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देवता: रुद्रः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

कद्रु॒द्राय॒ प्रचे॑तसे मी॒ळ्हुष्ट॑माय॒ तव्य॑से । वो॒चेम॒ शंत॑मं हृ॒दे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kad rudrāya pracetase mīḻhuṣṭamāya tavyase | vocema śaṁtamaṁ hṛde ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कत् । रु॒द्राय॑ । प्रचे॑तसे । मी॒ळ्हुःत॑माय । तव्य॑से । वो॒चेम॑ । शम्त॑मम् । ह्द॒े॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:43» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब तेंतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके पहिले मंत्र में रुद्र शब्द के अर्थ का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हम लोग (कत्) कब (प्रचेतसे) उत्तम ज्ञानयुक्त (मीढुष्टमाय) अतिशय करके सेवन करने वा (तव्यसे) अत्यन्त वृद्ध (हृदे) हृदय में रहनेवाले (रुद्राय) परमेश्वर जीव वा प्राण वायु के लिये (शंतमम्) अत्यन्त सुख रूप वेद का (वोचेम) अच्छे प्रकार उपदेश करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - रुद्र शब्द से तीन अर्थों का ग्रहण है, परमेश्वर, जीव और वायु उनमें से परमेश्वर अपने सर्वज्ञपन से जिसने जैसा पाप कर्म किया उस कर्म के अनुसार फल देने में उसको रोदन करनेवाले है। जीव निश्चय करके मरने समय अन्य से सम्बन्धियों को इच्छा कराता हुआ शरीर को छोड़ता है, तब अपने आप रोता है और वायु शूल आदि पीड़ा कर्म से रोदन कर्म का निमित्त है इन तीनों के योग से मनुष्यों को अत्यन्त सुखों को प्राप्त होना चाहिये ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का स्तवन अत्यन्तावश्यक

पदार्थान्वयभाषाः - १. (कत्) - कब (शन्तमम्) - अतिशयेन शान्ति देनेवाले स्तोत्र को (वोचेम) - हम बोलेंगे ? किसके लिए  [क] (रुद्राय) - सदुपदेश देनेवाले के लिए । उस प्रभु के लिए जो सृष्टि के आरम्भ में सब विद्याओं का उपदेश करते हैं ।  [ख] (प्रचेतसे) - जो प्रकृष्ट ज्ञानवाले हैं और इसलिए जिनकी प्रेरणा में कभी भ्रान्ति सम्भव ही नहीं । [ग] (मीळ्हुष्टमाय) - जो ज्ञान के द्वारा अनन्त सुखों की वर्षा करनेवाले हैं । अविद्या ही सारे कष्टों का क्षेत्र होती है । प्रभु उस अविद्या को ज्ञान के प्रकाश से समाप्त करके सब कष्टों का भी अन्त करनेवाले हैं ।  [घ] (तव्यसे) - वे प्रभु अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त है । वस्तुतः सब गुणों के दृष्टिकोण से चरमसीमारूप ही वे प्रभु हैं ।  [ङ] (हृदे) - [अस्मदीयै हृन्निष्ठाय] हमारे हृदयों के अन्दर स्थित हैं ।  २. वस्तुतः हृदय में स्थित हुए हुए ही वे प्रभु प्रेरणा देते हैं । प्रकृष्ट ज्ञानवाले होने के कारण वे भ्रान्त प्रेरणा नहीं देते । इस ठीक प्रेरणा के द्वारा वे हमपर सुखों की वर्षा करते हैं । स्वयं वे अतिशयेन प्रवृद्ध हैं । जीव भी जब उस हृदयस्थ रुद्र की प्रेरणा को सुनता है तब वृद्धि को प्राप्त होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हृदयस्थ होकर निरन्तर प्रेरणा दे रहे हैं । हम उस प्रेरणा को सुनें, इसी में हमारा कल्याण है । हम प्रभु का स्तवन करें ताकि हमें शान्ति मिले ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(कत्) कदा (रुद्राय) परमेश्वराय जीवाय वा (प्रचेतसे) प्रकृष्टं चेतो ज्ञानं यस्य यस्माद्वा तस्मै (मीढुष्टमाय) प्रसेक्त्ततमाय (तव्यसे) अतिशयेन वृद्धाय। अत्र तवीया# निति संप्राप्ते छांदसो वर्णलोपो वा इतीकारलोपः। (वोचेम) उपदिशेम (शंतमम्) अतिशयितं सुखम् (हृदे) हृदयाय ॥१॥ #[टि० चतुर्थ्या एक वचने ‘तवीयसे’ इति संप्राप्ते। सं०]

अन्वय:

अथ रुद्रशब्दार्थ उपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - वयं कत्कदा प्रचेतसे मीढुष्टमाय तव्यसे हृदे रुद्राय शंतमं वोचेम ॥१॥
भावार्थभाषाः - रुद्रशब्देन त्रयोऽर्था गृह्यंते। परमेश्वरो जीवो वायुश्चेति तत्र परमेश्वरः सर्वज्ञतया येन यादृशं पापकर्म कृतं तत्फलदानेन रोदयिताऽस्ति जीवः खलु यदा मरणसमये शरीरं जहाति पापफलं च भुंक्ते तदा स्वयं रोदिति वायुश्च शूलादिपीडाकर्म्मणा कर्मनिमित्तः सन्रोदयिताऽस्त्यत एते रुद्रा विज्ञेयाः ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When shall we sing hymns of peace and bliss most soothing in celebration of the glory of Rudra, lord of justice and mercy, omniscient, most generous, omnipotent and dearest ever present in the heart? (With a little modification of meaning, the mantra applies to the soul and to Vayu, universal energy as well as prana energy of life. Rudra stands for Isvara, jiva and vayu/prana.)
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The meanings of Rudra are taught in the first Mantra.

अन्वय:

In case of God- (1) When shall we sing (a song) to Rudra (God) the Omniscient, the most Liberal, the most Powerful that shall be the giver of peace and delight to our hearts ? In case of the soul- (2) When shall we sing to Rudra (the soul that weeps when leaving the body) that is wise, most bounteous, and mighty, that may be giver of delight to our hearts ! (3) The third meaning of Rudra is Vayu or air that causes pain to the wicked on account of their evil actions.

भावार्थभाषाः - By Rudra three meanings are taken. (1) God, (2) Soul & (3) Vayu or air. God is called Rudra as being Omniscient Dispenser of Justice. He makes the wicked weep by giving the fruits of their evil actions. (2) The soul is called Rudra as it weeps when it leaves the body at the time of death and gets the result of evil actions. (3) Vayu or air is called Rudra as it makes a person weep causing pain as a result of bad deeds.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात रुद्र शब्दाच्या अर्थाचे वर्णन, सर्व सुखांचे प्रतिपादन, मैत्रीचे आचरण, परमेश्वर व सभाध्यक्षाच्या आश्रयाने सुखाची प्राप्ती, एका ईश्वराची उपासना, परमसुखाची प्राप्ती व सभाध्यक्षाचा आश्रय सांगितलेला आहे. त्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - रुद्र या शब्दाचे तीन अर्थ स्वीकारले जातात. परमेश्वर, जीव व वायू. परमेश्वर सर्वज्ञतेने प्रत्येकाला त्याच्या पापकर्माचे फळ देतो त्यामुळे त्याला रोदन करविणारा म्हटले जाते. जीव निश्चयाने मरताना इतर संबंधाची इच्छा करीत, पापकर्माचे फळ भोगत शरीराचा त्याग करताना रडतो, तसेच वायू, वेदना, त्रासामुळे रोदन कर्माचे निमित्त आहे. हे जाणावे. ॥ १ ॥