यज्ञों [कर्तव्य - कर्मों] का उपदेश करते हैं । हृदय में स्थित होकर सदा सत्प्रेरणा प्राप्त कराते हैं । वे प्रभु हमें इस अद्भुत जलरूप औषध को देते हैं 'अप्सु में सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा' ।  ३. वेदों के अध्ययन, यज्ञों के करने, प्रभु - प्रेरणा को सुनने तथा जलों के समुचित आचमन से हमें शान्ति, निर्भयता व सुख प्राप्त होगा ।  ४. मन्त्र में प्रभु के जिन नामों का स्मरण किया गया है वे सब नाम उन साधनों का प्रतिपादन करते हैं जिनको जीवन में लाने पर हमें शान्ति, निर्भयता व सुख की प्राप्ति होगी । वेद की यह महत्वपूर्ण शैली है कि प्रार्थना के साथ ही उसकी पूर्ति के साधनों का प्रतिपादन होता है । हम प्रार्थना करते हैं और प्रभु उसकी पूर्ति के लिए साधनों का संकेत कर देते हैं । प्रार्थना की पूर्ति पुरुषार्थ से ही होती है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - 'वेदाध्ययन [ज्ञानप्राप्ति], यज्ञ, प्रभुप्रेरणा - श्रवण व जलों का आचमन' हमें शान्त, नीरोग व सुखी बनाएंगे । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(गाथपतिम्) यो गाथानां स्तावकानां विदुषां पतिः पालकस्तम् (मेधपतिम्) यो मेधानां पवित्राणां पुरुषाणां वा पालयिता तम्। मेधइति यज्ञना० निघं० ३।१७। (रुद्रम्) पूर्वोक्तम् (जलाषभेषजम्) जला#षाय सुखाय भेषजं यस्मात्तम् (तत्) ज्ञानम् (शंयोः) शं लौकिकं पारमार्थिकं सुखं विद्यते यस्मिँस्तस्य (सुम्नम्) मोक्षसुखम् (ईमहे) याचामहे ॥४॥ #[‘जलाष’ इति सुखनामसु पठितम्। निघं० ३।६।]

अन्वय:

पुनः स रुद्रः कीदृश इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्या ! यथा वयं गाथपतिं मेधपतिं जलाषभेषजं रुद्रमाश्रित्य यच्छंयोरपि सुम्नं मोक्षसुखमीमहे याचामहे तथैव यूयमपीच्छत ॥४॥
भावार्थभाषाः - नहि कश्चित्स्तुतीनां मेधानां दुःखनाशकानामोषधीनां प्रापकेण विदुषा प्राणायामेन च विना विज्ञानं लौकिकं सुखं मोक्षसुखं च प्राप्तुमर्हति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We pray to gathapati, lord protector of hymns and celebrants, medhapati, lord protector and promoter of yajnas, jalashabheshajam, universal balm of life, and Rudra, lord of life, love and justice for the bliss of peace and ultimate freedom.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that Rudra is taught in the fourth Mantra.

अन्वय:

O men, as taking shelter in Rudra (God) Who is the Protector of the learned devotees, holy Yajnas and highly intelligent men, who is like a healing balm for happiness, we pray for abiding joy of emancipation, health and strength, so you should also do.

पदार्थान्वयभाषाः - [गाथपतिम्] यो गाथानां स्तावकानां विदुषां पतिः पालक: तम् = The Protector of the learned devotees. [मेधपतिम्] यो मेधानां पवित्राणां यज्ञानां पुरुषाणां वा पालयिता तम् । मेध इति यज्ञ नाम [ निघ० ३.१५ ] [सुम्नम्] मोक्षसुखम् = The joy or bliss of emancipation. [ शंयो: ] शं लौकिकं पारमार्थिकं सुखं विद्यते यस्मिन् = Of the person who possesses worldly happiness and the joy of liberation.
भावार्थभाषाः - None can attain knowledge, worldly happiness and the joy of emancipation without the help of a learned person who gives us the knowledge of God's praise and the herbs that destroy misery (caused by diseases) and the teaching of Pranayama that alleviates our suffering.
टिप्पणी: Prof. Maxmuller's translation of this Mantra, particularly of मेधपतिम् is not only wrong, but mischievous. He translates it in the "Vedic Hymns Vol. I) as follows- We implore Rudra, the lord of songs, the lord of animal sacrifices, the possessor of healing medicines, for health, wealth and his favor." We call the translation of मेधपति as Lord of animal sacrifices as not only un-warranted, but also mischievous, because there is no authority for taking the word मेध (Medha) which according to the Vedic Lexicon (Nighantu 3.15) stands for highly intelligent persons मेघ इति मेधाविनान (निघ० ३.१५) and Yajna or non-violent sacrifice मेघ इति यश नाम ( निम० ३.१७ ) Nighantu) 3.17 for animal- sacrifices. It is note-worthy that Prof. Wilson and Griffith also do not interpret मेधपति as the Lord of animal sacrifices, but merely as "Protector of sacrifices"? (Wilson) and "Lord of sacrifices" (Griffith). Prof. Maxmuller was himself not certain of the correctness of this un-warranted interpretation and therefore put the following note on this verse No. 4 “We must derive gathapati from Gatha (167.6 and medhapati from Medha, animal-sacrifice, till we know on the subject.” (Vedic Hymns Vol. I. P. 420). It was also wrong and audacious on his part to change the text गाथपतिं as गाथापति and मेघपतिम् as मेधापतिम् Even then can never mean animal sacrifice. That the Vedic Yajnas are called through out the Vedas as अध्वर (See the word used hundreds of times in Rig. 1.1.4.1.18; 1. 14.21; 128.4.3.24.1.2.25.etc. yaj 2.4;6. 23; 15.38; Sama 7.25, 6.5.5.2.Atharva 4.24.3; 5.12.2; 18. 2, 32; 19, 42. 4. etc.) which means अध्वर इति यज्ञनाम ध्वरतिहिंसाकर्मा तत्प्रतिषेध: (निरुक्ते १. ७) i. e. A non-violent act, should have been known to a scholar like Prof. Maxmuller.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कोणीही माणूस स्तुतीरूपी यज्ञ व दुःखांचा नाश करणाऱ्या औषधींची प्राप्ती करविणाऱ्या परमेश्वर, विद्वान व प्राणायामाशिवाय, विज्ञान, लौकिकसुख व मोक्षसुख प्राप्त होण्यायोग्य बनू शकत नाही. ॥ ४ ॥