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देवता: पूषा ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अधा॑ नो विश्वसौभग॒ हिर॑ण्यवाशीमत्तम । धना॑नि सु॒षणा॑ कृधि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adhā no viśvasaubhaga hiraṇyavāśīmattama | dhanāni suṣaṇā kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अधः॑ । नः॒ । वि॒श्व॒सौ॒भ॒ग॒ । हिर॑ण्यवाशीमत्तम । धना॑नि । सु॒सना॑ । कृ॒धि॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:42» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह न्यायाधीश प्रजा में क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (विश्वसौभग) संपूर्ण ऐश्वर्य्यों को प्राप्त होने (हिरण्यवाशीमत्तम) अतिशय करके सत्य के प्रकाशक उत्तम कीर्त्ति और सुशिक्षित वाणी युक्त सभाध्यक्ष ! आप (न) हम लोगों के लिये (सुषणा) सुखसे सेवन करने योग्य (धनानि) विद्याधर्म और चक्रवर्त्ति राज्य की लक्ष्मी से सिद्ध किये हुए धनों को प्राप्त कराके (अध) पश्चात् हम लोगों को सुखी (कृधि) कीजिये ॥६॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरे के अनन्त सौभाग्य वा सभासेना न्यायाधीश धार्मिक मनुष्य के चक्रवर्त्ति राज्य आदि सौभाग्य होने से इन दोनों के आश्रय से मनुष्यों को असंख्यात विद्या सुवर्णा आदि धनों की प्राप्ति से अत्यन्त सुखों के भोग को प्राप्त होना वा कराना चाहिये ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रक्षण का स्वरूप, धनों का संविभाग

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अध) - अब हमारी इस रक्षण की प्रार्थना के बाद हे (विश्वसौभग) - सम्पूर्ण धनों व सौभाग्यों से युक्त प्रभो ! (हिरण्यवाशीमत्तम) - अधिक - से - अधिक हितरमणीय वाणीवाले प्रभो ! आप (नः) - हमारे (धनानि) - धनों को (सुषणा) - उत्तम विभाग व दानयुक्त (कृधि) - कीजिए ।  २. वस्तुतः जब यह धनों का संविभाग व दान रुक जाता है तब कई लोग Overfed - अति भुक्तिवाले तथा दूसरे underfed - हीनभुक्तिवाले हो जाते हैं और इस प्रकार दोनों का अकल्याण होता है । अतिभुक्ति व हीनभुक्ति ही सब रोगों व विनाशों का कारण बनती है ।  ३. प्रभु "विश्वसौभग" होते हुए हमें धन तो प्राप्त कराएँ ही, परन्तु साथ ही हितरमणीय ज्ञान देकर हमें धनों के संविभाग की प्रेरणा भी दें । वस्तुतः यह धनों की विषमता भी चोरी आदि के भावों की वृद्धि का कारण बनती है । जब हम धनों के संविभागवाले बनते हैं तब चोरी आदि भी समाप्त होती है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें दान की वृत्ति से युक्त करें और धन प्राप्त कराएँ ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अध) अधेत्यनन्तरम्। अत्रवर्णव्यत्ययेन थस्य धः निपातस्य च इति दीर्घश्च। (नः) अस्मभ्यम् (विश्वसौभग) विश्वेषां सर्वेषां सुभगानां श्रेष्ठानामैश्वर्य्याणां भावो यस्य तत्संबुद्धौ (हिरण्यवाशीमत्तम) हिरण्येन सत्यप्रकाशेन परमयशसा सह प्रशस्ता वाक् विद्यते यस्य सोतिशयितस्तत्संबुद्धौ। वा शांतिवाङ्ना० निघं० १।११। (धनानि) विद्याधर्मचक्रवर्त्तिराज्यश्रीसिद्धानि (सुषणा) यानि सुखेन सन्यंते तानि सुषणानि। अत्र अविहितलक्षणो मूर्द्धन्यः, सुषामादिषु द्रष्टव्यः। अ०।८।३।९८। इतिमूर्द्धन्यादेशस्तत्सन्नियोगेन णत्वं शेश्छन्दसि बहुलम् इति लोपश्च। (कृधि) कुरु ॥६॥

अन्वय:

पुनः स प्रज्ञासु किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विश्वसौभग ! हिरण्यवाशीमत्तम पृथिव्यादिराज्ययुक्त सभाध्यक्ष विद्वँस्त्वं नोस्मभ्यं सुषणा धनानि कृधि ॥६॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरस्यानंतसौभगत्वाद्धार्म्मिकस्य सभासेनान्यायाधीशस्य चक्रवर्त्तिसुखैश्वर्ययुक्तत्वादेतौ समाश्रित्य मनुष्यैरसंख्यातानि विद्यासुवर्णादिधनानि प्राप्य बहुसुखभोगः कर्त्तव्यः कारयितव्यश्चेति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, lord of universal good fortune, generous giver of the light of knowledge and golden lustre of honour, create for us and bless us with liberal gifts of wealth of knowledge, prosperity and well-being.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should he (a dispenser of justice) do towards the people is taught in the sixth mantra.

अन्वय:

Therefore O learned President of the Assembly ruling over the State, lord of prosperity and the power of speech, shining with the light of truth and good reputation, bestow upon us wealth (of knowledge, Dharma, prosperity and vast Government ) that may be liberally distributed.

पदार्थान्वयभाषाः - ( हिरण्यवाशीमत्तम ) हिरण्येन सत्यप्रकाशेन परमयशसा सह प्रशस्ता वाग् विद्यते यस्य सोऽति शयितस्तत्सम्बुद्धौ । वाशीति वाङ् नाम ( निघ० ११.१) = Possessing the power of speech shining with the light of truth and good reputation. ( सुषणा) यानि सुखेन सन्यन्ते तानि सुषणानि । अत्र अविदितलक्षणो मूर्धन्यः सुषामादिषु द्रष्टव्यः ( अष्टा० ८.३.९८ ) इति मूर्धन्यादेशः तत्सन्नियोगे णत्वं शैश्छन्दसि बहुलमिति लोपश्च = That which can be easily distributed.
भावार्थभाषाः - Men should enjoy happiness abundantly by having the communion with God who is the Lord of all and association with a righteous President of the Assembly, a Commander of the army or dispenser of justice possessing prosperity, having acquired knowledge, gold and other kinds of wealth. They should make others also happy.
टिप्पणी: For the meanings of the word हिरण्यवाशीमत्तम or सत्यप्रकाशेन परमयशसा सह प्रशस्ता वाक् विद्यते यस्य सोऽतिशयित: the following authorities from the Brahmanas may be aptly quoted. ज्योति शुक्रं हिरण्यम् ( एतरेय ब्रा० ७. १२ ) ज्योतिर्हि हिरण्यम् (शतपथ ४.३.१.२१) ज्योतिवें हिरण्यम् ( ताण्डय् ब्रा० ६.६.१० ) यशो वै हिरण्यम् ( एतरेय ७.१८ ) यशो वै हिरण्यम् ( गोपथ उ० ३.१७) हिरण्यसदृशी प्रीतिकरी हितरमणावा अतिशयेन यस्य वाक् स हिरण्य वाशीमत्तम इति स्कन्दस्वामी|
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ईश्वराचे अनंत ऐश्वर्य व सभा सेना न्यायाधीश धार्मिक मानाचे चक्रवर्ती राज्य इत्यादी सौभाग्य असल्यामुळे या दोन्हींच्या आश्रयाने माणसांनी असंख्य विद्या, सुवर्ण, धन प्राप्त करून सुखाचे भोग भोगले पाहिजेत. ॥ ६ ॥