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देवता: पूषा ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

आ तत्ते॑ दस्र मन्तुमः॒ पूष॒न्नवो॑ वृणीमहे । येन॑ पि॒तॄनचो॑दयः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tat te dasra mantumaḥ pūṣann avo vṛṇīmahe | yena pitṝn acodayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । तत् । ते॒ । द॒स्र॒ । म॒न्तु॒मः॒ । पू॒ष॒न् । अवः॑ । वृ॒णी॒म॒हे॒ । येन॑ । पि॒तॄन् । अचो॑दयः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:42» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह न्यायाधीश कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (दस्र) दुष्टों को नाश करने (मन्तुमः) उत्तम ज्ञानयुक्त (पूषन्) सर्वथा पुष्टि करनेवाले विद्वान् ! आप (येन) जिस रक्षादि से (पितॄन्) अवस्था वा ज्ञान से वृद्धों को (अचोदयः) प्रेरणा करो (तत्) उस (ते) आपके (अवः) रक्षादि को हम लोग (आवृणीमहे) सर्वथा स्वीकार करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे प्रेम प्रीति के साथ सेचन करने से उत्पन्न करने वा पढ़ानेवाले ज्ञान वा अवस्था से वृद्धों को तृप्त करें वैसे ही सब प्रजाओं के सुख के लिये दुष्ट मनुष्यों को दण्ड दे के धार्मिकों को सदा सुखी रक्खें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पितरों द्वारा पोषण

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (दस्र) - दुष्टों का उपक्षय करनेवाले ! (मन्तुमः) - विचारशील ज्ञानी (पूषन्) - सबके पोषकदेव ! (ते) - आपके (तत् अवः) - उस रक्षण को (आवृणीमहे) - हम सर्वथा वरण करते हैं (येन) - जिस रक्षण के हेतु से आप (पितॄन्) - माता - पिता, आचार्य व अतिथि आदि पितरों को (अचोदयः) - प्रेरित करते हैं ।  २. प्रभु के रक्षण का प्रकार यही है कि वे हमारे माता - पिता आदि को इस प्रकार उत्तम प्रेरणा प्राप्त कराते हैं कि वे हमारे रक्षण के लिए पूर्ण प्रयत्नशील होते हैं । प्रभुकृपा से उन्हें ऐसी शक्ति मिलती है कि वे प्रभु के निमित्त [Agent] बनकर हमारा रक्षण करते हैं । वस्तुतः उनके द्वारा प्रभु ही रक्षण कर रहे होते हैं । सब दुष्टों का उपक्षय करनेवाले प्रभु ही हैं । सब उत्तम विचार व ज्ञान के स्रोत प्रभु ही हैं, वे ही पोषण करनेवाले हैं ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आ) समन्तात् (तत्) पूर्वोक्तं वक्ष्यमाणं च (ते) तव (दस्र) दुष्टानामुपक्षेप्तः (मन्तुमः) मन्तुः प्रशस्तं ज्ञानं विद्यते यस्य तत्संबुद्धौ (पूषन्) सर्वथा पुष्टिकारक (अवः) रक्षणादिकम् (वृणीमहे) स्वीकुर्वीमहि (येन) (पितॄन्) वयोज्ञानवृद्धान् (अचोदयः) धर्मे प्रेरयेः। अत्र लिङर्थे लङ् ॥५॥

अन्वय:

पुनः स न्यायाधीशः कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे दस्र ! मन्तुमः पूषन् विद्वँस्त्वं येन पितॄनचोदयस्तत् ते तवाऽवो रक्षणादिकं वयं वृणीमहे ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्या यथा प्रेमप्रीत्या सेवनेन जनकादीनध्यापकादीन् ज्ञानवयोवृद्धांश्च प्रीणयेयुस्तथैव सर्वासां प्रजानां सुखाय दुष्टान् दण्डयित्वा श्रेष्ठान्सुखयेयुः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, wondrous destroyer of evil, generous saviour and protector, lord of knowledge, we pray for your love, grace and protection by which you inspire and enlighten our parents and seniors (to follow the right path).
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should a dispenser of justice (or a Judge) should be is taught in the fifth Mantra.

अन्वय:

O nourisher, learned person ( dispenser of justice ), O destroyer of the wicked, possessing good knowledge or wisdom, we solicit of thee that protection, knowledge and love where with thou promptest elderly educated persons to tread upon the path of Dharma (righteousness).

पदार्थान्वयभाषाः - ( दस्र) दुष्टानामुपक्षेप्तः = Destroyer of the wicked. ( मन्तुम: ) दसु -उपक्षये = Tr. मन्तुः प्रशस्तं ज्ञानं विद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ = Possessing good knowledge.
भावार्थभाषाः - As men should always satisfy and please their parents, teachers and other elderly educated persons with love and service, in the same way, they should gladden all good men by punishing the wicked for the welfare of all subjects.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसे ज्ञानवृद्ध व वयोवृद्ध पिता, अध्यापक यांना प्रेमाने तृप्त केले जाते तसे सर्व प्रजेच्या सुखासाठी दुष्ट माणसांना दंड देऊन धार्मिक लोकांना सदैव सुखी ठेवावे. ॥ ५ ॥