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देवता: पूषा ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒भि सू॒यव॑सं नय॒ न न॑वज्वा॒रो अध्व॑ने । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi sūyavasaṁ naya na navajvāro adhvane | pūṣann iha kratuṁ vidaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । सु॒यव॑सम् । न॒य॒ । न । न॒व॒ज्वा॒रः । अध्व॑ने । पूष॑न् । इ॒ह । क्रतु॑म् । वि॒दः॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:42» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसने किसको प्राप्त होना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) सभाध्यक्ष ! इस संसार वा जन्मांतर में (अध्वने) श्रेष्ठ मार्ग के लिये हम लोगों को (सुयवसम्) उत्तम यव आदि ओषधी होनेवाले देश को (अभिनय) सब प्रकार प्राप्त कीजिये और (क्रतुम्) उत्तम कर्म वा प्रज्ञा को (विदः) प्राप्त हूजिये जिससे इस मार्ग में चलके हम लोगों में (नवज्वारः) नवीन-२ सन्ताप (न) न हों ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे सभाध्यक्ष ! आप अपनी कृपा से श्रेष्ठ देश वा उत्तम गुण हम लोगों को दीजिये और सब दुःखों को निवारण कर सुखों को प्राप्त कीजिये, हे सभासेनाध्यक्ष ! विद्वान् लोगों को विनयपूर्वक पालन से विद्या पढ़ाकर इस राज्य में सुख युक्त कीजिये ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूयवस - 'सात्विक भोजन'

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (पूषन्) - पोषक प्रभो ! हम सुपथ से ही चलें, अतः आप हमें (सूयवसम्) - उत्तम यव - जौ आदि ओषधिरूप भोजनों की ओर (अभिनय) - आभिमुख्येन ले - चलिए । हमारा झुकाव सदा यव आदि सात्त्विक अन्नों को खाने की ओर हो ।  २. इन सात्त्विक अन्नों के सेवन से हमारी बुद्धि भी सात्त्विक होगी और तब (अध्वने) - मार्ग पर चलने के लिए (नव ज्वारः न) - कोई नया बुखार न चढ़ आएगा, अर्थात् हमारा मन किसी नवीन व्यसन का शिकार होकर मार्ग पर चलने से रुक न जाएगा ।  ३. इस सबके लिए अर्थात् 'सात्त्विक के सेवन' तथा 'नवीन व्यसनों के न आने के लिए' हे (पूषन्) - पोषक प्रभो ! आप (इह( - इस जीवन - यात्रा में हमें (क्रतुम्) - कर्मशक्ति, प्रज्ञा व संकल्प को (विदः) - प्राप्त कराइए ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम संकल्प करें कि हम सात्त्विक भोजन ही करेंगे और हमें किसी नवीन व्यसन का ज्वर न चढ़ पाएगा ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अभि) आभिमुख्ये (सुयवसम्) शोभनो यवाद्योषधिसमूहो यस्मिन्देशे तम्। अत्र अन्येषामपिदृश्यते इति दीर्घः। (नय) प्रापय (न) निषेधार्थे (नवज्वारः) यो नवो नूतनश्चासौ ज्वारः संतापश्च सः (अध्वने) मार्गाय (पूषन्) सभाध्यक्ष (इह) उक्तार्थम् (विदः) प्राप्नुहि ॥८॥

अन्वय:

पुनस्तेन किं प्रापणीयमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे पूषंस्त्वमिहाऽधवने सुयवसं देशमभिनय तेन मार्गेण क्रतुं विदो येन त्वयि नवज्वारो न भवेत् ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे परमेश्वर ! भवान् स्वकृपया श्रेष्ठदेशं गुणाँश्चास्मभ्यं देहि। सर्वाणि दुःखानि निवार्य्य सुखानि प्रापय हे विद्वन् सभाध्यक्ष ! त्वमस्मान् विनयेन पालयित्वा विद्यां शिक्षयित्वाऽस्मिन्राज्ये सुखयेति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, lord of growth and advancement, take us to the land of manna, beauty and joy. No new obstacles, no sufferance on the way. And then know the noble acts (we do in the new land).
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should he (Poosha) cause to attain is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

O God the nourisher of all and the President of the Assembly, protector of the people, lead us where there is abundant fodder, barley and other herbs. Grant us knowledge and the power of action, so that while on the way (of doing noble deeds) there may not be fever or any trouble caused by extreme heat etc.

पदार्थान्वयभाषाः - [ पूषन ] [१] परमेश्वर, [२] सभाध्यक्ष | God is called Poosha (1) as He is the nourisher of all. The President of the Assembly or King is also called पूषा (Poosha) as it is his duty to see that all subject are nourished and fed properly. The word may also be used for the commander of an army.
भावार्थभाषाः - O God, grant us by Thy grace a beautiful country and good attributes, remove all miseries and lead us to happiness. O learned President of the Assembly, make us happy in this land by safe-guarding and preserving us with humility and giving us good education.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे परमेश्वरा ! तू तुझ्या कृपेने आम्हाला श्रेष्ठ देश (स्थान) व उत्तम गुण मिळू दे व सर्व दुःखाचे निवारण करून सुख प्राप्त करून दे. हे विद्वान सभासेनाध्यक्षा तू विद्वानांचे पालन करून व विद्या शिकवून या राज्याला सुखी कर. ॥ ८ ॥