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देवता: रुद्रः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ कर॒त्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑ । यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathā no aditiḥ karat paśve nṛbhyo yathā gave | yathā tokāya rudriyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । नः॒ । अदि॑तिः । कर॑त् । पश्वे॑ । नृभ्यः॑ । यथा॑ । गवे॑ । यथा॑ । तो॒काय॑ । रु॒द्रिय॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:43» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (तोकाय) उत्पन्न हुए बालक के लिये (अदितिः) माता (यथा) जैसे (पश्वे) पशु समूह के लिये पशुओं का पालक (यथा) जैसे (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये राजा (यथा) जैसे (गवे) इन्द्रियों के लिये जीव वा पृथिवी के लिये खेती करनेवाला (करत्) सुखों को करता है वैसे (नः) हम लोगों के लिये (रुद्रियम्) परमेश्वर वा पवनों का कर्म प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमाऽलंकार है। जैसे माता-पिता पुत्र के लिये, गोपाल पशुओं के लिये और राजसभा प्रजा के लिये सुखकारी होते हैं वैसे ही सुखों के करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अदितिः व कल्याण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यथा) - जैसे (अदितिः) - [इयं वै पृथिवी अदितिः - शत० १/१/४/५, नि० १/१] यह पृथिवी (पश्वे) - पशुओं के लिए (करत्) - घास आदि को उत्पन्न करती है । २. (यथा) - जैसे (अदितिः) - [गोनाम, नि० २/११] गौ (नृभ्यः) - मनुष्यों के हित के लिए (करत्) - करती है । ३. (यथा) - जैसे (अदितिः) - वेदवाणी [वाङ्नाम, नि० १/११] (गवे) - ज्ञानेन्द्रियों के लिए (करत्) - ज्ञान को प्राप्त कराती है ।  ४. (यथा) - जैसे (अदितिः) - अदीना देवमाता - दीनता से ऊपर उठी हुई दिव्य गुणों का निर्माण करनेवाली माता (तोकाय) - सन्तान के लिए (करत्) - कल्याण करती और गुणों को सिद्ध करती है उसी प्रकार (नः) - हमारे लिए (अदितिः) - यह वेदवाणी (रुद्रियम्) - रुद्र - सम्बन्धी उपदेश को (करत्) - करती है, अर्थात् यह वेदवाणी हमें प्रभु का उपदेश देती है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वेद उस प्रभु का उपदेश देता है जो हमें निरन्तर प्रेरणा प्राप्त करा रहे हैं ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) माता। अत्रादितिर्द्यौः इत्यादिना माता गृह्यते। (करत्) कुर्य्यात्। अत्राऽयं# भ्यादिः*। (पश्वे) पशुसमूहाय पशुपालः। अत्र जसादिषु छन्दसि वा वचनम्। अ० ७।६।१०९। इति वार्त्तिकेनायं सिद्धः। (नृभ्यः) यथा मनुष्येभ्यो नृपतिः (यथा) (गवे) इन्द्रियाय जीवः पृथिव्यै कृषीवलः (यथा) (तोकाय) सद्योजातायापत्याय बालकाय (रुद्रियम्) रुद्रस्येदं कर्म। अत्र पृषोदराद्याकृतिगणान्तर्गतत्वात् इदमर्थे घः ॥२॥ #[टि० १ कृधातुः। सं०] *[महर्षियाऽत्र भ्यादि गणेऽपि कृधातुः स्वीकृतः, परं वर्त्तमान मुद्रितेषु धातुपाठेषु कृधातु र्भ्यादिगणे नोपलभ्यते, एवं ज्ञायते यत्पुरा काले भ्यादिगणेऽपि कृधातु रासीद् यस्य ‘करति, करतः, करन्ति,’ आदि रूपाण्यपि प्रचलितान्यासन् यथास्यैव सूक्त्तस्य षष्ठेमन्त्रे ‘करति’ इति प्रयोगो वर्तते। परमाधुनिकै वैयाकरणम्मन्यैस्तनादि गणे कृधातुं दृष्ट्वा भ्वादिपाठादसौ वहिष्कृतः। सं०।]

अन्वय:

पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यथा तोकायादितिर्माता यथा पश्वे पशुपालो यथा नृभ्यो नरेशो यथा गवे गोपालश्च सुखं करत् कुर्यात् तथा नोऽस्मभ्यं रुद्रियं कर्म स्यात् ॥२॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालंकारः। यथा मातापितृभ्यां सन्तानाय पशुभ्यो गोपालेन राजसभया च विना प्रजाभ्यः सुखं न जायते तथैव विद्यापुरुषार्थाभ्यां विना सुखं न भवति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as Aditi, mother, does good to the child, the shepherd to his animals, the ruler to his people, the master to the cows, so, we pray, may Rudra, lord of life and energy, grant us kindness and grace.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What does Rudra do is taught further in the second Mantra.

अन्वय:

As a mother causes happiness to her child, as a shepherded to his herd of animals, as a king to his subjects, as a cowherd to his cows, in the same way, may Immortal God grant happiness and peace to our children, to the cattle, the men and the cows.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अदितिः ) माता अत्र अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता । (ऋ० १.८९.१०) इत्यादिना माता गृह्यते = Mother. (गवे) इन्द्रियाय जीव:, पृथिव्यै कृषीबलः = A soul for the senses and a farmer for the earth. (तोकाय) सद्योजाताय अपत्याय बालकाय = Newborn child. तोकम् इत्यपत्यनाम ( निघ० २.२ ) ( रुद्रियम् ) रुद्रस्य कर्म = God's act of giving happiness.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankara or simile used in the Mantra. As there is no happiness to children without parents, no happiness to the cattle without a cowherd, and the people without the king's assembly, in the same manner, none can enjoy happiness without knowledge and exertion.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे माता-पिता पुत्रासाठी, गोपाल पशूंसाठी व राजसभा प्रजेसाठी सुखकारक असतात. तसेच परमेश्वर व वायूही सुखकारक असतात, हे जाणावे. ॥ २ ॥